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होली करीब आते ही शुरू हुआ नगाड़ों की थाप पर चौपाइयों का दौर
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पलवल। वसंती पंचमी को होली का डांडा गढ़ने के साथ ही ब्रज क्षेत्र में होली की धमक दिखाई देने लगी है। ब्रज क्षेत्र के गांवों में अब नगाड़े की थाप पर चौपाइयों का दौर भी शुरू हो गया है। होली तक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें महिलाएं सिर पर गुड़ की भेली रखकर नृत्य करती हैं।
जिले के करीब 20 फीसदी गांवों में चौपाई पार्टियों ने ब्रज की प्राचीन होली की परंपरा को संजोये रखा है। वसंत पंचमी के बाद से ही जहां गांवों व अन्य मांगलिक कार्यक्रमों में चौपाई पार्टियों के लोकगीत सुनाई देने लगते हैं, वहीं होली से 15 दिन पहले से यह पार्टियां दूसरे मोहल्लों और गांवों में जाकर चौपाई प्रस्तुत करती हैं। इतना ही नहीं नगाड़ों की थाप पर चौपाइयों के साथ ही गांवों में रंग भी बरसने लगते हैं। वहीं सामाजिक कार्यक्रमों खासकर भागवत कथाओं व अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में भी लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर होली खेलना शुरू कर देते हैं। इन चौपाइयों के माध्यम से आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा मिलता है। चौपाई गायन के दौरान लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर स्वागत करते हैं। गायक एक तरफ खड़े होकर गाते हैं और दूसरी तरफ एक महिला सिर पर गुड़ की भेली रखकर लोकनृत्य करती है।
जिले की पार्टियों की विदेशों में भी है धमक
गांव बंचारी, मित्रोल, औरंगाबाद, मर्रोली, जोहरखेड़ा, नांगल जाट, सोतई, हरीपुरी आदि की चौपाई पार्टियां देश के साथ ही विदेशों में भी अपनी धमक रखती हैं। यहां की पार्टियों को विशेष तौर पर लोग अपने कार्यक्रमों में बुलाते हैं।
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श्रीविश्वकर्मा कौशल विवि में रखा गया है पाठ्यक्रम
ब्रज क्षेत्र के गांव बंचारी की नगाड़ा व चौपाई का पाठ्यक्रम श्रीविश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय में रखा गया है। अब छात्र चौपाई व नगाड़ा बजाने का कोर्स भी कर सकेंगे। विश्वविद्यालय द्वारा इसे कोर्स की श्रेणी में रखा गया है व जुलाई 2021 में शुरू होने वाले नए सत्र में इसे शुरू कर दिया जाएगा।
कवि रतन सिंह ने किया था जीवित
ब्रज क्षेत्र की इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखने में मित्रोल के जाने माने कवि शिरोमणि रतन सिंह आर्य का काफी योगदान रहा है। उन्होंने हिंदी, उर्दू, फारसी व ब्रज भाषा में हजारों कविताओं, गीतों, भजनों व चौपाइयों की रचना कर इस परंपरा को नया आयाम दिया। बताया जाता है कि चौपाई का अपना अलग ही रूप होता है। चौपाई का पहला गोहा, चौपाई व रसिया। चौपाई में कोई फूहड़ता या अश्लीलता नहीं होती, बल्कि सामाजिक बुराइयों पर कटाक्ष किए जाते हैं।
27-28 फरवरी को होगी बड़ी प्रतियोगिता
हर साल जहां ब्रज क्षेत्र में चौपाई प्रतियोगिता का आयोजन किसी न किसी सामाजिक संस्था द्वारा कराया जाता था, वहीं इस बार किसान मोर्चा द्वारा धरनास्थल पर 27-28 फरवरी को आयोजन किया जाएगा। इसमें जिले की ही नहीं बल्कि ब्रज क्षेत्र के अन्य गांवों से करीब 30 चौपाई पार्टियां हिस्सा लेंगी। यह एक बड़ा मुकाबला होगा।
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जिले के करीब 20 फीसदी गांवों में चौपाई पार्टियों ने ब्रज की प्राचीन होली की परंपरा को संजोये रखा है। वसंत पंचमी के बाद से ही जहां गांवों व अन्य मांगलिक कार्यक्रमों में चौपाई पार्टियों के लोकगीत सुनाई देने लगते हैं, वहीं होली से 15 दिन पहले से यह पार्टियां दूसरे मोहल्लों और गांवों में जाकर चौपाई प्रस्तुत करती हैं। इतना ही नहीं नगाड़ों की थाप पर चौपाइयों के साथ ही गांवों में रंग भी बरसने लगते हैं। वहीं सामाजिक कार्यक्रमों खासकर भागवत कथाओं व अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में भी लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर होली खेलना शुरू कर देते हैं। इन चौपाइयों के माध्यम से आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा मिलता है। चौपाई गायन के दौरान लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर स्वागत करते हैं। गायक एक तरफ खड़े होकर गाते हैं और दूसरी तरफ एक महिला सिर पर गुड़ की भेली रखकर लोकनृत्य करती है।
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जिले की पार्टियों की विदेशों में भी है धमक
गांव बंचारी, मित्रोल, औरंगाबाद, मर्रोली, जोहरखेड़ा, नांगल जाट, सोतई, हरीपुरी आदि की चौपाई पार्टियां देश के साथ ही विदेशों में भी अपनी धमक रखती हैं। यहां की पार्टियों को विशेष तौर पर लोग अपने कार्यक्रमों में बुलाते हैं।
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श्रीविश्वकर्मा कौशल विवि में रखा गया है पाठ्यक्रम
ब्रज क्षेत्र के गांव बंचारी की नगाड़ा व चौपाई का पाठ्यक्रम श्रीविश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय में रखा गया है। अब छात्र चौपाई व नगाड़ा बजाने का कोर्स भी कर सकेंगे। विश्वविद्यालय द्वारा इसे कोर्स की श्रेणी में रखा गया है व जुलाई 2021 में शुरू होने वाले नए सत्र में इसे शुरू कर दिया जाएगा।
कवि रतन सिंह ने किया था जीवित
ब्रज क्षेत्र की इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखने में मित्रोल के जाने माने कवि शिरोमणि रतन सिंह आर्य का काफी योगदान रहा है। उन्होंने हिंदी, उर्दू, फारसी व ब्रज भाषा में हजारों कविताओं, गीतों, भजनों व चौपाइयों की रचना कर इस परंपरा को नया आयाम दिया। बताया जाता है कि चौपाई का अपना अलग ही रूप होता है। चौपाई का पहला गोहा, चौपाई व रसिया। चौपाई में कोई फूहड़ता या अश्लीलता नहीं होती, बल्कि सामाजिक बुराइयों पर कटाक्ष किए जाते हैं।
27-28 फरवरी को होगी बड़ी प्रतियोगिता
हर साल जहां ब्रज क्षेत्र में चौपाई प्रतियोगिता का आयोजन किसी न किसी सामाजिक संस्था द्वारा कराया जाता था, वहीं इस बार किसान मोर्चा द्वारा धरनास्थल पर 27-28 फरवरी को आयोजन किया जाएगा। इसमें जिले की ही नहीं बल्कि ब्रज क्षेत्र के अन्य गांवों से करीब 30 चौपाई पार्टियां हिस्सा लेंगी। यह एक बड़ा मुकाबला होगा।