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Panchkula News: बिक्रम सिंह मजीठिया को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, नियमित जमानत याचिका खारिज
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चंडीगढ़। पूर्व कैबिनेट मंत्री और शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया को बड़ा झटका देते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार मामले में सामने आए वित्तीय लेनदेन, कंपनियों का जाल और विदेशी स्रोतों से हुई संदिग्ध धनराशि की आवाजाही गंभीर आर्थिक अपराधों की ओर इशारा करती है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि तीन माह में समग्र जांच पूरी की जाए। यदि ऐसा नहीं होता तो याची नई जमानत याचिका दायर कर सकता है।
20 पन्ने के आदेश में जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा कि ऐसे मामलों में जमानत देने में अत्यधिक सतर्कता बरती जानी चाहिए जहां इस प्रकार के गंभीर अपराध हों। मजीठिया के खिलाफ 25 जून को भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत विजिलेंस ब्यूरो मोहाली ने मामला दर्ज किया था। एफआईआर का आधार उस एसआईटी रिपोर्ट को माना गया, जो 2021 के एनडीपीएस मामले की जांच के दौरान सामने आई थी। रिपोर्ट में मजीठिया और उनकी पत्नी के पास कथित तौर पर 540 करोड़ से अधिक की संदिग्ध संपत्ति मिलने का जिक्र किया गया था।
एफआईआर और राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में बताया गया कि 2007 में विधायक और फिर मंत्री बनने के बाद मजीठिया और उनके परिवार की कंपनियों विशेषकर सराया इंडस्ट्रीज लिमिटेड में अचानक भारी मात्रा में नकदी जमा होने लगी। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक अपराध एक अलग श्रेणी है, जिनमें गहरी साजिश और सार्वजनिक धन का भारी दुरुपयोग शामिल होता है। ऐसे मामलों में जमानत देने का दृष्टिकोण सामान्य अपराधों से भिन्न होना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मजीठिया की राजनीतिक हैसियत और प्रभाव को देखते हुए यह आशंका नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि वे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं या जांच को बाधित कर सकते हैं।
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मजीठिया की ओर से दलील दी गई थी कि यह मामला केवल एनडीपीएस मामले के पुराने आरोपों का पुनरावर्तन है और सरकार की वेंडेटा पॉलिटिक्स है। अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि एनडीपीएस मामले की जांच के दौरान सामने आए नए तथ्यों और बड़ी साजिश के संकेत के आधार पर दूसरी एफआईआर दर्ज करना कानून के अनुरूप है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता लेकिन इस मामले में हिरासत जरूरी है।
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20 पन्ने के आदेश में जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा कि ऐसे मामलों में जमानत देने में अत्यधिक सतर्कता बरती जानी चाहिए जहां इस प्रकार के गंभीर अपराध हों। मजीठिया के खिलाफ 25 जून को भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत विजिलेंस ब्यूरो मोहाली ने मामला दर्ज किया था। एफआईआर का आधार उस एसआईटी रिपोर्ट को माना गया, जो 2021 के एनडीपीएस मामले की जांच के दौरान सामने आई थी। रिपोर्ट में मजीठिया और उनकी पत्नी के पास कथित तौर पर 540 करोड़ से अधिक की संदिग्ध संपत्ति मिलने का जिक्र किया गया था।
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एफआईआर और राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में बताया गया कि 2007 में विधायक और फिर मंत्री बनने के बाद मजीठिया और उनके परिवार की कंपनियों विशेषकर सराया इंडस्ट्रीज लिमिटेड में अचानक भारी मात्रा में नकदी जमा होने लगी। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक अपराध एक अलग श्रेणी है, जिनमें गहरी साजिश और सार्वजनिक धन का भारी दुरुपयोग शामिल होता है। ऐसे मामलों में जमानत देने का दृष्टिकोण सामान्य अपराधों से भिन्न होना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मजीठिया की राजनीतिक हैसियत और प्रभाव को देखते हुए यह आशंका नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि वे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं या जांच को बाधित कर सकते हैं।
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मजीठिया की ओर से दलील दी गई थी कि यह मामला केवल एनडीपीएस मामले के पुराने आरोपों का पुनरावर्तन है और सरकार की वेंडेटा पॉलिटिक्स है। अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि एनडीपीएस मामले की जांच के दौरान सामने आए नए तथ्यों और बड़ी साजिश के संकेत के आधार पर दूसरी एफआईआर दर्ज करना कानून के अनुरूप है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता लेकिन इस मामले में हिरासत जरूरी है।