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Mahendragarh-Narnaul News: पोथियों में सांस ले रहा छिलरो का इतिहास, जागा-भाट ने खोले पुरखों के पन्ने
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फोटो नंबर- 03गांव छिलरो में दस्तावेजों के साथ राजेंद्र जागा व सूरज जागा। ग्रामीण
निजामपुर। कहते हैं कि हर गांव की अपनी एक कहानी होती है लेकिन कुछ कहानियां किताबों में नहीं, पोथियों में बसती हैं। छिलरो गांव का इतिहास भी ऐसी ही पोथियों में दर्ज है जिन्हें जागा-भाट समुदाय पीढ़ियों से संभालता आ रहा है।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सूरज जागा और राजेंद्र जागा हाल ही में छिलरो गांव पहुंचे। ग्रामीणों ने उनका स्वागत किया और पोथियों में दर्ज गांव के इतिहास के बारे में जानकारी ली।
सूरज जागा ने बताया कि छिलरो गांव को करीब 500 साल पहले विक्रम संवत 1543 में रूप सिंह राड़ ने बसाया था। उनके पास संरक्षित दस्तावेजों में सिर्फ नाम ही नहीं, बल्कि 1100 वर्ष पुराना वंश-वृक्ष भी दर्ज है। किस परिवार का गोत्र क्या है, वह कहां से आया और कितनी पीढ़ियां बीत गईं, यह सब कुछ इन पोथियों में सहेजा गया है।
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गांव के सरपंच विक्रम और ग्रामीणों ने बताया कि इन पोथियों से उन्हें अपने पूर्वजों और वर्षों पहले की घटनाओं की जानकारी मिलती है। हालांकि हाथ से लिखे ये दस्तावेज बहुत पुराने हैं और नष्ट भी हो सकते हैं। इसलिए ग्रामीणों ने दोनों जागा बंधुओं को इनका डिजिटलीकरण कराने की सलाह दी।
आय घटी, युवा चुन रहे दूसरे रास्ते
राजेंद्र जागा और सूरज जागा किशनगढ़-मकराना क्षेत्र के रहने वाले हैं। वे प्राचीन समय से चली आ रही इतिहास सहेजने की परंपरा निभा रहे हैं। नियमित अंतराल पर वे अलग-अलग गांवों में जाते हैं। ग्रामीण जब वंशावली पूछते हैं तो जो रुपये देते हैं, वही उनकी आय का जरिया है। उन्होंने बताया कि आज के समय में लोग ऐसी जानकारियों से दूर होते जा रहे हैं जिसका असर उनकी कमाई पर पड़ा है।
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इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सूरज जागा और राजेंद्र जागा हाल ही में छिलरो गांव पहुंचे। ग्रामीणों ने उनका स्वागत किया और पोथियों में दर्ज गांव के इतिहास के बारे में जानकारी ली।
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सूरज जागा ने बताया कि छिलरो गांव को करीब 500 साल पहले विक्रम संवत 1543 में रूप सिंह राड़ ने बसाया था। उनके पास संरक्षित दस्तावेजों में सिर्फ नाम ही नहीं, बल्कि 1100 वर्ष पुराना वंश-वृक्ष भी दर्ज है। किस परिवार का गोत्र क्या है, वह कहां से आया और कितनी पीढ़ियां बीत गईं, यह सब कुछ इन पोथियों में सहेजा गया है।
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गांव के सरपंच विक्रम और ग्रामीणों ने बताया कि इन पोथियों से उन्हें अपने पूर्वजों और वर्षों पहले की घटनाओं की जानकारी मिलती है। हालांकि हाथ से लिखे ये दस्तावेज बहुत पुराने हैं और नष्ट भी हो सकते हैं। इसलिए ग्रामीणों ने दोनों जागा बंधुओं को इनका डिजिटलीकरण कराने की सलाह दी।
आय घटी, युवा चुन रहे दूसरे रास्ते
राजेंद्र जागा और सूरज जागा किशनगढ़-मकराना क्षेत्र के रहने वाले हैं। वे प्राचीन समय से चली आ रही इतिहास सहेजने की परंपरा निभा रहे हैं। नियमित अंतराल पर वे अलग-अलग गांवों में जाते हैं। ग्रामीण जब वंशावली पूछते हैं तो जो रुपये देते हैं, वही उनकी आय का जरिया है। उन्होंने बताया कि आज के समय में लोग ऐसी जानकारियों से दूर होते जा रहे हैं जिसका असर उनकी कमाई पर पड़ा है।