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तन को साधना और मन को बांधना ही तप है : मुनि विभोर
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नारनौल। शांतिनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में गुरु पूर्णिमा के महापर्व के अंतर्गत प्रतिदिन मुनि संघ के पावन सानिध्य में अभिषेक, शांतिधारा, प्रवचन एवं आचार्य छत्तीसी विधान का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। बुधवार प्रात 8 बजे मुनि महंत सागर महाराज, मुनि विभोर सागर महाराज, मुनि सानंद सागर महाराज के मंगल सानिध्य में मूलनायक भगवान की बेदी के समक्ष श्रीजी का अभिषेक एवं चमत्कारिक रिद्धि-सिद्धि, सुख-शांति प्रदाता शांतिधारा का पावन वाचन व प्रवचन संपन्न हुआ।
मुनि विभोर सागर ने कहा कि चातुर्मास का प्रत्येक दिन आत्मचिंतन, स्वाध्याय, व्रत, संयम और धर्माराधना के लिए अमूल्य अवसर होता है। उन्होंने कहा कि तन को साधना और मन को बांधना, ये असली तप है, दूध को न तपाने से दूध फट जाता है, उसी तरह जीवन में तप के न होने से चेतना-कर्म कलुषता बढ़ जाती है। जैसे सोने को तपाने से वो कुंदन बन जाता है, उसी आत्मा को तपाने से हमारा जीवन निखर जाता है।
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मुनि विभोर सागर ने कहा कि चातुर्मास का प्रत्येक दिन आत्मचिंतन, स्वाध्याय, व्रत, संयम और धर्माराधना के लिए अमूल्य अवसर होता है। उन्होंने कहा कि तन को साधना और मन को बांधना, ये असली तप है, दूध को न तपाने से दूध फट जाता है, उसी तरह जीवन में तप के न होने से चेतना-कर्म कलुषता बढ़ जाती है। जैसे सोने को तपाने से वो कुंदन बन जाता है, उसी आत्मा को तपाने से हमारा जीवन निखर जाता है।
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