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विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर बुजुर्ग बोले: उम्र की शाम में उदासी नहीं उमंग होनी चाहिए
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उम्र की शाम में उदासी नहीं उमंग होनी चाहिए, यह उमंग ही है जो ढलती उम्र में जीने का जोश बढ़ाती है। आज विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस है यानि बुजुर्गों को सम्मान देने का दिन। नई पीढ़ी को यह बताने का दिन कि ये बोझ नहीं, बल्कि जिस सुंदर-सी बगिया में आप खिलखिला रहे हो, उसको इसी बागबान ने सींचकर इतना मनोरम बनाया है। बच्चों को अपने पैर पर खड़ा करने के लिए उन्होंने जो भी जतन किए, उस उधार को सम्मान के साथ चुकाना है, ताकि आपके बाद की पीढ़ी भी आपके साथ बेहतर बर्ताव करे। विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर अमर उजाला अपने पाठकों को आज ऐसे वरिष्ठ नागरिकों तक लेकर जाएगा, जिन्होंने अपने परिवार रूपी पौधों को मेहनत रूपी जल देकर एक फलदार वृक्ष बनाया है और आज इसी फलदार वृक्ष की छांव में वह सुखमयी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कुछ वरिष्ठ नागरिक तो आज भी परिवार के साथ-साथ समाजसेवा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। बात की जाए कोरोना महामारी की तो जहां पहले संपूर्ण लॉकडाउन में कई लोगों का जीवन पूरी तरह से बदल गया। बच्चे घरों में रहकर ही ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं तो कई वर्किंग प्रोफेशनल घरों से काम करने में मशरूफ थे। लेकिन वरिष्ठ नागरिक ऐसा वर्ग था, जो न तो ऑनलाइन पढ़ाई में व्यस्त हैं और न ही घर से ऑफिस का काम करने की आपाधापी में मशरूफ। सुबह उठते ही तैयार होकर ये वर्ग पार्क में ताजी हवा का आनंद लेने घर से निकल जाता था। पार्क में अपने दोस्तों के साथ सैर, लाफ्टर क्लब, धार्मिक किताबों का सामूहिक पाठ, योगा क्लब, बैडमिंटन ग्रुप और न जाने किन-किन सामूहिक अच्छे कामों में अपना समय व्यतीत करने वाला ये वर्ग कोरोना वायरस महामारी की वजह से घर पर रहने को मजबूर हैं, लेकिन इनके हौसले आज भी बुलंद है।
27 साल से कर रहे लंगर सेवा, 68 साल की उम्र में भी नहीं रुके कदम
68 वर्षिय अधिवक्ता शिव राम के कदम समाजसेवा के लिए आज भी नहीं रुके हैं। समाजसेवा के लिए उनका जज्बा युवाओं के जोश को भी पीछे छोड़ जाता है। शिव राम का मानना है कि उनकी सकारात्मक सोच के कारण ही वह आज भी बढ़ती उम्र से हार नहीं मानते। शिव राम ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1992 में लंगर लगाकर भूखों का पेट भरने का कार्य शुरू किया था। उन्होंने उस दौरान रेडक्रॉस के साथ मिलकर बहुत से दिव्यांगों को आर्टिफिशल अंग भी लगवाए। समाजसेवा के इस सफर में बहुत से लोग उनके साथ भी जुडे़। वह जरूरतमंद परिवारों को एक साल का राशन उपलब्ध कराते हैं। इसके साथ ही जरूरतमंद बच्चों को पुस्तकें उपलब्ध कराने का कार्य भी वह करते हैं। वह हर चौदस को गुरु रविवाद मंदिर में लंगर भी लगवाते हैं। उन्होंने कोरोना काल में भी बहुत से जरूरतमंद परिवारों को राशन उपलब्ध कराया। उन्होंने समाजसेवा के साथ-साथ परिवार का भी बहुत अच्छे से पालन पोषण किया। जिसकी बदौलत आज उनका एक बेटा व बहु लंदन में एडवोकेट हैं। वहीं दूसरा बेटा फरीदाबाद में नौकरी करता है। शिव राम ने बताया कि वह 1983 से दिपावली अस्पताल में मरीजों के बीच मनाते आ रहे हैं। पोता-पोती के जन्मदिन पर वह अस्पताल में बच्चों को कपड़े वितरित करते हैं। शिव राम ने माता मनसा देवी भंडारा कमेटी की वरिष्ठ उपप्रधान भी हैं। 27 साल सेेवा करने के बाद भी उनका मानना वह इस काम में लेट हो गए।
चार साल की उम्र में परिवार संग आए थे भारत
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव के पद से रिटायर्ड 78 वर्षीय सरदार निर्मल सिंह 1947 में बंटवारे के दौरान पाकिस्तान छोड़ अपने परिवार के साथ भारत आए थे। उन्होंने अंबाला में रहकर अपनी पढ़ाई की। 1963 में उन्होंने पीयू चंडीगढ़ ने नौकरी की। 1965 में उनकी शादि हुई थी। उसके बाद 1975 में वह कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय में आए। केयू से वह 2002 में रिटायर्ड हुए। उनके पास तीन बच्चे थे, जिनमें से बेटी बड़ी होकर डॉक्टर बनी, एक बेटा बिजनेसमैन और एक बेटे का देहांत हो गया था। सरदार निर्मल सिंह ने कहा कि उन्होंने बच्चों को हमेशा गुरु के बताए मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है। आज उनके बच्चे जीवन में सफल होकर अच्छा काम कर रहे हैं। उनकी तरक्की देखकर उम्र थम सी जाती है। वह अपना ज्यादातर समय परिवार के बीच में ही गुजारना पसंद करते हैं।
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73 की उम्र में भी पूरा उत्साह
73 वर्षीय अनाजमंडी आढ़ती युधिष्ठिर राय बहल इस उम्र में भी पूरे उत्साह से एक युवा की भांति काम कर रहे हैं। वे अपने काम आज भी स्वयं ही करते हैं। उनका कहना है कि उनका एक बेटा व बेटी विदेश में है। उनका संयुक्त परिवार है वह अपने भाई के साथ रहते हैं। अपनी आढ़त की दुकान का काम खुद ही करते हैं। आस पास के लोग भी उनसे काम से संबंधित मशवरा लेते हैं। उनका मानना बढ़ती उम्र में हमारा शरीर तब तक कार्य करता है जब तक हम उससे कार्य लेते रहेंगे। खुद को फिट रखने के लिए वह अपने सभी काम आज भी खुद करते है।
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27 साल से कर रहे लंगर सेवा, 68 साल की उम्र में भी नहीं रुके कदम
68 वर्षिय अधिवक्ता शिव राम के कदम समाजसेवा के लिए आज भी नहीं रुके हैं। समाजसेवा के लिए उनका जज्बा युवाओं के जोश को भी पीछे छोड़ जाता है। शिव राम का मानना है कि उनकी सकारात्मक सोच के कारण ही वह आज भी बढ़ती उम्र से हार नहीं मानते। शिव राम ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1992 में लंगर लगाकर भूखों का पेट भरने का कार्य शुरू किया था। उन्होंने उस दौरान रेडक्रॉस के साथ मिलकर बहुत से दिव्यांगों को आर्टिफिशल अंग भी लगवाए। समाजसेवा के इस सफर में बहुत से लोग उनके साथ भी जुडे़। वह जरूरतमंद परिवारों को एक साल का राशन उपलब्ध कराते हैं। इसके साथ ही जरूरतमंद बच्चों को पुस्तकें उपलब्ध कराने का कार्य भी वह करते हैं। वह हर चौदस को गुरु रविवाद मंदिर में लंगर भी लगवाते हैं। उन्होंने कोरोना काल में भी बहुत से जरूरतमंद परिवारों को राशन उपलब्ध कराया। उन्होंने समाजसेवा के साथ-साथ परिवार का भी बहुत अच्छे से पालन पोषण किया। जिसकी बदौलत आज उनका एक बेटा व बहु लंदन में एडवोकेट हैं। वहीं दूसरा बेटा फरीदाबाद में नौकरी करता है। शिव राम ने बताया कि वह 1983 से दिपावली अस्पताल में मरीजों के बीच मनाते आ रहे हैं। पोता-पोती के जन्मदिन पर वह अस्पताल में बच्चों को कपड़े वितरित करते हैं। शिव राम ने माता मनसा देवी भंडारा कमेटी की वरिष्ठ उपप्रधान भी हैं। 27 साल सेेवा करने के बाद भी उनका मानना वह इस काम में लेट हो गए।
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चार साल की उम्र में परिवार संग आए थे भारत
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव के पद से रिटायर्ड 78 वर्षीय सरदार निर्मल सिंह 1947 में बंटवारे के दौरान पाकिस्तान छोड़ अपने परिवार के साथ भारत आए थे। उन्होंने अंबाला में रहकर अपनी पढ़ाई की। 1963 में उन्होंने पीयू चंडीगढ़ ने नौकरी की। 1965 में उनकी शादि हुई थी। उसके बाद 1975 में वह कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय में आए। केयू से वह 2002 में रिटायर्ड हुए। उनके पास तीन बच्चे थे, जिनमें से बेटी बड़ी होकर डॉक्टर बनी, एक बेटा बिजनेसमैन और एक बेटे का देहांत हो गया था। सरदार निर्मल सिंह ने कहा कि उन्होंने बच्चों को हमेशा गुरु के बताए मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है। आज उनके बच्चे जीवन में सफल होकर अच्छा काम कर रहे हैं। उनकी तरक्की देखकर उम्र थम सी जाती है। वह अपना ज्यादातर समय परिवार के बीच में ही गुजारना पसंद करते हैं।
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73 की उम्र में भी पूरा उत्साह
73 वर्षीय अनाजमंडी आढ़ती युधिष्ठिर राय बहल इस उम्र में भी पूरे उत्साह से एक युवा की भांति काम कर रहे हैं। वे अपने काम आज भी स्वयं ही करते हैं। उनका कहना है कि उनका एक बेटा व बेटी विदेश में है। उनका संयुक्त परिवार है वह अपने भाई के साथ रहते हैं। अपनी आढ़त की दुकान का काम खुद ही करते हैं। आस पास के लोग भी उनसे काम से संबंधित मशवरा लेते हैं। उनका मानना बढ़ती उम्र में हमारा शरीर तब तक कार्य करता है जब तक हम उससे कार्य लेते रहेंगे। खुद को फिट रखने के लिए वह अपने सभी काम आज भी खुद करते है।