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आस्था राव ने परिवार पर लगे कलंक को धोने के लिए खाई थी कसम
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प्रेसवार्ता को संबोधित करती आस्था की बड़ी भाभी। संवाद
- फोटो : Narnol
आज भी कई लोग बेटे-बेटियों में भेदभाव करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि लड़कियां भी लड़कों से किसी क्षेत्र में कम नहीं हैं। ऐसा ही उदाहरण गांव जैतपुर निवासी आस्था राव ने प्रस्तुत किया है। आस्था अपने परिवार पर लगे दहेज हत्या का कलंक धोने के लिए दिन-रात मेहनत की और उनको न्याय दिलाया।
आस्था के माता-पिता नारनौल में ऑफिसर्स कॉलोनी में रहते थे। जबकि उसका भाई भाभी जयपुर में रहता था। उसकी भाभी ने 16 जून 1999 को आत्महत्या कर ली थी। भाभी के परिजनों ने मां विजय यादव, पिता जोगिंद्र सिंह तथा भाई योगेश पर दहेज हत्या का मामला दर्ज करवा दिया था।
आस्था ने बताया कि जब यह घटना हुई तो उस समय वह 15 वर्ष की थी। उस समय वह दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। सबूतों के अभाव में लोवर कोर्ट ने पिता को दस वर्ष की सजा सुना दी। चार वर्ष जेल काटने के बाद पिता जमानत पर आए तो 2008 में उनकी मौत हो गई। इस झूठे केस के कारण घर की परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न और कठिन हो चुकी थीं।
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पिता की मौत के बाद उसने परिवार को न्याय दिलाने की ठान ली थी। परिवार में बाकी सब जेल में थे। इस दौरान उसने गवाहों और भाभी के मायके वालों का स्टिंग ऑपरेशन कर झूठ का पर्दाफाश किया और सारे सबूत कोर्ट में पेश किए। उन सबूतों के आधार पर परिवार को न्याय मिला है।
पिता की चिट्ठियों से की पढ़ाई
आस्था राव ने बताया कि वह अपने पिता की जेल से भेजी गई चिट्ठियों के सहारे अपनी पढ़ाई को पूरा कर रही थी। उसने बताया कि हॉस्टल में उन चिट्ठियों को किताबों में छुपाकर रखती थी, क्योंकि उन पर जेल की मुहर लगी होती थी। उसे डर रहता था कि कहीं उनकी चिट्ठियों को रूम मेट न देख ले। इस घटना के बाद से उसके घर कभी दिवाली नहीं मनाई गई। हर दिवाली पर वह उन चिट्ठियों की पूजा करती है। जेहन में छिपी ये चिट्ठियां उसकी ताकत भी बन चुकी थीं। इस दौरान उसने परिवार के लिए न्याय की लड़ाई भी लड़ी और अपना करिअर भी बनाया। उसने एमबीए तक पढ़ाई पूरी की तथा अपना घर भी बसा लिया। इस समय वह यूएसए में एक बड़ी कंपनी में बतौर प्रवक्ता काम कर रही है। नौकरी करते-करते भी वह इस केस के बारे में अधिवक्ता एवं परिजनों से बातचीत करती रहती थी।
अफसोस : झूठा कलंक माथे पर लिए पिता दुनिया छोड़ गए
आस्था राव को बहुत अफसोस है कि उसके पिता झूठा कलंक माथे पर लेकर दुनिया छोड़कर कर चले गए। उसने कहा कि काश! उसके पिता जिंदा होते तो वह उनके बगल में बैठकर इस फैसले को पढ़कर सुनाती और उसके लिए यह क्षण सर्वोत्तम खुशी का होता।
दहेज कानूनों में बदलाव की है जरूरत
दहेज हत्या कानून में सात साल के भीतर अप्राकृतिक मृत्यु होने पर ससुराल पक्ष को जमानत मिलती है। ससुराल पक्ष पर ही अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का भार होता है। यदि पीहर पक्ष झूठे आरोप और गवाह पेश कर दें तब जेल में रहते हुए कोई निर्दोष अपने पक्ष में सबूत कैसे जुटाएगा। इसलिए दहेज संबंधी कानूनों को संतुलित बनाना चाहिए।
22 वर्षों में परिवार ने बहुत कुछ खोया
आस्था राव ने बताया कि 22 वर्षों में उसके परिजनों ने बहुत कुछ खोया है। इससे पहले उनका परिवार एक हंसता खेलता परिवार था। सभी लोग मिलजुल कर रहते थे। पिता समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष थे। मां विजय यादव राजकीय पीजी कॉलेज में अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं। भाई योगेश एमबीए कर जयपुर में सरकारी नौकरी कर रहा था। वह स्वयं पढ़ाई कर रही थी। अचानक एक ऐसा तूफान आया कि जिसने सबकुछ तबाह कर दिया। उसकी भाभी रेणुका ने आत्महत्या कर लिया। मां, पिता और भाई को दस वर्ष की सजा सुना दी गई। बाद में पिता की बीमारी से मौत हो गई। भाई मानसिक रोग से ग्रस्त हो गया, घर से निकल गया। मां कैंसर पीड़ित हो गई। घर में आर्थिक तंगी आ गई। इस दौरान अपने पराये की पहचान भी हुई। सेवानिवृत्त प्राचार्य लाल सिंह यादव, अधिवक्ता चंदूलाल यादव, निशांत, संजय, अशोक यादव, ऋषभ तथा बड़ी भाभी ने उनका बहुत साथ दिया।
प्रतिशोध के रूप में नहीं करेंगे कार्रवाई
आस्था ने कहा कि उनके परिवार को न्याय मिल गया है। वह शिकायतकर्ताओं एवं गवाहों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहती। हम उनको माफ करते हैं। वह रेणुका भाभी को बहुत प्यार करती थी। आज भी उनके घर में उसकी भाभी की फोटो लगी है।
22 वर्ष के काले अध्याय का हुआ अंत
16 नवंबर 2021 को 22 वर्ष से उनके परिवार के जीवन में चल रहा काले अध्याय का अंत हो गया है। कोर्ट के आदेश सुनने के बाद मैं बहुत भावविभोर हो गई। 22 वर्षों बाद मेरा दोबारा जन्म हुआ है। डेढ़ वर्ष में जेल में रही वहां भी मुझे दवाइयां तथा लीगल ज्ञान मिला। मेेरा सपना था कि रिटायर होने के बाद समाजसेवा करूंगी, लेकिन किस्मत ने मुझे ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया कि कुछ नहीं कर पाई। लेकिन अब वह अपनी बाकी बची जिंदगी को समाज सेवा में लगाएंगी और लोगों को दहेज प्रथा के बारे में जागरूक करेंगी।
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आस्था के माता-पिता नारनौल में ऑफिसर्स कॉलोनी में रहते थे। जबकि उसका भाई भाभी जयपुर में रहता था। उसकी भाभी ने 16 जून 1999 को आत्महत्या कर ली थी। भाभी के परिजनों ने मां विजय यादव, पिता जोगिंद्र सिंह तथा भाई योगेश पर दहेज हत्या का मामला दर्ज करवा दिया था।
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आस्था ने बताया कि जब यह घटना हुई तो उस समय वह 15 वर्ष की थी। उस समय वह दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। सबूतों के अभाव में लोवर कोर्ट ने पिता को दस वर्ष की सजा सुना दी। चार वर्ष जेल काटने के बाद पिता जमानत पर आए तो 2008 में उनकी मौत हो गई। इस झूठे केस के कारण घर की परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न और कठिन हो चुकी थीं।
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पिता की मौत के बाद उसने परिवार को न्याय दिलाने की ठान ली थी। परिवार में बाकी सब जेल में थे। इस दौरान उसने गवाहों और भाभी के मायके वालों का स्टिंग ऑपरेशन कर झूठ का पर्दाफाश किया और सारे सबूत कोर्ट में पेश किए। उन सबूतों के आधार पर परिवार को न्याय मिला है।
पिता की चिट्ठियों से की पढ़ाई
आस्था राव ने बताया कि वह अपने पिता की जेल से भेजी गई चिट्ठियों के सहारे अपनी पढ़ाई को पूरा कर रही थी। उसने बताया कि हॉस्टल में उन चिट्ठियों को किताबों में छुपाकर रखती थी, क्योंकि उन पर जेल की मुहर लगी होती थी। उसे डर रहता था कि कहीं उनकी चिट्ठियों को रूम मेट न देख ले। इस घटना के बाद से उसके घर कभी दिवाली नहीं मनाई गई। हर दिवाली पर वह उन चिट्ठियों की पूजा करती है। जेहन में छिपी ये चिट्ठियां उसकी ताकत भी बन चुकी थीं। इस दौरान उसने परिवार के लिए न्याय की लड़ाई भी लड़ी और अपना करिअर भी बनाया। उसने एमबीए तक पढ़ाई पूरी की तथा अपना घर भी बसा लिया। इस समय वह यूएसए में एक बड़ी कंपनी में बतौर प्रवक्ता काम कर रही है। नौकरी करते-करते भी वह इस केस के बारे में अधिवक्ता एवं परिजनों से बातचीत करती रहती थी।
अफसोस : झूठा कलंक माथे पर लिए पिता दुनिया छोड़ गए
आस्था राव को बहुत अफसोस है कि उसके पिता झूठा कलंक माथे पर लेकर दुनिया छोड़कर कर चले गए। उसने कहा कि काश! उसके पिता जिंदा होते तो वह उनके बगल में बैठकर इस फैसले को पढ़कर सुनाती और उसके लिए यह क्षण सर्वोत्तम खुशी का होता।
दहेज कानूनों में बदलाव की है जरूरत
दहेज हत्या कानून में सात साल के भीतर अप्राकृतिक मृत्यु होने पर ससुराल पक्ष को जमानत मिलती है। ससुराल पक्ष पर ही अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का भार होता है। यदि पीहर पक्ष झूठे आरोप और गवाह पेश कर दें तब जेल में रहते हुए कोई निर्दोष अपने पक्ष में सबूत कैसे जुटाएगा। इसलिए दहेज संबंधी कानूनों को संतुलित बनाना चाहिए।
22 वर्षों में परिवार ने बहुत कुछ खोया
आस्था राव ने बताया कि 22 वर्षों में उसके परिजनों ने बहुत कुछ खोया है। इससे पहले उनका परिवार एक हंसता खेलता परिवार था। सभी लोग मिलजुल कर रहते थे। पिता समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष थे। मां विजय यादव राजकीय पीजी कॉलेज में अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं। भाई योगेश एमबीए कर जयपुर में सरकारी नौकरी कर रहा था। वह स्वयं पढ़ाई कर रही थी। अचानक एक ऐसा तूफान आया कि जिसने सबकुछ तबाह कर दिया। उसकी भाभी रेणुका ने आत्महत्या कर लिया। मां, पिता और भाई को दस वर्ष की सजा सुना दी गई। बाद में पिता की बीमारी से मौत हो गई। भाई मानसिक रोग से ग्रस्त हो गया, घर से निकल गया। मां कैंसर पीड़ित हो गई। घर में आर्थिक तंगी आ गई। इस दौरान अपने पराये की पहचान भी हुई। सेवानिवृत्त प्राचार्य लाल सिंह यादव, अधिवक्ता चंदूलाल यादव, निशांत, संजय, अशोक यादव, ऋषभ तथा बड़ी भाभी ने उनका बहुत साथ दिया।
प्रतिशोध के रूप में नहीं करेंगे कार्रवाई
आस्था ने कहा कि उनके परिवार को न्याय मिल गया है। वह शिकायतकर्ताओं एवं गवाहों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहती। हम उनको माफ करते हैं। वह रेणुका भाभी को बहुत प्यार करती थी। आज भी उनके घर में उसकी भाभी की फोटो लगी है।
22 वर्ष के काले अध्याय का हुआ अंत
16 नवंबर 2021 को 22 वर्ष से उनके परिवार के जीवन में चल रहा काले अध्याय का अंत हो गया है। कोर्ट के आदेश सुनने के बाद मैं बहुत भावविभोर हो गई। 22 वर्षों बाद मेरा दोबारा जन्म हुआ है। डेढ़ वर्ष में जेल में रही वहां भी मुझे दवाइयां तथा लीगल ज्ञान मिला। मेेरा सपना था कि रिटायर होने के बाद समाजसेवा करूंगी, लेकिन किस्मत ने मुझे ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया कि कुछ नहीं कर पाई। लेकिन अब वह अपनी बाकी बची जिंदगी को समाज सेवा में लगाएंगी और लोगों को दहेज प्रथा के बारे में जागरूक करेंगी।

स्टिंग ऑपरेशन में इस्तेमाल किए गए उपकरण। संवाद- फोटो : Narnol