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Panchkula News: दिव्यांग नेशनल अवार्डी को 12 साल से नौकरी का इंतजार, तपती गर्मी में फुटपाथ पर बैठ मांग रहा इंसाफ
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माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। शहर का पारा 40 डिग्री के पार है। गर्मी से बचाव के लिए प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग लोगों को जागरूक कर रहा है, लेकिन सेक्टर-1 मदर टेरेसा साकेत अर्थोपेडिक अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर इंसाफ के लिए तपती गर्मी में बैठे दिव्यांग सुरजीत सिंह पर अब तक किसी की नजर नहीं गई है। कृत्रिम अंग बनाने में नेशनल अवार्डी सुरजीत इस इंतजार में है कि 12 सालों की लंबी लड़ाई के बाद उसे एक न एक दिन दोबारा नौकरी अवश्य मिलेगी। वह कहता है कि मेरा सिर्फ इतना कसूर था कि गलत के खिलाफ आवाज उठा दिया। नतीजा जहां एक अनाथ को आश्रय के साथ शिक्षा और नौकरी मिली। उसी साकेत अस्पताल में उसके चरित्र पर सवाल भी खड़े कर दिए गए। अदालत ने उसे तीन माह बाद बरी कर दिया, लेकिन आज भी न तो उसे जिले में कहीं नौकरी मिली और ना ही पंचकूला मदर टेरेसा साकेत अर्थोपेडिक अस्पताल प्रबंधन उसे रखने को तैयार है।
दिव्यांग होकर दूसरों को दिया सहारा
सुरजीत अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, लेकिन वह सैकड़ों लोगों को कृत्रिम अंग के सहारे खड़ा कर चुका है। 2002 से 2006 तक सुरजीत ने सेक्टर-1 मदर टेरेसा अर्थोपेडिक अस्पताल में कृत्रिम अंग बनाने की ट्रेनिंग ली। 2007 से 2010 तक उसे साकेत में डीसी रेट पर काम किया। इस बीच उसे कृत्रिम अंग बनाने के लिए नेशनल अवार्ड भी मिला। सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक उसकी तबीयत खराब हो गई। करीब सात माह तक उसका टीवी का उपचार चंडीगढ़ में चला। इस बीच उसने साकेत प्रबंधन को मामले की सूचना भी दी। वह नौकरी करने में असमर्थ है, ठीक होते ही दोबारा नौकरी ज्वाइन कर लेगा, क्योंकि उस समय उसके मुंह से बार-बार खून आ रहा था। वह स्वस्थ होकर लौटा तो उसे नौकरी पर नहीं रखा गया। सुरजीत ने बताया कि इसके बाद वह कई महीनों तक धरने पर बैठा। मामले की शिकायत उसने राज्यपाल को दी। जांच शुरू होने वाली थी कि उसको छेड़छाड़ के झूठे केस में फंसा दिया, लेकिन सबूत के अभाव में कोर्ट ने उसे 2015 में बरी कर दिया।
यह है जिंदगी की दास्तां
चंडीगढ़ सेक्टर-15 सी के बाल निकेतन में सुरजीत को कोई छोड़ गया था। उसे माता-पिता का चेहरा भी याद नहीं है कि उसकी पहचान क्या है? उसके अनुसार वह सड़क से आया था और आज दर-दर की ठोकरें खा रहा है। उसके अनुसार बाल निकेतन से उसको सुरजीत नाम दिया। उसके बाद साल 1991 साकेत के हाई स्कूल में पढ़ाई के लिए भेजा गया। यहां दिव्यांगों का स्पेशल स्कूल था। उसके बाद वहां से मुझे कोई लेने नहीं आया। पहले तो मुझे लगा कि मेरा घर बाल निकेतन ही है। पहली गर्मी की छुट्टी हुई तो अपने घर जाने की जिद कर रोने लगा। उस समय एक साल गर्मी की छुट्टी में मुझे चंडीगढ़ भेजा गया। इसके बाद दोबारा कोई चंडीगढ़ लेकर नहीं गया। फिर दिल को समझा लिया कि मेरा कोई नहीं है। चंडीमंदिर में ही रहा, पला और बढ़ा। स्टडी के बाद मुझे साकेत में ही नौकरी मिल गई, लेकिन किस्मत ने यहां भी मेरा साथ नहीं छोड़ा।
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सुरजीत मेरे पास आया था। पहले वह यहां ठेके पर था। अभी यहां हम लोग नहीं रख सकते। वर्तमान में कौशल रोजगार निगम के तहत ही यहां भर्ती की जाती है। वह कौशल रोजगार निगम में रजिस्ट्रेशन करा ले। अगर यहां वैकेंसी होगी तो उसे रखा जाएगा। - रानी सिंह, डायरेक्टर, मदर टेरेसा, साकेत अर्थोपेडिक अस्पताल पंचकूला
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पंचकूला। शहर का पारा 40 डिग्री के पार है। गर्मी से बचाव के लिए प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग लोगों को जागरूक कर रहा है, लेकिन सेक्टर-1 मदर टेरेसा साकेत अर्थोपेडिक अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर इंसाफ के लिए तपती गर्मी में बैठे दिव्यांग सुरजीत सिंह पर अब तक किसी की नजर नहीं गई है। कृत्रिम अंग बनाने में नेशनल अवार्डी सुरजीत इस इंतजार में है कि 12 सालों की लंबी लड़ाई के बाद उसे एक न एक दिन दोबारा नौकरी अवश्य मिलेगी। वह कहता है कि मेरा सिर्फ इतना कसूर था कि गलत के खिलाफ आवाज उठा दिया। नतीजा जहां एक अनाथ को आश्रय के साथ शिक्षा और नौकरी मिली। उसी साकेत अस्पताल में उसके चरित्र पर सवाल भी खड़े कर दिए गए। अदालत ने उसे तीन माह बाद बरी कर दिया, लेकिन आज भी न तो उसे जिले में कहीं नौकरी मिली और ना ही पंचकूला मदर टेरेसा साकेत अर्थोपेडिक अस्पताल प्रबंधन उसे रखने को तैयार है।
दिव्यांग होकर दूसरों को दिया सहारा
सुरजीत अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, लेकिन वह सैकड़ों लोगों को कृत्रिम अंग के सहारे खड़ा कर चुका है। 2002 से 2006 तक सुरजीत ने सेक्टर-1 मदर टेरेसा अर्थोपेडिक अस्पताल में कृत्रिम अंग बनाने की ट्रेनिंग ली। 2007 से 2010 तक उसे साकेत में डीसी रेट पर काम किया। इस बीच उसे कृत्रिम अंग बनाने के लिए नेशनल अवार्ड भी मिला। सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक उसकी तबीयत खराब हो गई। करीब सात माह तक उसका टीवी का उपचार चंडीगढ़ में चला। इस बीच उसने साकेत प्रबंधन को मामले की सूचना भी दी। वह नौकरी करने में असमर्थ है, ठीक होते ही दोबारा नौकरी ज्वाइन कर लेगा, क्योंकि उस समय उसके मुंह से बार-बार खून आ रहा था। वह स्वस्थ होकर लौटा तो उसे नौकरी पर नहीं रखा गया। सुरजीत ने बताया कि इसके बाद वह कई महीनों तक धरने पर बैठा। मामले की शिकायत उसने राज्यपाल को दी। जांच शुरू होने वाली थी कि उसको छेड़छाड़ के झूठे केस में फंसा दिया, लेकिन सबूत के अभाव में कोर्ट ने उसे 2015 में बरी कर दिया।
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यह है जिंदगी की दास्तां
चंडीगढ़ सेक्टर-15 सी के बाल निकेतन में सुरजीत को कोई छोड़ गया था। उसे माता-पिता का चेहरा भी याद नहीं है कि उसकी पहचान क्या है? उसके अनुसार वह सड़क से आया था और आज दर-दर की ठोकरें खा रहा है। उसके अनुसार बाल निकेतन से उसको सुरजीत नाम दिया। उसके बाद साल 1991 साकेत के हाई स्कूल में पढ़ाई के लिए भेजा गया। यहां दिव्यांगों का स्पेशल स्कूल था। उसके बाद वहां से मुझे कोई लेने नहीं आया। पहले तो मुझे लगा कि मेरा घर बाल निकेतन ही है। पहली गर्मी की छुट्टी हुई तो अपने घर जाने की जिद कर रोने लगा। उस समय एक साल गर्मी की छुट्टी में मुझे चंडीगढ़ भेजा गया। इसके बाद दोबारा कोई चंडीगढ़ लेकर नहीं गया। फिर दिल को समझा लिया कि मेरा कोई नहीं है। चंडीमंदिर में ही रहा, पला और बढ़ा। स्टडी के बाद मुझे साकेत में ही नौकरी मिल गई, लेकिन किस्मत ने यहां भी मेरा साथ नहीं छोड़ा।
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सुरजीत मेरे पास आया था। पहले वह यहां ठेके पर था। अभी यहां हम लोग नहीं रख सकते। वर्तमान में कौशल रोजगार निगम के तहत ही यहां भर्ती की जाती है। वह कौशल रोजगार निगम में रजिस्ट्रेशन करा ले। अगर यहां वैकेंसी होगी तो उसे रखा जाएगा। - रानी सिंह, डायरेक्टर, मदर टेरेसा, साकेत अर्थोपेडिक अस्पताल पंचकूला