{"_id":"61fc3b583b8dc251f0578726","slug":"dare-bravely-defeated-cancer-also-treated-22-women-pkl-office-news-pkl4410455170","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिम्मत, हौसले से कैंसर को हराया, 22 महिलाओं का उपचार भी कराया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हिम्मत, हौसले से कैंसर को हराया, 22 महिलाओं का उपचार भी कराया
विज्ञापन
डॉक्टर सरोज अग्रवाल।
- फोटो : PKL OFFICE
पंचकूला। हिम्मत, हौसले, सोच और कभी हार न मानने की जिद से कैंसर हार जाएगा। यह कहना है डॉक्टर सरोज अग्रवाल का। डॉक्टर सरोज ने 2007 जून में ब्रेस्ट कैंसर को हराने के बाद पंजाब, हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ी ऐसी महिलाओं को जागरूक किया, जो उपचार के लिए सामने नहीं आ रही थीं।
पीड़ित महिलाओं के घर जाकर उन्हें पहले जागरूक किया और बाद में उपचार भी कराया। पिछले 18 सालों मेें डॉक्टर सरोज 22 से ज्यादा महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूक कर उपचार करवा चुकी हैं। साथ ही हर माह एक महिला की कीमोथेरेपी का खर्च भी उठाती हैं। डॉक्टर कहती हैं कि मर्ज कोई भी हो उसे हराने में दवा, लोगों की दुआ और खुद का हौसला काम आता है। बात जब कैंसर जैसी भयावह बीमारी की हो तो आत्मबल की भूमिका और ज्यादा बढ़ जाती है।
जेठानी की मैमोग्राफी कराने गई, खुद का कराया तो निकला ब्रेस्ट कैंसर
पंचकूला सेक्टर-4 निवासी डॉक्टर सरोज अग्रवाल ने बताया कि 29 जुलाई 2006 में अपने जेठानी का कैंसर जांच के लिए मैमोग्राफी करवाने गई थीं। उनमें कैंसर की पुष्टि नहीं हुई। उस समय मेरी भी उम्र करीब 45 साल थी, लेकिन मुझे नहीं पता चल रहा था कि ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हूं, लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते सोचा कि खुद का भी जांच करवा लेती हूं। खुद का मैमोग्राफी कराया तो ब्रेस्ट कैंसर निकला। उस समय बड़ी मुश्किल से अपने आपको संभला। किसी तरह चंडीगढ़ सेक्टर-22 में एफएनएसी (फाइन निडिल एस्पिरेशन साइटोलॉजी)करवाया, जिसमें भी ब्रेस्ट कैंसर ही डायग्नोज हुआ। उस समय मेेरा बेटा महज सात साल का था। इसकी जानकारी अपने पति को भी उस समय नहीं दिया। पहले पीजीआई में तैनात दोस्तों को बताया और उन्हें तत्काल घर बुलाया और सारी बात बताई। मेरे दोस्तों ने ही बीमारी के बारे में मेरे पति को जानकारी दी और मेरा हौसला भी बढ़ाया। उस समय मेरा पूरा परिवार और दोस्त मेरे साथ ढाल बनकर खड़े रहे। मुझे लगा कि मैंने कैंसर से जंग जीत ली। उस समय मेरी ड्यूटी चंडीगढ़ सेक्टर-26 पुलिस अस्पताल में थी। पीजीआई नजदीक था, इसलिए उपचार के लिए पीजीआई को ही चुना और मेरी सर्जरी हुई।
विज्ञापन
बीमारी से डरें नहीं, लड़ेंगे तो ही जीत मिलेगी
डॉक्टर सरोज ने बताया कि सर्जरी के बाद 16 अगस्त से कीमोथेरेपी शुरू हुई। जो मेरे लिए बहुत कठिन दौर था। इसी बीच हर 21 दिन बाद आठ शीटिंग कीमोथेरेपी हुई। उस समय मेरे सिर के सारे बाल झड़ गए और नाखून काले पड़ गए। उस समय परिवार और मेरे दोस्तों ने हिम्मत दी और अच्छी किताबें सहारा बनीं। दूसरा पड़ाव भी मैंने पार कर लिया। तीसरा पड़ाव रेडियो थेरेपी का आया। इसमें मैंने ऑफिस से छुट्टी भी नहीं ली। सुबह आठ बजे से पहले पीजीआई पहुंच जाती थी, आधे घंटे में फ्री होने के बाद मरीजों के उपचार के लिए अस्पताल पहुंच जाती थी। छुट्टी इसलिए नहीं ली, क्योंकि लोगों से मिलूंगी। अस्पताल के स्टाफ के बीच पूरा दिन निकल जाएगा। ऐसे करने से अपने खुद में बहुत बदलाव देखा। पहले तो रूटीन और नौकरी को लेकर समय की पांबद थी ही, लेकिन बीमार होने के बाद और अनुशासित हो गई। इसलिए बीमारी कोई भी हो डरें नहीं, लड़ेंगे तभी जीत मिलेगी।
हकीमों के पास झाड़ा लगवाने की भी दी सलाह
डॉक्टर सरोज ने बताया कि कैंसर बीमारी का पता चलने के बाद कई लोगों ने कहा कि किसी ने जादू टोना करवा दिया होगा। मुझे हकीमों के पास जाकर झाड़ा लगवाना चाहिए, लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते अपने आपको संभाला और भगवान पर विश्वास रख अपना उपचार कराया। आज मैं स्वस्थ हूं। इसके बाद मेरी पोस्टिंग पंचकूला सेक्टर-6 के नागरिक अस्पताल में हो गई। जहां 2012 में आयोजित 5 किलोमीटर मैराथन में भी हिस्सा लिया। जिला स्वास्थ्य विभाग से ही डिप्टी सिविल सर्जन रिटायर हुई हूं, लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी मैंने काम को प्राथमिकता दी और अस्पताल में सेवाएं दे रही हूं।
विज्ञापन
पीड़ित महिलाओं के घर जाकर उन्हें पहले जागरूक किया और बाद में उपचार भी कराया। पिछले 18 सालों मेें डॉक्टर सरोज 22 से ज्यादा महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूक कर उपचार करवा चुकी हैं। साथ ही हर माह एक महिला की कीमोथेरेपी का खर्च भी उठाती हैं। डॉक्टर कहती हैं कि मर्ज कोई भी हो उसे हराने में दवा, लोगों की दुआ और खुद का हौसला काम आता है। बात जब कैंसर जैसी भयावह बीमारी की हो तो आत्मबल की भूमिका और ज्यादा बढ़ जाती है।
विज्ञापन
जेठानी की मैमोग्राफी कराने गई, खुद का कराया तो निकला ब्रेस्ट कैंसर
पंचकूला सेक्टर-4 निवासी डॉक्टर सरोज अग्रवाल ने बताया कि 29 जुलाई 2006 में अपने जेठानी का कैंसर जांच के लिए मैमोग्राफी करवाने गई थीं। उनमें कैंसर की पुष्टि नहीं हुई। उस समय मेरी भी उम्र करीब 45 साल थी, लेकिन मुझे नहीं पता चल रहा था कि ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हूं, लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते सोचा कि खुद का भी जांच करवा लेती हूं। खुद का मैमोग्राफी कराया तो ब्रेस्ट कैंसर निकला। उस समय बड़ी मुश्किल से अपने आपको संभला। किसी तरह चंडीगढ़ सेक्टर-22 में एफएनएसी (फाइन निडिल एस्पिरेशन साइटोलॉजी)करवाया, जिसमें भी ब्रेस्ट कैंसर ही डायग्नोज हुआ। उस समय मेेरा बेटा महज सात साल का था। इसकी जानकारी अपने पति को भी उस समय नहीं दिया। पहले पीजीआई में तैनात दोस्तों को बताया और उन्हें तत्काल घर बुलाया और सारी बात बताई। मेरे दोस्तों ने ही बीमारी के बारे में मेरे पति को जानकारी दी और मेरा हौसला भी बढ़ाया। उस समय मेरा पूरा परिवार और दोस्त मेरे साथ ढाल बनकर खड़े रहे। मुझे लगा कि मैंने कैंसर से जंग जीत ली। उस समय मेरी ड्यूटी चंडीगढ़ सेक्टर-26 पुलिस अस्पताल में थी। पीजीआई नजदीक था, इसलिए उपचार के लिए पीजीआई को ही चुना और मेरी सर्जरी हुई।
विज्ञापन
बीमारी से डरें नहीं, लड़ेंगे तो ही जीत मिलेगी
डॉक्टर सरोज ने बताया कि सर्जरी के बाद 16 अगस्त से कीमोथेरेपी शुरू हुई। जो मेरे लिए बहुत कठिन दौर था। इसी बीच हर 21 दिन बाद आठ शीटिंग कीमोथेरेपी हुई। उस समय मेरे सिर के सारे बाल झड़ गए और नाखून काले पड़ गए। उस समय परिवार और मेरे दोस्तों ने हिम्मत दी और अच्छी किताबें सहारा बनीं। दूसरा पड़ाव भी मैंने पार कर लिया। तीसरा पड़ाव रेडियो थेरेपी का आया। इसमें मैंने ऑफिस से छुट्टी भी नहीं ली। सुबह आठ बजे से पहले पीजीआई पहुंच जाती थी, आधे घंटे में फ्री होने के बाद मरीजों के उपचार के लिए अस्पताल पहुंच जाती थी। छुट्टी इसलिए नहीं ली, क्योंकि लोगों से मिलूंगी। अस्पताल के स्टाफ के बीच पूरा दिन निकल जाएगा। ऐसे करने से अपने खुद में बहुत बदलाव देखा। पहले तो रूटीन और नौकरी को लेकर समय की पांबद थी ही, लेकिन बीमार होने के बाद और अनुशासित हो गई। इसलिए बीमारी कोई भी हो डरें नहीं, लड़ेंगे तभी जीत मिलेगी।
हकीमों के पास झाड़ा लगवाने की भी दी सलाह
डॉक्टर सरोज ने बताया कि कैंसर बीमारी का पता चलने के बाद कई लोगों ने कहा कि किसी ने जादू टोना करवा दिया होगा। मुझे हकीमों के पास जाकर झाड़ा लगवाना चाहिए, लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते अपने आपको संभाला और भगवान पर विश्वास रख अपना उपचार कराया। आज मैं स्वस्थ हूं। इसके बाद मेरी पोस्टिंग पंचकूला सेक्टर-6 के नागरिक अस्पताल में हो गई। जहां 2012 में आयोजित 5 किलोमीटर मैराथन में भी हिस्सा लिया। जिला स्वास्थ्य विभाग से ही डिप्टी सिविल सर्जन रिटायर हुई हूं, लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी मैंने काम को प्राथमिकता दी और अस्पताल में सेवाएं दे रही हूं।