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टूटते परिवारों से समाज भी हो रहा कमजोर : महंत राजेंद्र पुरी
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कुरुक्षेत्र। जग ज्योति दरबार में सत्संग जारी रहा, जिसमें महंत राजेंद्र पुरी ने कहा कि आधुनिकता में परिवार बिखर रहे हैं। बिखरते परिवारों में रिश्ते भी टूट रहे हैं। उन्होंने कहा कि टूटते परिवारों से समाज भी कमजोर होता जा रहा है। सत्संग में श्रद्धालुओं से धर्म, संस्कृति व संस्कारों के ज्ञान के साथ अपने परिवारों एवं बच्चों को जोड़ने की अपील की। परिवार में रह कर ही समझ सकते हैं कि समाज के हर इंसान को आज एक दूसरे की जरूरत है।
महंत ने कहा कि बच्चों को अपने रीति रिवाज, पूजा की विधि, कुल देवी देवताओं और पितृ देवताओं के बारे में अवश्य बताएं। बच्चों को संस्कृति एवं संस्कारों के साथ अध्यात्म का महत्व बताएं। बच्चे परिवार का महत्व समझकर अपने बड़े बुजुर्गों का सम्मान करेंगे। साथ ही बच्चों को साथ लेकर पूरे विधि विधान से पूजा करें। उन्होंने कहा कि आधुनिकता का नकाब पहन कर हम अपने सनातन धर्म को भूल रहे हैं, लोक दिखावे और एशो आराम का जीवन जीने की चाह में भगवान को भी भूला बैठे हैं।
महंत ने कहा कि आधुनिक होना बुरा नहीं है परंतु अपने कुल देवी देवता और पितृ देवताओं को याद न करना सबसे बड़ी भूल है। माता-पिता की जिम्मेवारी बनती है कि अपनी संतान को धर्म और पूर्वजों के बारे बताएं। उनकी महत्ता और पूजा करना सिखाएं। वर्तमान पीढ़ी और आने वाली औलाद जब तक खुद की पहचान नहीं कर पाएंगी, तब तक अपने-पराए की, परिवार-रिश्तेदारों की कद्र नहीं कर सकेंगे और न समझ सकेंगे।
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महंत ने कहा कि बच्चों को अपने रीति रिवाज, पूजा की विधि, कुल देवी देवताओं और पितृ देवताओं के बारे में अवश्य बताएं। बच्चों को संस्कृति एवं संस्कारों के साथ अध्यात्म का महत्व बताएं। बच्चे परिवार का महत्व समझकर अपने बड़े बुजुर्गों का सम्मान करेंगे। साथ ही बच्चों को साथ लेकर पूरे विधि विधान से पूजा करें। उन्होंने कहा कि आधुनिकता का नकाब पहन कर हम अपने सनातन धर्म को भूल रहे हैं, लोक दिखावे और एशो आराम का जीवन जीने की चाह में भगवान को भी भूला बैठे हैं।
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महंत ने कहा कि आधुनिक होना बुरा नहीं है परंतु अपने कुल देवी देवता और पितृ देवताओं को याद न करना सबसे बड़ी भूल है। माता-पिता की जिम्मेवारी बनती है कि अपनी संतान को धर्म और पूर्वजों के बारे बताएं। उनकी महत्ता और पूजा करना सिखाएं। वर्तमान पीढ़ी और आने वाली औलाद जब तक खुद की पहचान नहीं कर पाएंगी, तब तक अपने-पराए की, परिवार-रिश्तेदारों की कद्र नहीं कर सकेंगे और न समझ सकेंगे।
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