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वीरेंद्र आर्य ने किया वानप्रस्त आश्रम में प्रवेश
Updated Sat, 10 Nov 2018 10:48 PM IST
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वीरेंद्र आर्य ने किया वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश
-वर्णाश्रम व्यवस्था व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक उन्नति का मूलाधार: श्रद्धानंद
पलवल। आर्य समाज मितरोल-औरंगाबाद के पूर्व प्रधान वीरेंद्र सिंह आर्य ने शनिवार को वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश किया। वानप्रस्थ की दीक्षा आर्य जगत के तपोनिष्ठ संन्यासी स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती ने दी। उनका नाम वेदमुनी वानप्रस्थी रखा गया। इस अवसर पर उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आर्य सन्यासियों में गुरुकुल आंदोलन के पुरोधा स्वामी प्रणवानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती, स्वामी नित्यानंद सरस्वती मौजूद रहे। इस मौके पर स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती ने कहा कि विद्वान सब नहीं बन सकते लेकिन धर्मात्मा सब हो सकते हैं। वहीं स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने कहा कि वर्णाश्रम व्यवस्था व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक उन्नति का मूलाधार है। आश्रम व्यवस्था को अपनाने से व्यक्तिगत जीवन का विकास होता है और वर्ण व्यवस्था का पालन करने से सामाजिक उन्नति होती है। उन्होंने कहा कि वानप्रस्थ आश्रम तप और त्याग का आश्रम है। प्रत्येक मनुष्य को तीसरी अवस्था में वानप्रस्थ की दीक्षा अवश्य लेनी चाहिए। इस अवसर पर ओममुनि वानप्रस्थी, ज्ञानमुनी, दयालमुनी तुलाराम आर्य, नारायण सिंह आर्य, अशोक पाराशर, जयप्रकाश आर्य, डॉ. वृजेंद्र आर्य, राजपाल दहिया, श्याम सिंह वेदनिपुण, आचार्य बलवीर सिंह, भजनलाल आर्य, शिव सिंह आर्य, विशन सिंह, चंद्रलाल आर्य, देवी सिंह आर्य, ठाकुरलाल आर्य, बुधराम तेवतियासमेत अन्य मौजूद रहे।
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-वर्णाश्रम व्यवस्था व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक उन्नति का मूलाधार: श्रद्धानंद
पलवल। आर्य समाज मितरोल-औरंगाबाद के पूर्व प्रधान वीरेंद्र सिंह आर्य ने शनिवार को वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश किया। वानप्रस्थ की दीक्षा आर्य जगत के तपोनिष्ठ संन्यासी स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती ने दी। उनका नाम वेदमुनी वानप्रस्थी रखा गया। इस अवसर पर उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आर्य सन्यासियों में गुरुकुल आंदोलन के पुरोधा स्वामी प्रणवानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती, स्वामी नित्यानंद सरस्वती मौजूद रहे। इस मौके पर स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती ने कहा कि विद्वान सब नहीं बन सकते लेकिन धर्मात्मा सब हो सकते हैं। वहीं स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने कहा कि वर्णाश्रम व्यवस्था व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक उन्नति का मूलाधार है। आश्रम व्यवस्था को अपनाने से व्यक्तिगत जीवन का विकास होता है और वर्ण व्यवस्था का पालन करने से सामाजिक उन्नति होती है। उन्होंने कहा कि वानप्रस्थ आश्रम तप और त्याग का आश्रम है। प्रत्येक मनुष्य को तीसरी अवस्था में वानप्रस्थ की दीक्षा अवश्य लेनी चाहिए। इस अवसर पर ओममुनि वानप्रस्थी, ज्ञानमुनी, दयालमुनी तुलाराम आर्य, नारायण सिंह आर्य, अशोक पाराशर, जयप्रकाश आर्य, डॉ. वृजेंद्र आर्य, राजपाल दहिया, श्याम सिंह वेदनिपुण, आचार्य बलवीर सिंह, भजनलाल आर्य, शिव सिंह आर्य, विशन सिंह, चंद्रलाल आर्य, देवी सिंह आर्य, ठाकुरलाल आर्य, बुधराम तेवतियासमेत अन्य मौजूद रहे।