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होली पर गूंजते थे भाभी और देवर के ठहाके

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 12 Mar 2022 01:53 AM IST
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Sister-in-law and brother-in-law used to resonate on Holi, Kurukshetra
चंदन सिंह। - फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
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कुरुक्षेत्र। पहले जमाने में फाल्गुन के आरंभ होते ही होली का पर्व शुरू हो जाता था। घर में अलग-अलग तरह कई पकवान बनाए जाते थे। विशेष तौर पर भाभी और देवर होली खेलते थे। गलियों, चौराहों और मोहल्ले पर हंसी ठहाका होता था, मगर अब यह सब सिर्फ यादें बनकर रह गई हैं।
बुजुर्गों का कहना है कि त्योहार में बेशक कई रंग शामिल हो गए हैं, मगर लोगों में भाईचारे का रंग खत्म हो गया है। लोग अपने घर तक सीमित होकर ही होली खेलने लगे हैं। देवर-भाभी का हंसी मजाक गुम हो गया है। त्योहार पर लोगों का खानपान भी पूरी तरह से बदल गया है।
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बुजुर्ग चंदन सिंह ने बताया कि 40 साल पहले वे फाल्गुन के शुरू होते ही होली की तैयारी शुरू कर देते थे। उस समय पूरा महीना होली का त्योहार मनाया जाता था। उनके घर में खोये, चुलाई, देसी के लड्डूू बनाए जाते थे। कुएं से पानी लाकर घड़े, कढ़ाई और ओहदी में एकत्रित करते थे और भाभी के साथ होली खेलते थे। भाभियां भी पानी में भिगोकर चुनरी का बना कोड़ा मारती थीं।
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बुजुर्ग राम सिंह ने बताया कि होली से पहले बहन और बेटी के ससुराल शगुन लेकर जाने की परंपरा है। वह अपनी बहन के लिए शगुन में फल और घर में बनी मिठाई ले जाते थे। हालांकि अब भी वे होली से पहले अपनी बहन और बेटी को शगुन भेजते हैं। पहले वह खुद शगुन लेकर जाते थे, अब उनके बच्चे लेकर जाते हैं।

राम सिंह।

राम सिंह।- फोटो : Kurukshetra

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