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रिटायर्ड ले. कर्नल कंवरजीत सिंह: घरवाले नहीं चाहते थे बेटा सेना में जाए, 71 के युद्ध में दुश्मन को चटा दी धूल
Mon, 22 May 2023 11:16 AM IST
निवेदिता वर्मा
दीपक शाही, अमर उजाला, पंचकूला
दीपक शाही, अमर उजाला, पंचकूला
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 22 May 2023 11:16 AM IST
सार
वर्तमान में पंचकूला सेक्टर-20 में रहने वाले सेवानिवृत्त ले. कर्नल कंवरजीत सिंह बताते हैं कि उनके दो बेटे हैं। बड़ा सेना में कर्नल है और दूसरा मर्चेंट नेवी में कैप्टन है। उन्होंने कहा कि हर घर से एक बेटा सेना में होना चाहिए।
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रिटायर्ड ले. कर्नल कंवरजीत सिंह
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
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विस्तार
वर्ष 1971 के युद्ध में 20 से ज्यादा पाकिस्तानी बंकरों को ध्वस्त करने वाले सेवानिवृत्त ले. कर्नल कंवरजीत सिंह के माता-पिता नहीं चाहते थे कि वह सेना में शामिल हों। अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने खूब मेहनत की। चंडीगढ़ के गुरु गोबिंद सिंह कॉलेज से पढ़ाई के दौरान उनकी मेहनत सफल हुई और एसएसबी (सर्विस सिलेक्शन बोर्ड) मेरठ के जरिए सेना में भर्ती के लिए उनका चयन हो गया। तब 105 विद्यार्थियों में से महज तीन का चयन हुआ था, जिसमें एक कंवरजीत सिंह भी थे।
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वर्तमान में पंचकूला सेक्टर-20 में रहने वाले सेवानिवृत्त ले. कर्नल कंवरजीत सिंह बताते हैं कि उनके दो बेटे हैं। बड़ा सेना में कर्नल है और दूसरा मर्चेंट नेवी में कैप्टन है। उन्होंने कहा कि हर घर से एक बेटा सेना में होना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में उनका परिवार शिमला शिफ्ट हो गया था। कुछ वर्षों बाद वहां से वह लोग चंडीगढ़ सेक्टर-23 आ गए। मैट्रिक पास करने के बाद वह एनडीए की परीक्षा में शामिल हुए लेकिन सफलता नहीं मिली। घर वालों ने भी कहा कि सेना में मत जाओ, यह तुम्हारे बस की बात नहीं। कुछ और देखो, लेकिन कंवरजीत सिंह का लक्ष्य बिल्कुल तय था।
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जनवरी 1971 में भारतीय सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के पद पर उनकी नियुक्ति हुई और तैनाती अंबाला में मिली। उसी साल अगस्त में लड़ाई की तैयारी के लिए कूच करने का आदेश मिला और कंवरजीत सिंह रातों रात बठिंडा पहुंच गए। तीन दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से जंग शुरू हो गई। उस समय उन्हें गन पोजिसिंग ऑफिसर की जिम्मेदारी दी गई। युद्ध के दौरान उन्होंने दुश्मनों के 20 से ज्यादा बंकर ध्वस्त किए। आखिरकार भारत ने 16 दिसंबर 1971 को यह जंग जीत ली। 11 महीने बाद कंवरजीत सिंह घर लौटे तो ढोल नगाड़ों के साथ स्वागत हुआ। मां ने पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी। बाद में सेना की ओर से उन्हें पश्चिमी स्टार पदक से नवाजा गया।
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दुश्मन करने वाले थे हमला, रातोंरात बदली जगह
सेवानिवृत्त ले. कर्नल कंवरजीत सिंह ने बताया कि जहां हम लोगों ने मोर्चा संभाला था, वहीं पर पाकिस्तानी सेना के हमले की सूचना मिली। तुरंत आदेश आ गए कि जगह को खाली करना है। रातोंरात हमारी 79 मीडियम रेजिमेंट बटालियन ने जगह को खाली कर दी। सूर्योदय होते ही दुश्मन ने हमला कर दिया और बंकर को उड़ा दिया, यदि समय पर बंकर खाली नहीं किया होता तो सारे मारे जाते। इस दौरान तीन दिन तक रेजिमेंट के लोग सो नहीं पाए थे।
जब गांव वाले चाय नाश्ता लेकर आए
1971 की लड़ाई के दौरान एक दिन फाजिल्का में 20 से 25 लोग बाल्टी लेकर दूर से आते दिखे। पहले लगा दुश्मन हैं। जब वे करीब आए तो पता चला कि पास के गांव के लोग हैं जो हमारे लिए चाय और नाश्ता लेकर आए थे। गांव वालों ने कहा आप लोग देश के लिए लड़ो, पूरा गांव आपके लिए खाना पकाएगा और आपके काम में हाथ बंटाएगा।
सेना से रिटायर होने के बाद भी काम करते रहे
सेना के प्रोफेशन में जो संतुष्टि मिलती है, वो कहीं और नहीं। कंवरजीत सिंह कहते हैं कि उन्होंने सेना में 36 साल नौकरी की। उसके बाद दो साल चंडीगढ़ सेक्टर-17 के एक इंस्टीट्यूट में एमएससी टूरिज्म की क्लासेज लीं। फिर मनीमाजरा में एक निजी संस्थान में काफी दिनों तक पर्सनालिटी डेवलपमेंट की क्लासेज लेता था। अब 74 साल का हो गया हूं। वर्तमान में गोल्फ खेलता हूं।
सेना में सबसे चुनौतीपूर्ण समय कब रहा
सिक्किम के जीमा में मेरी पोस्टिंग थी। सर्दी के दिनों में -9 डिग्री तापमान हो जाता था। पीने के लिए पानी तक नहीं मिलता था। वह समय काफी चुनौतीपूर्ण रहा।