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Kurukshetra News: पिहोवा में विश्वामित्र ने उठाया था श्रीराम के कुलगुरु पर शस्त्र
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सुनील धीमान
कुरुक्षेत्र। पौराणिक नगरी पिहोवा भगवान श्री राम के कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच युद्ध का अखाड़ा भी रही है। कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच हुए युद्ध के कारण ही सरस्वती नदी को पूर्व वाहिनी होना पड़ा था। उस युद्ध के बाद से सरस्वती नदी आज भी पिहोवा के प्राची तीर्थ से पूर्व की ओर बह रही हैं। वामन, स्कंद पुराण सहित महाभारत में भी इसका उल्लेख मिलता है। दरअसल, दोनों महर्षि खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ समझते थे। इस कारण दोनों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई। विदित हो कि भले ही श्रीराम के कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ थे, लेकिन उन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान महर्षि विश्वामित्र ने अपने आश्रम में दिया था।
मां दुर्गा ज्योतिष केंद्र के संचालक आचार्य यज्ञदत्त ने बताया कि इन पुराणों के साथ विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है कि ऋषियों की सभा के बीच महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र को राजऋषि कहकर संबोधित किया था। इससे पहले दोनों के बीच तपस्या के कारण शत्रुता थी। इससे क्षुब्ध होकर महर्षि विश्वामित्र ने सरस्वती जी की आराधना कर वशिष्ठ ऋषि को उनके आश्रम सहित उन तक बहाकर लाने की विनती की थी ताकि वह उनकी हत्या कर दें। उनकी इस भावना को जानकर भी सरस्वती वशिष्ठ ऋषि को स्थाणु तीर्थ से बहाकर विश्वामित्र तक ले गईं, मगर जैसे ही विश्वामित्र ने उनकी हत्या के लिए शस्त्र उठाया सरस्वती पूर्व तटबंध तोड़कर बहा ले गई। अपना शस्त्र विफल होते देख विश्वामित्र ने सरस्वती को रक्त सहित पूर्व वाहिनी होने का श्राप दिया। कई वर्षों के बाद ऋषियों ने तपस्या कर श्रेष्ठ नदी का आह्वान कर नदी को रक्त मुक्त किया, मगर श्राप के असर से आज भी सरस्वती नदी प्राची तीर्थ में पूर्व वाहिनी ही हैं।
टीले पर मिले प्रतिहार काल के शिलालेख
सरस्वती नदी के दक्षिण छोर पर विश्वामित्र का टीला स्थित है। गुर्जर-प्रतिहार काल के दो शिलालेख इसका विवरण भी देते हैं। इनमें से एक शिलालेख से शहर के तीन विष्णु मंदिरों के निर्माण का विवरण मिलता है। यहां से रामायण और महाभारत को प्रदर्शित करती कई मूर्तियां बरामद हुई थीं। पुरातत्व विभाग ने यहां से प्राचीन मंदिर के अवशेष ईंट भी बरामद किए हैं, जिससे यहां सुरक्षित रखा गया है।
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कुरुक्षेत्र। पौराणिक नगरी पिहोवा भगवान श्री राम के कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच युद्ध का अखाड़ा भी रही है। कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच हुए युद्ध के कारण ही सरस्वती नदी को पूर्व वाहिनी होना पड़ा था। उस युद्ध के बाद से सरस्वती नदी आज भी पिहोवा के प्राची तीर्थ से पूर्व की ओर बह रही हैं। वामन, स्कंद पुराण सहित महाभारत में भी इसका उल्लेख मिलता है। दरअसल, दोनों महर्षि खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ समझते थे। इस कारण दोनों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई। विदित हो कि भले ही श्रीराम के कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ थे, लेकिन उन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान महर्षि विश्वामित्र ने अपने आश्रम में दिया था।
मां दुर्गा ज्योतिष केंद्र के संचालक आचार्य यज्ञदत्त ने बताया कि इन पुराणों के साथ विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है कि ऋषियों की सभा के बीच महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र को राजऋषि कहकर संबोधित किया था। इससे पहले दोनों के बीच तपस्या के कारण शत्रुता थी। इससे क्षुब्ध होकर महर्षि विश्वामित्र ने सरस्वती जी की आराधना कर वशिष्ठ ऋषि को उनके आश्रम सहित उन तक बहाकर लाने की विनती की थी ताकि वह उनकी हत्या कर दें। उनकी इस भावना को जानकर भी सरस्वती वशिष्ठ ऋषि को स्थाणु तीर्थ से बहाकर विश्वामित्र तक ले गईं, मगर जैसे ही विश्वामित्र ने उनकी हत्या के लिए शस्त्र उठाया सरस्वती पूर्व तटबंध तोड़कर बहा ले गई। अपना शस्त्र विफल होते देख विश्वामित्र ने सरस्वती को रक्त सहित पूर्व वाहिनी होने का श्राप दिया। कई वर्षों के बाद ऋषियों ने तपस्या कर श्रेष्ठ नदी का आह्वान कर नदी को रक्त मुक्त किया, मगर श्राप के असर से आज भी सरस्वती नदी प्राची तीर्थ में पूर्व वाहिनी ही हैं।
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टीले पर मिले प्रतिहार काल के शिलालेख
सरस्वती नदी के दक्षिण छोर पर विश्वामित्र का टीला स्थित है। गुर्जर-प्रतिहार काल के दो शिलालेख इसका विवरण भी देते हैं। इनमें से एक शिलालेख से शहर के तीन विष्णु मंदिरों के निर्माण का विवरण मिलता है। यहां से रामायण और महाभारत को प्रदर्शित करती कई मूर्तियां बरामद हुई थीं। पुरातत्व विभाग ने यहां से प्राचीन मंदिर के अवशेष ईंट भी बरामद किए हैं, जिससे यहां सुरक्षित रखा गया है।
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