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बिना किसी ठोस व गंभीर अवैधता के दशकों पुरानी सेवा को नहीं कर सकते समाप्त: हाईकोर्ट
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26 साल पुरानी कानूनगो की भर्ती पर विवाद को हाईकोर्ट का विराम
दिव्यांग कोटे से नियुक्त कानूनगो की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने रखा बरकरार
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। करीब 26 वर्ष पुराने भर्ती विवाद को समाप्त करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दिव्यांग कोटे से नियुक्त राजस्व अधिकारी (कानूनगो) की नियुक्ति को निरस्त करने से इन्कार कर दिया है। जस्टिस नमित कुमार ने स्पष्ट किया कि दशकों पुरानी सेवा को बिना किसी ठोस और गंभीर अवैधता के इस अंतिम चरण में छेड़ा नहीं जा सकता।
मामला 24 मार्च 1999 को जारी भर्ती विज्ञापन से जुड़ा था जिसमें दिव्यांग श्रेणी के लिए आरक्षित पद के विरुद्ध कानूनगो की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि चयनित उम्मीदवार न तो दिव्यांग था और न ही किसी प्रकार की अक्षमता से ग्रस्त था। साथ ही उसका नाम विशेष रोजगार अधिकारी (दिव्यांग) द्वारा प्रायोजित नहीं किया गया था और उसे गलत तरीके से प्रशिक्षण के लिए भेजा गया।
वर्ष 2012 में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए चयन रद्द कर दिया था कि रोजगार कार्यालय द्वारा भेजी गई उम्मीदवारों की सूची वास्तविक नहीं थी। अदालत ने उस समय पाया था कि 5 अप्रैल 1999 के पत्र के जरिये केवल 20 उम्मीदवारों के नाम प्रायोजित किए गए थे जबकि बाद में एक अतिरिक्त नाम सामने आया, जिसे अदालत ने छेड़छाड़ की गई सूची बताया था। इसी आधार पर नियुक्ति रद्द कर दी गई और मेरिट सूची में अगले उम्मीदवार को नियुक्त करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद समीक्षा याचिका भी 1 जून 2012 को खारिज हो गई।
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हालांकि, अपील में तस्वीर बदल गई। डिवीजन बेंच ने माना कि एकल न्यायाधीश के समक्ष चयनित उम्मीदवार की ओर से प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया था और सही तथ्य अदालत के सामने नहीं आ सके। इसके चलते 2012 का फैसला और समीक्षा खारिज करने का आदेश रद्द कर मामला दोबारा मेरिट पर सुनवाई के लिए एकल पीठ को वापस भेज दिया गया। इस प्रकार हाईकोर्ट ने 1999 की भर्ती से जुड़े लंबे चले विवाद पर अंतिम मुहर लगाते हुए चयनित कानूनगो की नियुक्ति को बरकरार रखा।
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दिव्यांग कोटे से नियुक्त कानूनगो की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने रखा बरकरार
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। करीब 26 वर्ष पुराने भर्ती विवाद को समाप्त करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दिव्यांग कोटे से नियुक्त राजस्व अधिकारी (कानूनगो) की नियुक्ति को निरस्त करने से इन्कार कर दिया है। जस्टिस नमित कुमार ने स्पष्ट किया कि दशकों पुरानी सेवा को बिना किसी ठोस और गंभीर अवैधता के इस अंतिम चरण में छेड़ा नहीं जा सकता।
मामला 24 मार्च 1999 को जारी भर्ती विज्ञापन से जुड़ा था जिसमें दिव्यांग श्रेणी के लिए आरक्षित पद के विरुद्ध कानूनगो की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि चयनित उम्मीदवार न तो दिव्यांग था और न ही किसी प्रकार की अक्षमता से ग्रस्त था। साथ ही उसका नाम विशेष रोजगार अधिकारी (दिव्यांग) द्वारा प्रायोजित नहीं किया गया था और उसे गलत तरीके से प्रशिक्षण के लिए भेजा गया।
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वर्ष 2012 में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए चयन रद्द कर दिया था कि रोजगार कार्यालय द्वारा भेजी गई उम्मीदवारों की सूची वास्तविक नहीं थी। अदालत ने उस समय पाया था कि 5 अप्रैल 1999 के पत्र के जरिये केवल 20 उम्मीदवारों के नाम प्रायोजित किए गए थे जबकि बाद में एक अतिरिक्त नाम सामने आया, जिसे अदालत ने छेड़छाड़ की गई सूची बताया था। इसी आधार पर नियुक्ति रद्द कर दी गई और मेरिट सूची में अगले उम्मीदवार को नियुक्त करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद समीक्षा याचिका भी 1 जून 2012 को खारिज हो गई।
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हालांकि, अपील में तस्वीर बदल गई। डिवीजन बेंच ने माना कि एकल न्यायाधीश के समक्ष चयनित उम्मीदवार की ओर से प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया था और सही तथ्य अदालत के सामने नहीं आ सके। इसके चलते 2012 का फैसला और समीक्षा खारिज करने का आदेश रद्द कर मामला दोबारा मेरिट पर सुनवाई के लिए एकल पीठ को वापस भेज दिया गया। इस प्रकार हाईकोर्ट ने 1999 की भर्ती से जुड़े लंबे चले विवाद पर अंतिम मुहर लगाते हुए चयनित कानूनगो की नियुक्ति को बरकरार रखा।