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शिक्षकों के समर्पण भाव, कर्तव्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करता है शिक्षक दिवस : ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी
Sat, 06 Sep 2025 01:13 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Sat, 06 Sep 2025 01:13 AM IST
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कुरुक्षेत्र। ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी।
- फोटो : mathura
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। श्री जयराम शिक्षण संस्थान के चेयरमैन ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी ने कहा कि शिक्षकों के योगदान, उनके समर्पण भाव, कर्तव्यनिष्ठा को सलाम करने के लिए शिक्षक दिवस मनाया जाता है। ब्रह्मचारी ने कहा कि शिक्षकों ने हमेशा समाज को शिक्षित करने के साथ चुनौतियों को पूरा करने में अपने छात्रों का सहयोग किया है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक की ओर से दिया गया ज्ञान ही इंसान को जीने योग्य जीवन की दिशा में ले जाता है। जिस तरह से एक शिल्पकार पत्थर को तराश कर उसे मूर्ति का आकार देता है और कुम्हार कच्ची मिट्टी को तपा कर उसके विकारों को दूर करता है। ठीक उसी प्रकार एक शिक्षक भी शिष्यों के अवगुणों को दूर कर काबिल बनाता है। शिक्षक ज्ञान का वह अविरल रहने वाला स्रोत बताया गया है, जो लाखों शिष्यों के भाग्य का निर्माण करता है। शिक्षक ज्ञान का एक ऐसा भंडार है, जो दूसरों को बनाने में खुद को भी भुला देता है। ब्रह्मचारी ने कहा कि एक बच्चे के जन्म के बाद उसकी मां पहली गुरु होती है, जो अक्षरों का बोध कराती हैं। वहीं दूसरे स्थान पर शिक्षक होते हैं, जो हमें काबिल बनाते हैं और सांसारिक बोध कराते हैं।
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कुरुक्षेत्र। श्री जयराम शिक्षण संस्थान के चेयरमैन ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी ने कहा कि शिक्षकों के योगदान, उनके समर्पण भाव, कर्तव्यनिष्ठा को सलाम करने के लिए शिक्षक दिवस मनाया जाता है। ब्रह्मचारी ने कहा कि शिक्षकों ने हमेशा समाज को शिक्षित करने के साथ चुनौतियों को पूरा करने में अपने छात्रों का सहयोग किया है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक की ओर से दिया गया ज्ञान ही इंसान को जीने योग्य जीवन की दिशा में ले जाता है। जिस तरह से एक शिल्पकार पत्थर को तराश कर उसे मूर्ति का आकार देता है और कुम्हार कच्ची मिट्टी को तपा कर उसके विकारों को दूर करता है। ठीक उसी प्रकार एक शिक्षक भी शिष्यों के अवगुणों को दूर कर काबिल बनाता है। शिक्षक ज्ञान का वह अविरल रहने वाला स्रोत बताया गया है, जो लाखों शिष्यों के भाग्य का निर्माण करता है। शिक्षक ज्ञान का एक ऐसा भंडार है, जो दूसरों को बनाने में खुद को भी भुला देता है। ब्रह्मचारी ने कहा कि एक बच्चे के जन्म के बाद उसकी मां पहली गुरु होती है, जो अक्षरों का बोध कराती हैं। वहीं दूसरे स्थान पर शिक्षक होते हैं, जो हमें काबिल बनाते हैं और सांसारिक बोध कराते हैं।
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