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Mahendragarh-Narnaul News: जिम्मेदारियों के बीच योग से रचा इतिहास, मां का अधूरा सपना बेटियों कर रही पूरा
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30...योग करती डोभ निवासी सतवंती। स्रोत : परिजन
करिश्मा रंगा
रोहतक। जिम्मेदारियों की जंजीरें जब सपनों को जकड़ लेती हैं तब भी अगर हौसला मजबूत हो तो नई राह निकल ही आती है। डोभ गांव की गृहिणी सतवंती की कहानी कुछ ऐसी ही है जिन्होंने खेत, घर और बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच योग को अपना सहारा बनाए रखा और आज उसी संघर्ष का फल उनकी बेटियां हासिल कर रही हैं।
सतवंती के पति स्कूल बस चालक हैं। सीमित संसाधनों और ग्रामीण परिवेश में रहते हुए भी उन्होंने योग को कभी खुद से अलग नहीं किया। कोरोना काल में जब स्कूल बंद हुए और गतिविधियां थम गई, तब सतवंती ने रात के समय अपनी बेटियों को योग की ट्रेनिंग देना शुरू किया।
गांव में जहां घरेलू कामों को ही प्राथमिकता दी जाती है, वहां योग का रास्ता आसान नहीं था, लेकिन सतवंती ने हार नहीं मानी। सतवंती ने योग की सीख अपने पिता से ली थी जो पहलवान थे। शादी से पहले उन्होंने खेलों में ब्लॉक स्तर पर गोल्ड, जिला और राज्य स्तर पर ब्रॉन्ज व ओपन नेशनल में भी ब्रॉन्ज पदक जीते।
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पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते नेशनल स्तर पर खेलने का सपना अधूरा रह गया। सतवंती बताती हैं कि आगे बढ़ने की चाह थी लेकिन घर-परिवार की जिम्मेदारियों ने कदम रोक दिए।
अब वही अधूरा सपना उनकी बेटियां पूरा कर रही हैं। रात-रात भर जागकर दी गई ट्रेनिंग का असर आज नजर आ रहा है। बेटी ऋषिका के पास 20 से अधिक पदक हैं जिनमें नेशनल स्तर पर जीते गए 10 गोल्ड पदक शामिल हैं। हाल ही में परिवार में बेटे का जन्म हुआ है। इसके बावजूद योग की साधना नहीं रुकी।
एक ही मैट : दो पीढियां
जून 2025 में मां-बेटी ने 28 से 35 आयु वर्ग के ब्लॉक स्तर पर गोल्ड पदक जीता। ऋषिका ने अंडर-13 वर्ग में ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर गोल्ड पदक हासिल कर गांव और जिले का नाम रोशन किया। सतवंती की यह यात्रा साबित करती है कि अगर हौसला हो, तो जिम्मेदारियां भी सपनों के रास्ते की रुकावट नहीं बनती।
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रोहतक। जिम्मेदारियों की जंजीरें जब सपनों को जकड़ लेती हैं तब भी अगर हौसला मजबूत हो तो नई राह निकल ही आती है। डोभ गांव की गृहिणी सतवंती की कहानी कुछ ऐसी ही है जिन्होंने खेत, घर और बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच योग को अपना सहारा बनाए रखा और आज उसी संघर्ष का फल उनकी बेटियां हासिल कर रही हैं।
सतवंती के पति स्कूल बस चालक हैं। सीमित संसाधनों और ग्रामीण परिवेश में रहते हुए भी उन्होंने योग को कभी खुद से अलग नहीं किया। कोरोना काल में जब स्कूल बंद हुए और गतिविधियां थम गई, तब सतवंती ने रात के समय अपनी बेटियों को योग की ट्रेनिंग देना शुरू किया।
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गांव में जहां घरेलू कामों को ही प्राथमिकता दी जाती है, वहां योग का रास्ता आसान नहीं था, लेकिन सतवंती ने हार नहीं मानी। सतवंती ने योग की सीख अपने पिता से ली थी जो पहलवान थे। शादी से पहले उन्होंने खेलों में ब्लॉक स्तर पर गोल्ड, जिला और राज्य स्तर पर ब्रॉन्ज व ओपन नेशनल में भी ब्रॉन्ज पदक जीते।
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पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते नेशनल स्तर पर खेलने का सपना अधूरा रह गया। सतवंती बताती हैं कि आगे बढ़ने की चाह थी लेकिन घर-परिवार की जिम्मेदारियों ने कदम रोक दिए।
अब वही अधूरा सपना उनकी बेटियां पूरा कर रही हैं। रात-रात भर जागकर दी गई ट्रेनिंग का असर आज नजर आ रहा है। बेटी ऋषिका के पास 20 से अधिक पदक हैं जिनमें नेशनल स्तर पर जीते गए 10 गोल्ड पदक शामिल हैं। हाल ही में परिवार में बेटे का जन्म हुआ है। इसके बावजूद योग की साधना नहीं रुकी।
एक ही मैट : दो पीढियां
जून 2025 में मां-बेटी ने 28 से 35 आयु वर्ग के ब्लॉक स्तर पर गोल्ड पदक जीता। ऋषिका ने अंडर-13 वर्ग में ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर गोल्ड पदक हासिल कर गांव और जिले का नाम रोशन किया। सतवंती की यह यात्रा साबित करती है कि अगर हौसला हो, तो जिम्मेदारियां भी सपनों के रास्ते की रुकावट नहीं बनती।