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रिवांश मौत मामला- वकीलों के दवाब के बाद पीजीआई ने बनाई जांच कमेटी
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चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के वकीलों के दबाव के बाद आखिरकार बुधवार को पीजीआई ने 11 महीने के रिवांश की मौत के मामले में जांच कमेटी का गठन कर दिया। आज हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का एक पैनल पीजीआई डायरेक्टर से मिलने पहुंचा और जांच कमेटी बनाने की मांग की।
एनेस्थीसिया विभाग के हेड जीडी पुरी की अध्यक्षता में बनी 7 सदस्यों की इस कमेटी में 5 डाक्टर व 2 वकीलों को शामिल किया गया है। यह कमेटी 7 दिन में जांच कर पीजीआई के डायरेक्टर प्रो. जगतराम को रिपोर्ट सौंपेगी। गठित कमेटी में एनेस्थीसिया विभाग के हेड जीडी पुरी, प्रो. आशुतोष एन अग्रवाल, प्रो. जयश्री मुरलीधरण, प्रो. एसपी मंडल, डॉ रंजन सिंह और दो वकील विकास मलिक व आईपीएस कोहली शामिल हैं। वकीलों के पैनल ने रिवांश की पूरी मेडिकल रिपोर्ट, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग आदि की भी मांग की, जिसे पीजीआई के डायरेक्टर ने मान लिया।
बच्चे की सांस की नली में फंस गया था बादाम
सेक्टर-18 निवासी रोहित तायल के मुताबिक उनके 11 महीने के बेटे ने बादाम निगल लिया था। वह बादाम उसकी सांस की नली में फंस गया था। वे पहले उसे पंचकूला के एक अस्पताल लेकर गए। वहां से उसे पीजीआई रेफर कर दिया गया। पीजीआई में डॉक्टरों ने परिजनों से ब्रोंकोस्कोपी की अनुमति मांगी, लेकिन यह कहकर डरा दिया कि इस दौरान बच्चे की मौत भी हो सकती है। इससे वह घबरा गए। डाक्टर चाहते तो इसे तरीके से बता सकते थे, लेकिन उनके व्यवहार में काफी तल्खी थी। उन्होंने सोचने का बिल्कुल भी वक्त नहीं दिया। हालांकि करीब एक घंटे बाद उन्होंने ब्रोंकोस्कोपी की अनुमति दे दी, लेकिन डॉक्टर इलाज करने को तैयार नहीं हुए। डॉक्टर इस बात पर अड़े रहे कि उन्होंने पहले उन्हें अनुमति क्यों नहीं दी। परिजनों का कहना है कि वे कई बार डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़ाए, लेकिन उनके व्यवहार में नरमी नहीं आई। बच्चा दो अप्रैल को शाम 6 बजे पीजीआई पहुंच गया था और 3 अप्रैल को सुबह छह बजे तक उसे इलाज नहीं मिला। जब बच्चे ने सांस लेना बंद कर दिया, तब डॉक्टर आए और उसके इलाज की कोशिश करने लगे। तब तक बच्चा दम तोड़ चुका था। हालांकि पीजीआई का कहना है कि उनके पास इस बात के पुख्ता रिकार्ड हैं कि बच्चे के परिजनों ने ब्रोंकोस्कोपी की अनुमति नहीं दी थी। आपरेशन थियेटर तो सुबह 4 बजे तक चलता रहा। यदि वे इजाजत देते तो बच्चे का आपरेशन जरूर करते।
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एनेस्थीसिया विभाग के हेड जीडी पुरी की अध्यक्षता में बनी 7 सदस्यों की इस कमेटी में 5 डाक्टर व 2 वकीलों को शामिल किया गया है। यह कमेटी 7 दिन में जांच कर पीजीआई के डायरेक्टर प्रो. जगतराम को रिपोर्ट सौंपेगी। गठित कमेटी में एनेस्थीसिया विभाग के हेड जीडी पुरी, प्रो. आशुतोष एन अग्रवाल, प्रो. जयश्री मुरलीधरण, प्रो. एसपी मंडल, डॉ रंजन सिंह और दो वकील विकास मलिक व आईपीएस कोहली शामिल हैं। वकीलों के पैनल ने रिवांश की पूरी मेडिकल रिपोर्ट, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग आदि की भी मांग की, जिसे पीजीआई के डायरेक्टर ने मान लिया।
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बच्चे की सांस की नली में फंस गया था बादाम
सेक्टर-18 निवासी रोहित तायल के मुताबिक उनके 11 महीने के बेटे ने बादाम निगल लिया था। वह बादाम उसकी सांस की नली में फंस गया था। वे पहले उसे पंचकूला के एक अस्पताल लेकर गए। वहां से उसे पीजीआई रेफर कर दिया गया। पीजीआई में डॉक्टरों ने परिजनों से ब्रोंकोस्कोपी की अनुमति मांगी, लेकिन यह कहकर डरा दिया कि इस दौरान बच्चे की मौत भी हो सकती है। इससे वह घबरा गए। डाक्टर चाहते तो इसे तरीके से बता सकते थे, लेकिन उनके व्यवहार में काफी तल्खी थी। उन्होंने सोचने का बिल्कुल भी वक्त नहीं दिया। हालांकि करीब एक घंटे बाद उन्होंने ब्रोंकोस्कोपी की अनुमति दे दी, लेकिन डॉक्टर इलाज करने को तैयार नहीं हुए। डॉक्टर इस बात पर अड़े रहे कि उन्होंने पहले उन्हें अनुमति क्यों नहीं दी। परिजनों का कहना है कि वे कई बार डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़ाए, लेकिन उनके व्यवहार में नरमी नहीं आई। बच्चा दो अप्रैल को शाम 6 बजे पीजीआई पहुंच गया था और 3 अप्रैल को सुबह छह बजे तक उसे इलाज नहीं मिला। जब बच्चे ने सांस लेना बंद कर दिया, तब डॉक्टर आए और उसके इलाज की कोशिश करने लगे। तब तक बच्चा दम तोड़ चुका था। हालांकि पीजीआई का कहना है कि उनके पास इस बात के पुख्ता रिकार्ड हैं कि बच्चे के परिजनों ने ब्रोंकोस्कोपी की अनुमति नहीं दी थी। आपरेशन थियेटर तो सुबह 4 बजे तक चलता रहा। यदि वे इजाजत देते तो बच्चे का आपरेशन जरूर करते।
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