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धक्के खाने को मजबूर हजारों मजदूर
ब्यूरो/अमर उजाला
Updated Sat, 30 Apr 2016 11:52 PM IST
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मजदूरों की परेशानी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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मजदूर सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करता है। सर्दी हो या गर्मी या फिर बरसात, हर मौसम में मजदूर को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। वहीं उनकी मजदूरी का कई बार उनको पूरा मेहनताना भी नहीं मिल पाता। कई बार ठेकेदार तो कई बार भवन मालिक मजदूरों की मजदूरी मार जाता है। ऐसे में मजदूर अपनी मेहनत मजदूरी से की गई कमाई पाने के लिए यहां-वहां भटकता है। फिर भी उसे कई दिनों तक या कई बार तो कभी भी उसकी मजदूरी नहीं मिल पाती। ऐसी छोटी-मोटी समस्याओं के निदान के लिए सरकार ने प्रत्येक जिले में श्रम एवं समझौता विभाग के कार्यालय खोले हैं, मगर जिला महेंद्रगढ़ में कार्यालय न होने के कारण हजारों मजदूरों को अपना छोटा-मोटा काम करवाने के लिए रेवाड़ी के चक्कर काटने पड़ते हैं। जिससे जिला के हजारों पंजीकृत व अपंजीकृत मजदूरों को काफी परेशानी हो रही है। महेंद्रगढ़ में करीब 20 हजार पंजीकृत मजदूर हैं। वहीं हजारों की संख्या में ही अपंजीकृत मजदूर हैं। सरकार की ओर से पंजीकृत मजदूरों को अनेक सुविधाएं मिलती हैं, मगर जिला के पंजीकृत मजदूरों को कोई खास सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, क्योंकि जिला में श्रम आयुक्त का कार्यालय नहीं है।
श्रमिक संगठन कई बार उठा चुके मांग
जिला के विभिन्न मजदूर संगठन समय-समय पर जिला में ही श्रम आयुक्त या श्रम एवं समझौता विभाग का कार्यालय खोलने की आवाज उठा चुके हैं। इसके लिए वे अनेक बार धरना प्रदर्शन भी कर चुके हैं, मगर श्रमिकों की इस समस्या का समाधान नहीं हुआ है।
मजदूरों की समस्याओं का समाधान करने के लिए करीब पांच साल पूर्व नारनौल में निजामपुर रोड पर श्रम विभाग का कार्यालय स्थापित थचा, मगर उस कार्यालय में भी अधिकारियों व कर्मचारियों का टोटा था। जिसके कारण इसको बाद में रेवाड़ी शिफ्ट कर दिया गया। जिसके बाद से मजदूरों को ज्यादा परेशानी होती है।
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उद्योग नहीं, खनन क्षेत्र में हैं हजारों मजदूर
जिले में बेशक उद्योग धंधे नहीं हैं, मगर ईंट भट्ठों की भरमार है। यहां करीब 125 ईंट भट्ठे हैं। ऐसे में एक भट्ठे पर करीब 100 मजदूर काम करते हैं। ऐसे में दस हजार के करीब यहां के ईंट भट्ठों पर मजदूर कार्य करते हैं। भट्ठों के अलावा यहां पर क्रेशर और खनन जोन भी हैं। जिले में पांच खनन की माइन्स हैं। करीब 500 से अधिक मजदूर यहां काम करते हैं। अकेले धौलेड़ा क्रेशर जोन में करीब 500 मजदूर मजदूरी करते हैं। इन मजदूरों में अधिकांश मजदूर पंजीकृत हैं। आल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन के जिला सचिव कामरेड सुभाष चंद एडवोकेट ने बताया कि यदि कोई मजदूर अपनी मजदूरी के लिए कोर्ट में याचिका दायर करता है तो उसको कागजों, वकील व टाइप आदि के ही हजारों रुपये देने पड़ जाएंगे, वहीं बार-बार उसको कोर्ट के चक्कर काटने पड़ेंगे। जिसके बाद ही उसकी समस्या का समाधान हो पाएगा।
400 रुपये मजदूरी के लिए खर्च कर देते हैं 50 रुपये से अधिक किराया
नारनौल में जिले के दूर दराज के गांवों के अलावा राजस्थान के आसपास के सैकड़ों मजदूर रोजाना मजदूरी की तलाश में सुबह-सुबह यहां के लेबर चौक, नजदीक गर्ल आईटीआई के पास एकत्र होते हैं। यहां काम करने वाले मजदूरों ने बताया कि वे दूर दराज से आते हैं 50 से 100 रुपये तक दिनभर की मजदूरी के लिए किराये पर खर्च कर देते हैं। वहीं दिन का भोजन अलग होता है, फिर भी उनको कई बार मजदूरी नहीं मिल पाती। ऐसे में उनके द्वारा किराये पर खर्च किए गए पैसे बेकार ही जाते हैं। यहां पर अनेक मजदूर 25 से 50 किलोमीटर दूर तक के आते हैं। कई बार इनको सुबह से शाम तक कोई काम नहीं मिलता। जिसके कारण ये बिना काम किए ही अपने घर लौट जाते हैं।
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श्रमिक संगठन कई बार उठा चुके मांग
जिला के विभिन्न मजदूर संगठन समय-समय पर जिला में ही श्रम आयुक्त या श्रम एवं समझौता विभाग का कार्यालय खोलने की आवाज उठा चुके हैं। इसके लिए वे अनेक बार धरना प्रदर्शन भी कर चुके हैं, मगर श्रमिकों की इस समस्या का समाधान नहीं हुआ है।
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मजदूरों की समस्याओं का समाधान करने के लिए करीब पांच साल पूर्व नारनौल में निजामपुर रोड पर श्रम विभाग का कार्यालय स्थापित थचा, मगर उस कार्यालय में भी अधिकारियों व कर्मचारियों का टोटा था। जिसके कारण इसको बाद में रेवाड़ी शिफ्ट कर दिया गया। जिसके बाद से मजदूरों को ज्यादा परेशानी होती है।
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उद्योग नहीं, खनन क्षेत्र में हैं हजारों मजदूर
जिले में बेशक उद्योग धंधे नहीं हैं, मगर ईंट भट्ठों की भरमार है। यहां करीब 125 ईंट भट्ठे हैं। ऐसे में एक भट्ठे पर करीब 100 मजदूर काम करते हैं। ऐसे में दस हजार के करीब यहां के ईंट भट्ठों पर मजदूर कार्य करते हैं। भट्ठों के अलावा यहां पर क्रेशर और खनन जोन भी हैं। जिले में पांच खनन की माइन्स हैं। करीब 500 से अधिक मजदूर यहां काम करते हैं। अकेले धौलेड़ा क्रेशर जोन में करीब 500 मजदूर मजदूरी करते हैं। इन मजदूरों में अधिकांश मजदूर पंजीकृत हैं। आल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन के जिला सचिव कामरेड सुभाष चंद एडवोकेट ने बताया कि यदि कोई मजदूर अपनी मजदूरी के लिए कोर्ट में याचिका दायर करता है तो उसको कागजों, वकील व टाइप आदि के ही हजारों रुपये देने पड़ जाएंगे, वहीं बार-बार उसको कोर्ट के चक्कर काटने पड़ेंगे। जिसके बाद ही उसकी समस्या का समाधान हो पाएगा।
400 रुपये मजदूरी के लिए खर्च कर देते हैं 50 रुपये से अधिक किराया
नारनौल में जिले के दूर दराज के गांवों के अलावा राजस्थान के आसपास के सैकड़ों मजदूर रोजाना मजदूरी की तलाश में सुबह-सुबह यहां के लेबर चौक, नजदीक गर्ल आईटीआई के पास एकत्र होते हैं। यहां काम करने वाले मजदूरों ने बताया कि वे दूर दराज से आते हैं 50 से 100 रुपये तक दिनभर की मजदूरी के लिए किराये पर खर्च कर देते हैं। वहीं दिन का भोजन अलग होता है, फिर भी उनको कई बार मजदूरी नहीं मिल पाती। ऐसे में उनके द्वारा किराये पर खर्च किए गए पैसे बेकार ही जाते हैं। यहां पर अनेक मजदूर 25 से 50 किलोमीटर दूर तक के आते हैं। कई बार इनको सुबह से शाम तक कोई काम नहीं मिलता। जिसके कारण ये बिना काम किए ही अपने घर लौट जाते हैं।