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बाबा बंदा सिंह बहादुर के शहीदी दिवस को समर्पित सजाया महान गुरमत समागम
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गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और सिख संगत की ओर से बाबा बंदा सिंह बहादुर के शहीदी दिवस को समर्पित ऐतिहासिक गुरुद्वारा मस्तगढ़ साहिब में महान गुरमत समागम सजाया गया। शहीदी समागम को समर्पित तीन दिन पहले रखे गए श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अखंड पाठ के भोग डाला गया। वहीं लखविंद्र सिंह और जत्थों ने कीर्तन के माध्यम से संगत को निहाल किया। कीर्तन के उपरांत गुरुद्वारा साहिब के मुख्य ग्रंथि एवं कथावाचक ज्ञानी पतवंत सिंह ने बाबा बंदा सिंह बहादुर के जीवन पर प्रकाश डाला। उन्होंने युवा पीढ़ी को उनके दिखाए मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
कहा कि वे पहले ऐसे सिख सेनापति हुए, जिन्होंने मुगलों के अजय होने के भ्रम को तोड़ा था। उन्होंने छोटे साहिबजादों की शहादत का बदला लिया और गुरु गोबिंद सिंह द्वारा संकल्पित प्रभुसत्ता संपन्न लोक राज्य की राजधानी लोहगढ़ में खालसा राज की नींव रखी। उन्होंने श्री गुरु नानक देव जी और श्री गुरु गोबिंद सिंह के नाम से सिक्का और मोहरें जारी की। साथ ही हल वाहक किसान-मजदूरों को जमीन का मालिक बनाया। समागम में सिख संगत ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के आगे नतमस्तक होकर अरदास की। समागम के दौरान गुरु का लंगर वरताया गया। इस अवसर पर महिंद्र सिंह, बलविंद्र सिंह, जरनैल सिंह, तरलोचन सिंह, गुरनाम सिंह, मंजीत सिंह, सुखवंत सिंह सहित संगत मौजूद रहीं।
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कहा कि वे पहले ऐसे सिख सेनापति हुए, जिन्होंने मुगलों के अजय होने के भ्रम को तोड़ा था। उन्होंने छोटे साहिबजादों की शहादत का बदला लिया और गुरु गोबिंद सिंह द्वारा संकल्पित प्रभुसत्ता संपन्न लोक राज्य की राजधानी लोहगढ़ में खालसा राज की नींव रखी। उन्होंने श्री गुरु नानक देव जी और श्री गुरु गोबिंद सिंह के नाम से सिक्का और मोहरें जारी की। साथ ही हल वाहक किसान-मजदूरों को जमीन का मालिक बनाया। समागम में सिख संगत ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के आगे नतमस्तक होकर अरदास की। समागम के दौरान गुरु का लंगर वरताया गया। इस अवसर पर महिंद्र सिंह, बलविंद्र सिंह, जरनैल सिंह, तरलोचन सिंह, गुरनाम सिंह, मंजीत सिंह, सुखवंत सिंह सहित संगत मौजूद रहीं।
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