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Kurukshetra News: अब गुजरात में फिर से आकार लेगी पवित्र सरस्वती नदी, 50 किलोमीटर तक होगी खोदाई

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 05 Jun 2026 01:49 AM IST
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The sacred Saraswati River will be reshaped in Gujarat, with excavations spanning 50 kilometers.
कुरुक्षेत्र। देश की सबसे प्राचीन और पवित्र पौराणिक नदियों में से एक सरस्वती नदी अब हरियाणा के साथ-साथ गुजरात में भी आकार लेगी, जिसके लिए हरियाणा सरस्वती हेरिटेज बोर्ड व गुजरात सरकार ने कार्य शुरू कर दिया है। पहले चरण में 50 किलोमीटर तक की खोदाई होगी जबकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) गुजरात के सिद्धपुर से लेकर रण ऑफ कच्छ तक का नदी का ट्रैक खोजेगा, इसके लिए बोर्ड ने इसरो की अहमदाबाद स्थित इकाई से टाईअप किया है, जिसके बाद इस कार्य को अंजाम देने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है, इसके लिए छह माह का लक्ष्य तय किया गया है।
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विलुप्त हो चुकी नदी को फिर से जीवित करने की तैयारी के तहत ही हरियाणा सरस्वती हेरिटेज बोर्ड की टीम गुजरात पहुंची, जहां अनेक शोधकर्ताओं के साथ-साथ गुजरात सरकार के प्रतिनिधियों से भी विस्तार से चर्चा की गई। वहां की सरकार ने भी तत्काल इस दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं, जिसके तहत ढोलकिया फाउंडेशन के सहयोग से करीब 10 किलोमीटर एरिया में नदी की खोदाई का कार्य किया जाने लगा है, यही नहीं रिजर्वायर भी तैयार किया जा रहा है।
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सरस्वती नदी का वर्णन वेदों में भी है जिसमें यह भी स्पष्ट है कि यह नदी हिमालय से निकलकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात से बहती हुई अरब सागर (कच्छ की खाड़ी) में गिरती थी, इसके तट पर ही वेदों की रचना हुई और सिंधु-सरस्वती सभ्यता (हड़प्पा संस्कृति) फली-फूली। जानकारों के मुताबिक भूगर्भीय और जलवायु परिवर्तनों के कारण लगभग 5000 ईसा पूर्व यह विशाल नदी धीरे-धीरे सूख गई और भूमि के नीचे समा गई।
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राजस्थान सरकार भी बना चुकी कमेटी : धुम्मन
सरस्वती हेरिटेज बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच के मुताबिक गुजरात में धोलावीरा पुरातात्विक स्थल है, जो सरस्वती नदी का भी आखिरी मुहाना है। यहां पर भी रिजर्वायर बनाए जाने की योजना है। वे बताते हैं कि हरियाणा में सरस्वती बहने लगी है जबकि राजस्थान सरकार ने भी इस पर कार्य करने के लिए कमेटी बना दी है।

आज के समय में सरस्वती नदी उत्तराखंड में अलकनंदा की सहायक नदी के रूप में बद्रीनाथ के पास माणा गांव से निकलती है। माणा में भीम पुल के पास इसका प्रचंड रूप दिखाई देता है। त्रिवेणी संगम प्रयागराज (इलाहाबाद) में गंगा और यमुना के साथ सरस्वती का गुप्त मिलन माना जाता है।
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