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उधार के जूते से किक लगा झारखंड की बेटियों ने टीम की कर दी चांदी
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पंचकूला। खेलो इंडिया यूथ गेम्स में झारखंड से फुटबाल टीम में हिस्सा लेने पहुंचीं बेटियों की कहानी दिल को झकझोरने वाली है। वे बड़ी संघर्षों के बाद यहां तक पहली बार पहुंच पाई हैं। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक बेटी के पास खेलो इंडिया यूथ गेम्स में खेलने के लिए पैरों में जूते तक नहीं थे। एक महिला से उधार जूते लेकर वह खेल के मैदान उतरी। वहीं नक्सल एरिया से होने के बाद भी एक बेटी गेम्स का हिस्सा बनी है जहां डर के साए में पूरे गांव के लोगों की जिंदगी व्यतीत होती है। यहां माता-पिता बच्चों को हायर एजुकेशन के लिए गांव से बाहर नहीं भेजते। एक बेटी अपनी बीमार मां को मंजे पर पड़ोसी के सहारे छोड़कर आई है। फिर भी इन बेटियों ने देशभर से पहुंचे दूसरे राज्यों को बराबर की टक्कर दी और रजत पदक जीत लिया।
पकौड़े की दुकान से चलता है घर का खर्चा
रांची के जोरटांगा गांव की निशा लिंडा के पास खेलो इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने के लिए पैरों में जूते तक नहीं थे। खेल इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने के लिए आर्थिक तंगी की वजह से निशा के पिता विजय और मां सुनीता ने मना कर दिया था। उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि बेटी को जूते खरीदकर दे सकें। निशा एक महिला से उधार जूते लेकर ताऊ देवीलाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में हिस्सा लेने पहुंची। निशा ने बताया कि दो जून की रोटी के लिए माता-पिता रेहड़ी पर गांव की मार्केट में पकौड़े का दुकान लगाते हैं। एक दिन में महज 100 से 200 रुपये की कमाई होती है। घरवालों को खाना ही बड़ी मुश्किल से नसीब होता है। हरियाणा में आकर पता चला कि खिलाड़ियों को डाइट भी मिलती है। हरियाणा के खिलाड़ियों की तरह झारखंड में भी बेटियों को सुविधा मिले तो वे भी विश्व, एशियन व ओलंपिक जैसे खेलों में पदक ला सकते हैं।
किसी बेटी के सिर से पिता का साया न छीने, मां कुआं खोद पालती हैं हमें
भगवान अगर किसी को बेटी दे तो उसके सिर से पिता का साया न छीने। मुझे पता है कि बिना पिता के एक गरीब परिवार की बेटी की इच्छाएं मन में कैसे दफन होती हैं। सात साल की उम्र में पिता का साया सिर से छीन गया। मां पूरा दिन कुंआ खोद और लोगों खेतों में काम कर तीन बच्चों सहित अपना पेट कैैसे पालती है। ये कहना है खेलो इंडिया यूथ गेम्स में झारखंड की फुटबाल टीम के साथ हिस्सा लेने पंचकूला पहुंची अनिशा उरांव का। अनिशा ने बताया कि जहां हम लोग ठहरे हैं, वहां कुछ खिलाड़ियों के साथ हमारी टीम भी मार्केट में घूमने गई थी, सबने अपने लिए कुछ न कुछ खरीदा पर हमारे पास पैसे नहीं थे कि हम लोग भी कुछ खरीद पाएं। यहां अपनी इच्छाओं को मारना ही पड़ा। राज्य सरकार हरियाणा के खिलाड़ियों की तरह सुविधांए दे तो हम भी उड़ान भर सकते हैं।
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डर के साए में बीतता है, नक्सली इलाके की बेटी का हर दिन
खेलो इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने पहुंची हैं झारखंड के गुमला जिला के अनाबेरी गांव की शिवानी। वह बताती हैं कि उसका ट्रेनिंग सेंटर उनके गांव से 5 से 7 किलोमीटर दूर है। जंगलों के रास्ते रोजाना सुबह और शाम अपने ट्रेनिंग स्कूल संत पत्रिका जाना पड़ता है। यह एरिया नक्सलियों के आतंक से परेशान है। यहां लोगों को सरेआम गोली मार दी जाती है। पुलिस प्रशासन ने बहुत कंट्रोल किया है, लेकिन नक्सली कब किस पर मौत बनकर आ जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। शिवानी बताती है कि उसके गांव में हायर एजुकेशन के लिए माता-पिता बेटियों को घर से बाहर नहीं भेजते, क्योंकि वह डर के साए में जीते हैं। वह रोजाना घर से ट्रेनिंग सेंटर पर फुटबाल की ट्रेनिंग के लिए जरूर निकलती है, लेकिन उसके माता-पिता को उसकी सलामती की चिंता रोजाना सताती है, लेकिन उसने ठान रखा है कि उसे देश के लिए कुछ करना है और आगे बढ़ना है। बेटी की यही बात सुनकर वह चुप हो जाते हैं।
खेल से पैसे मिले तो खेती के लिए बीज खरीदे
झारखंड की बबीता ने बताया कि उसके पिता महेश्वर मूंडा और मां अष्टमी देवी लकड़ी बेचते हैं। पूरे दिन में 100 से 150 रुपये कमा लेते हैं जिससे उसका घर चलता है। उसने बताया कि वह खेलो इंडिया में यूथ गेम्स में दूूसरी बार हिस्सा लेने पहुंची है। इससे पहले कुरुक्षेत्र में आयोजित स्कूल नेशनल में उसने रजत पदक जीता था, जिसमें उसे 15 हजार रुपये मिले थे, उन पैसों से खेती के लिए पापा ने बीज खरीदे और जो पैसे बचे पढ़ाई में खर्च हो गए। उन्होंने कहा कि अगर दूसरे राज्यों की तरह स्कॉलरशिप मिले तो हमलोग भी आगे बढ़ सकते हैं।
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पकौड़े की दुकान से चलता है घर का खर्चा
रांची के जोरटांगा गांव की निशा लिंडा के पास खेलो इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने के लिए पैरों में जूते तक नहीं थे। खेल इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने के लिए आर्थिक तंगी की वजह से निशा के पिता विजय और मां सुनीता ने मना कर दिया था। उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि बेटी को जूते खरीदकर दे सकें। निशा एक महिला से उधार जूते लेकर ताऊ देवीलाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में हिस्सा लेने पहुंची। निशा ने बताया कि दो जून की रोटी के लिए माता-पिता रेहड़ी पर गांव की मार्केट में पकौड़े का दुकान लगाते हैं। एक दिन में महज 100 से 200 रुपये की कमाई होती है। घरवालों को खाना ही बड़ी मुश्किल से नसीब होता है। हरियाणा में आकर पता चला कि खिलाड़ियों को डाइट भी मिलती है। हरियाणा के खिलाड़ियों की तरह झारखंड में भी बेटियों को सुविधा मिले तो वे भी विश्व, एशियन व ओलंपिक जैसे खेलों में पदक ला सकते हैं।
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किसी बेटी के सिर से पिता का साया न छीने, मां कुआं खोद पालती हैं हमें
भगवान अगर किसी को बेटी दे तो उसके सिर से पिता का साया न छीने। मुझे पता है कि बिना पिता के एक गरीब परिवार की बेटी की इच्छाएं मन में कैसे दफन होती हैं। सात साल की उम्र में पिता का साया सिर से छीन गया। मां पूरा दिन कुंआ खोद और लोगों खेतों में काम कर तीन बच्चों सहित अपना पेट कैैसे पालती है। ये कहना है खेलो इंडिया यूथ गेम्स में झारखंड की फुटबाल टीम के साथ हिस्सा लेने पंचकूला पहुंची अनिशा उरांव का। अनिशा ने बताया कि जहां हम लोग ठहरे हैं, वहां कुछ खिलाड़ियों के साथ हमारी टीम भी मार्केट में घूमने गई थी, सबने अपने लिए कुछ न कुछ खरीदा पर हमारे पास पैसे नहीं थे कि हम लोग भी कुछ खरीद पाएं। यहां अपनी इच्छाओं को मारना ही पड़ा। राज्य सरकार हरियाणा के खिलाड़ियों की तरह सुविधांए दे तो हम भी उड़ान भर सकते हैं।
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डर के साए में बीतता है, नक्सली इलाके की बेटी का हर दिन
खेलो इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने पहुंची हैं झारखंड के गुमला जिला के अनाबेरी गांव की शिवानी। वह बताती हैं कि उसका ट्रेनिंग सेंटर उनके गांव से 5 से 7 किलोमीटर दूर है। जंगलों के रास्ते रोजाना सुबह और शाम अपने ट्रेनिंग स्कूल संत पत्रिका जाना पड़ता है। यह एरिया नक्सलियों के आतंक से परेशान है। यहां लोगों को सरेआम गोली मार दी जाती है। पुलिस प्रशासन ने बहुत कंट्रोल किया है, लेकिन नक्सली कब किस पर मौत बनकर आ जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। शिवानी बताती है कि उसके गांव में हायर एजुकेशन के लिए माता-पिता बेटियों को घर से बाहर नहीं भेजते, क्योंकि वह डर के साए में जीते हैं। वह रोजाना घर से ट्रेनिंग सेंटर पर फुटबाल की ट्रेनिंग के लिए जरूर निकलती है, लेकिन उसके माता-पिता को उसकी सलामती की चिंता रोजाना सताती है, लेकिन उसने ठान रखा है कि उसे देश के लिए कुछ करना है और आगे बढ़ना है। बेटी की यही बात सुनकर वह चुप हो जाते हैं।
खेल से पैसे मिले तो खेती के लिए बीज खरीदे
झारखंड की बबीता ने बताया कि उसके पिता महेश्वर मूंडा और मां अष्टमी देवी लकड़ी बेचते हैं। पूरे दिन में 100 से 150 रुपये कमा लेते हैं जिससे उसका घर चलता है। उसने बताया कि वह खेलो इंडिया में यूथ गेम्स में दूूसरी बार हिस्सा लेने पहुंची है। इससे पहले कुरुक्षेत्र में आयोजित स्कूल नेशनल में उसने रजत पदक जीता था, जिसमें उसे 15 हजार रुपये मिले थे, उन पैसों से खेती के लिए पापा ने बीज खरीदे और जो पैसे बचे पढ़ाई में खर्च हो गए। उन्होंने कहा कि अगर दूसरे राज्यों की तरह स्कॉलरशिप मिले तो हमलोग भी आगे बढ़ सकते हैं।