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महिला कर्मियों के सास-ससुर को चिकित्सा बिल प्रतिपूर्ति पर हो विचार: हाईकोर्ट

Fri, 30 Aug 2024 06:40 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 30 Aug 2024 06:40 AM IST
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Consideration should be given to reimbursement of medical bills to in-laws of female employees: High Court
चंडीगढ़। एक महिला कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सेवा (चिकित्सा परिचर्या) नियम 1940 में संशोधन पर विचार करने का आदेश दिया है। वर्तमान में इसके तहत चिकित्सा खर्च प्रतिपूर्ति के लाभ के लिए केवल महिला कर्मचारी के जैविक माता-पिता को लाभ दिया गया है।
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मोहाली निवासी एक महिला कर्मचारी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए पंजाब सेवा (चिकित्सा उपस्थिति) नियम 1940 के उस प्रावधान को चुनौती दी थी, जिसमें परिवार की परिभाषा में केवल उसके जैविक माता-पिता शामिल हैं, न कि ससुराल वाले। वर्तमान में चिकित्सकीय खर्च की प्रतिपूर्ति लाभ के लिए सास-ससुर इस परिभाषा में नहीं हैं, भले ही उक्त महिला कर्मचारी विवाह के बाद अपने ससुराल वालों के साथ अपने वैवाहिक घर में रह रही हो।
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कोर्ट को बताया गया कि एक बार जब महिला कर्मचारी विवाह के बाद अपने ससुराल वालों के साथ रह रही है, तो महिला कर्मचारियों को यह विकल्प दिया जाना चाहिए कि क्या वे 1940 के नियमों के तहत चिकित्सा प्रतिपूर्ति का लाभ जैविक माता-पिता या ससुराल वालों को देना चाहेगी जो विवाह के बाद उस पर निर्भर हैं। इस पर सरकार की तरफ से कहा गया कि यह राज्य का विशेषाधिकार है कि वह तय करे कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति के लिए कौन पात्र होगा।
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सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि नियम इस उद्देश्य से जारी किए गए थे कि एक परिवार जो किसी कर्मचारी पर निर्भर है, उसे भी चिकित्सा सुविधाएं मिलनी चाहिए। अविवाहित महिला कर्मचारियों या तलाकशुदा महिला कर्मचारियों या अलग हुई महिला कर्मचारियों के मामले में कोई समस्या नहीं है क्योंकि जैविक माता-पिता को पहले से ही परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब भारत सरकार द्वारा अपनी महिला कर्मचारियों को चिकित्सा सुविधा के अनुदान के लिए जैविक परिवार या ससुराल वालों में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया गया है, तो राज्य को इस मुद्दे पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के परामर्श से इस मुद्दे पर भारत सरकार व हरियाणा सरकार द्वारा इस मामले में लिए गए निर्णय को दिमाग में रख कर आठ सप्ताह में उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस बाबत 25 अक्टूबर को मुख्य सचिव को हलफनामा दायर करने का आदेश भी दिया।
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