मदर्स डे: मां से मिली प्रेरणा तो स्लम एरिया के बच्चों को पढ़ाकर उनकी जिंदगी निखारने में जुटी दृष्टि
दृष्टि ने बताया कि उनके दादा प्रोफेसर थे। उन्हीं ने शिक्षा की अहमियत समझाई है। कोरोना काल में जब सबकुछ बंद हो गया था तो स्कूल भी बंद हो गए थे।
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मौजमस्ती करने की उम्र में पंचकूला की एक बेटी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाकर उनकी जिंदगी को निखारने में जुटी है। सेक्टर-12 निवासी 23 वर्षीय दृष्टि खरबंदा ने इन बच्चों को कोरोना काल में पढ़ाना शुरू किया था और अब भी उनका यह अभियान जारी है। दृष्टि का कहना है कि अगर उनकी मां रितु खरबंदा से सहयोग और प्रेरणा नहीं मिली होती तो शायद वह काम कभी नहीं कर पाती। उनका यह अभियान भविष्य में भी जारी रहेगा।
दृष्टि के पास पढ़ने के लिए आसपास के स्लम एरिया से करीब 120 से अधिक बच्चे आते हैं। दृष्टि ने बताया कि उनके दादा प्रोफेसर थे। उन्हीं ने शिक्षा की अहमियत समझाई है। कोरोना काल में जब सबकुछ बंद हो गया था तो स्कूल भी बंद हो गए थे। बच्चों को ऑनलाइन कक्षाएं ली जा रही थीं, लेकिन स्लम एरिया में रहने वाले गरीब बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बंद हो गई थी। इससे उनका भविष्य अंधकार की ओर जा रहा था। एक दिन पड़ोस की एक महिला ने कहा कि हमारे बच्चे तो ऑनलाइन पढ़ लेते हैं, मगर गरीब बच्चे सड़कों पर ही घूम रहे हैं। यह बात दृष्टि को बहुत अखरी और वह इसको लेकर गंभीर हो गईं। इसके बाद उन्होंने फैसला किया कि वह इन स्लम एरिया के बच्चों को पढ़ाएंगी। इसके बाद दृष्टि ने इस बात का जिक्र अपनी मां रितु खरबंदा से किया तो उन्होंने इसके लिए बेटी का हौसला बढ़ाया। साथ ही कहा कि अगर उसे इस काम में कोई भी जरूरत महसूस होती है तो वह हमेशा मदद के लिए तैयार रहेंगी। बिजनेसमैन पिता अजय खरबंदा ने भी बेटी की सोच की सराहना करते हुए उसका साथ दिया।
पार्क में पढ़ाना शुरू किया, अब संस्था भी बनाई
दृष्टि ने बताया कि उन्होंने बच्चों को बुलाकर घर के सामने पार्क में बैठक पढ़ाना शुरू कर दिया। जब ठंड का मौसम आया तो अपने घर के बरामदे में बुला लेती थी और यहीं पर बैठाकर पढ़ाती रही। अब उन्होंने इसके लिए सरवीना नाम की संस्था भी बना ली है जिससे इन बच्चों को बेहतर शिक्षा दी जा सके और इसके लिए लोगों से सहयोग भी लिया जा सके।
दृष्टि की अनुपस्थिति में मां लेती हैं बच्चों की कक्षा
दृष्टि ने बताया कि वह शाम के समय बच्चों को पढ़ाती हैं। कई बार ऐसा होता है कि उन्हें जरूरी काम से कहीं बाहर जाना पड़ता है। ऐसे में उनकी मां रितु खरबंदा बच्चों की कक्षा लेती हैं। मगर बेटी के अभियान को कमजोर नहीं होने देती।
ऐसी बेटी पर नाज है मुझे
रितु खरबंदा ने कहा कि लोगों को अपने बच्चों की फिक्र रहती है कि वे गलत संगत में न पड़ जाएं। लेकिन दृष्टि अपने काम से अपने नाम को भी चरितार्थ कर रही है। बेटी को इतना अच्छा काम करते देख किसी भी मां-बाप को उस पर गर्व होना लाजिमी है।