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वसीम बरेलवी का इंटरव्यू
Updated Mon, 27 Nov 2017 01:42 AM IST
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हमको महसूस किया जाए है खुशबू की तरह...
- चंडीगढ़ पहुंचे वसीम बरेलवी बोले, जब तक रहेंगे जज्बात, तब तक शायरी
‘हमको महसूस किया जाए है खुशब की तरह
हम कोई शोर नहीं हैं जो सुनाई देंगे’
‘हर शख्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ,
फिर यह भी चाहता है कि उसे रास्ता मिले।’
चंडीगढ़।
किसी को महसूस होने का तरीका इस शेयर के बाहर कहीं नहीं हो सकता और ये अंदाज है वसीम बरेलवी का। जिनकी प्रसिद्धि देश विदेश में किसी जान पहचान की मोहताज नहीं। बरेलवी कहते हैं कि हमारे देश की वर्षों पुरानी विचारधारा है। हमारे देश में सहनशीलता बहुत है। हमारी सभ्यता पांच हजार वर्ष पुरानी है। यही कारण है कि हिंदुस्तान के अंदर इतनी तहजीबें, इतनी भाषाएं, इतनी जातियां व इतनी क्षेत्रीयता एक साथ पनप रही है। किसी भी देश में ऐसा नहीं है। इस वजह से ही भारत विश्व गुरु बना और बना रहेगा।
उन्होंने कहा कि मोहब्बत व रचनात्मकता हमारी रग रग में है। यही कारण है कि हम लोग जज्बाती हैं। जज्बात जहां होते हैं वहां शायरी होती है। यही वजह है कि शायरी कभी खत्म नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि साहित्य अब चौथा स्तंभ है। जिसको ज्यादा से ज्यादा मजबूत किया जाना चाहिए। इसमें सभी का अहम योगदान होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज को शिक्षित करने के लिए अच्छे शिक्षण संस्थान आवश्यक हैं। हर जिले में पब्लिक स्कूलों की तर्ज पर एक-एक मॉडल शिक्षण संस्थान बनाए। बच्चे पब्लिक स्कूलों के बजाय इस स्कूल में आएं। समाज जब शिक्षित होगा, तभी उसका विकास होगा। वसीम बरेलवी ने कहा कि चंडीगढ़ लेक क्लब में जब उनका माइक बंद करवा दिया गया तो उसके बाद भी जो भीड़ उन्होंने देखी तो उनको ऐसा लगा कि वास्तव में यह शुभ संकेत है। लोग शायरी सुनना चाहते हैं, करीब आधा घंटा तक लोग खड़े होकर बिना माइक के शायरी सुनते रहे। उन्होंने कहा कि इससे ही लगा कि शायरी का भविष्य शानदार है। उन्होंने कहा कि वह कई बार आईआईटी में गए हैं, बेशक समाज में तेजी आ चुकी है, मशीनी युग हो चुका है पर इंसान का दिल मशीनी नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले जब मुशायरे होते थे तभी लोग सुनने आते थे। लेकिन अब यू ट्यूब और अन्य सोशल मीडिया के माध्यम से समाज ने मुशायरे को सुनना शुरू कर दिया है। अब इंटरनेशनल लेवल पर शायरी छा चुकी है। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे ऐसे युवा देखे हैं जिनके सामने आप एक मिसरा पढ़ें और दूसरा वह पूरा कर देते हैं। फिर वह पाश्चात्य सभ्यता पर आते हैं और कहते हैं कि संस्कारों को हमेशा बरकरार रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोगों को देखा है कि वह भीड़ के पास जाने की कोशिश करते हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, साहित्य से समझौता न करके खुद लोगों को अपने पास लेकर आना चाहिए। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि फिल्मों से मासूमियत खत्म हो चुकी है। पहले लोग एक ही फिल्म को कई बार देखते थे अब ऐसा नहीं रह गया है।
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- चंडीगढ़ पहुंचे वसीम बरेलवी बोले, जब तक रहेंगे जज्बात, तब तक शायरी
‘हमको महसूस किया जाए है खुशब की तरह
हम कोई शोर नहीं हैं जो सुनाई देंगे’
‘हर शख्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ,
फिर यह भी चाहता है कि उसे रास्ता मिले।’
चंडीगढ़।
किसी को महसूस होने का तरीका इस शेयर के बाहर कहीं नहीं हो सकता और ये अंदाज है वसीम बरेलवी का। जिनकी प्रसिद्धि देश विदेश में किसी जान पहचान की मोहताज नहीं। बरेलवी कहते हैं कि हमारे देश की वर्षों पुरानी विचारधारा है। हमारे देश में सहनशीलता बहुत है। हमारी सभ्यता पांच हजार वर्ष पुरानी है। यही कारण है कि हिंदुस्तान के अंदर इतनी तहजीबें, इतनी भाषाएं, इतनी जातियां व इतनी क्षेत्रीयता एक साथ पनप रही है। किसी भी देश में ऐसा नहीं है। इस वजह से ही भारत विश्व गुरु बना और बना रहेगा।
उन्होंने कहा कि मोहब्बत व रचनात्मकता हमारी रग रग में है। यही कारण है कि हम लोग जज्बाती हैं। जज्बात जहां होते हैं वहां शायरी होती है। यही वजह है कि शायरी कभी खत्म नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि साहित्य अब चौथा स्तंभ है। जिसको ज्यादा से ज्यादा मजबूत किया जाना चाहिए। इसमें सभी का अहम योगदान होना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि समाज को शिक्षित करने के लिए अच्छे शिक्षण संस्थान आवश्यक हैं। हर जिले में पब्लिक स्कूलों की तर्ज पर एक-एक मॉडल शिक्षण संस्थान बनाए। बच्चे पब्लिक स्कूलों के बजाय इस स्कूल में आएं। समाज जब शिक्षित होगा, तभी उसका विकास होगा। वसीम बरेलवी ने कहा कि चंडीगढ़ लेक क्लब में जब उनका माइक बंद करवा दिया गया तो उसके बाद भी जो भीड़ उन्होंने देखी तो उनको ऐसा लगा कि वास्तव में यह शुभ संकेत है। लोग शायरी सुनना चाहते हैं, करीब आधा घंटा तक लोग खड़े होकर बिना माइक के शायरी सुनते रहे। उन्होंने कहा कि इससे ही लगा कि शायरी का भविष्य शानदार है। उन्होंने कहा कि वह कई बार आईआईटी में गए हैं, बेशक समाज में तेजी आ चुकी है, मशीनी युग हो चुका है पर इंसान का दिल मशीनी नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले जब मुशायरे होते थे तभी लोग सुनने आते थे। लेकिन अब यू ट्यूब और अन्य सोशल मीडिया के माध्यम से समाज ने मुशायरे को सुनना शुरू कर दिया है। अब इंटरनेशनल लेवल पर शायरी छा चुकी है। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे ऐसे युवा देखे हैं जिनके सामने आप एक मिसरा पढ़ें और दूसरा वह पूरा कर देते हैं। फिर वह पाश्चात्य सभ्यता पर आते हैं और कहते हैं कि संस्कारों को हमेशा बरकरार रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोगों को देखा है कि वह भीड़ के पास जाने की कोशिश करते हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, साहित्य से समझौता न करके खुद लोगों को अपने पास लेकर आना चाहिए। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि फिल्मों से मासूमियत खत्म हो चुकी है। पहले लोग एक ही फिल्म को कई बार देखते थे अब ऐसा नहीं रह गया है।
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