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श्री संगमेश्वर महादेव मंदिर : स्वयंभू शिवलिंग, पौराणिक कथाएं और अद्भुत मान्यताओं से जुड़ा आस्था का प्राचीन तीर्थ

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 13 Feb 2026 02:16 AM IST
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Shri Sangameshwar Mahadev Temple: An ancient pilgrimage site associated with the self-manifested Shivalinga, mythological stories and amazing beliefs
पिहोवा। संगमेश्वर शिव मंदिर अरुणाय। संवाद
पिहोवा। संगमेश्वर धाम अरुणाय अत्यंत प्राचीन व प्रतिष्ठित शिव तीर्थ है। यह धाम अरुणा और सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित है और आसपास के कई प्रदेशों में इसकी गहरी मान्यता है। पुराणों के अनुसार यहां भगवान शिव स्वयं लिंग रूप में प्रकट हुए थे। यही कारण है कि मुख्य मंदिर में विराजमान शिवलिंग को स्वयंभू भू-लिंग माना जाता है जिसकी पूजा-अर्चना विशेष फलदायी मानी जाती है।
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संगमेश्वर धाम का उल्लेख पौराणिक कथाओं में महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के प्रसंग से जुड़ा मिलता है। तपोबल की प्रतिस्पर्धा के दौरान विश्वामित्र की ओर से छल से सरस्वती को महर्षि वशिष्ठ को अपने आश्रम तक लाने के लिए प्रेरित किया गया। श्राप के भय से सरस्वती उन्हें तेज बहाव में लेकर चली लेकिन संकट के समय सरस्वती ने इसी स्थान पर प्रकट हुए शिवलिंग की आराधना की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर सरस्वती को विश्वामित्र के श्राप से मुक्त किया और पुनः जलधारा प्रदान की। तभी से इस संगम स्थल पर शिव आराधना की परंपरा आरंभ हुई।
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आधुनिक काल में 1942 से पूर्व तत्कालीन सचिव महंत गिरधर नारायण गिरि ने इस तीर्थ की दशा सुधारने का बीड़ा उठाया। उनके प्रयासों से वर्ष 1946 में महंत गिरधर नारायण पुरी और बाबा शरण पुरी के सहयोग से एक लाख रुपये की लागत से मंदिर और डेरे का निर्माण पूर्ण हुआ। आज यह तीर्थ पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी कनखल हरिद्वार की देखरेख में है। श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सचिव व अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी के सानिध्य में महंत विश्वनाथ गिरी यहां की व्यवस्थाएं संभाल रहे हैं।
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धार्मिक महत्व के साथ-साथ संगमेश्वर धाम अपनी विशिष्ट मान्यताओं के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां शिवलिंग पर जलाभिषेक, पूजन और धागा बांधने से मनोकामनाएं पूर्ण होने की आस्था है। संतान प्राप्ति, मानसिक शांति और जीवन की बाधाओं से मुक्ति के लिए श्रद्धालु यहां आते हैं। हर माह की त्रयोदशी और विशेष रूप से महाशिवरात्रि पर यह धाम आस्था और इतिहास का जीवंत संगम बन जाता है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहां वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें शिवलिंग पर जलाभिषेक के लिए लाखों श्रद्धालुओं पहुंचते हैं।

दीमक के ढेर के भीतर तेजस्वी शिवलिंग के हुए थे दर्शन
मंदिर की इतिहास पुस्तिका के अनुसार पुराने समय में यहां महात्मा गणेश गिरि अपने शिष्यों सहित निवास करते थे। एक दिन उन्होंने झाड़ियों में दीमक के ढेर के भीतर तेजस्वी शिवलिंग का दर्शन किया। शिवलिंग को अन्य स्थान पर स्थापित करने का प्रयास किया गया लेकिन उसका अंतिम छोर न मिलने और स्वप्न में भगवान शिव के आदेश के बाद उसी स्थान पर मंदिर निर्माण का संकल्प लिया गया। अगली सुबह शिवलिंग से लिपटा काला सर्प इस स्थान की दिव्यता का प्रतीक माना गया।

पिहोवा। संगमेश्वर शिव मंदिर अरुणाय। संवाद

पिहोवा। संगमेश्वर शिव मंदिर अरुणाय। संवाद

पिहोवा। संगमेश्वर शिव मंदिर अरुणाय। संवाद

पिहोवा। संगमेश्वर शिव मंदिर अरुणाय। संवाद

पिहोवा। संगमेश्वर शिव मंदिर अरुणाय। संवाद

पिहोवा। संगमेश्वर शिव मंदिर अरुणाय। संवाद

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