{"_id":"692612dfdbf9dcd15b07e323","slug":"scholars-share-knowledge-and-experiences-from-the-bhagavad-gita-at-the-round-table-conference-kurukshetra-news-c-45-1-kur1001-145940-2025-11-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kurukshetra News: गोलमेज सम्मेलन में विद्वानों ने श्रीमद्भगवद्गीता से मिले ज्ञान और अनुभवों को किया साझा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kurukshetra News: गोलमेज सम्मेलन में विद्वानों ने श्रीमद्भगवद्गीता से मिले ज्ञान और अनुभवों को किया साझा
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। गोलमेज सम्मेलन में विचार साझा करते विदेशी विद्वान। संवाद
- फोटो : Samvad
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सीनेट हाॅल में विदेश मंत्रालय और कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय गीता सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसके दूसरे दिन गोलमेज सम्मेलन हुआ जिसका शुभारंभ स्वामी ज्ञानानंद ने किया। सम्मेलन में अमेरिका, हंगरी, जापान, थाईलैंड, चीन, स्पेन, बेलारूस, फिजी, नेपाल, मलयेशिया, कजाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों के विद्वानों ने श्रीमद्भगवद्गीता से मिले ज्ञान और अपने अनुभव साझा किए।
सम्मेलन में विद्वानों ने मानव मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण, जिम्मेदार एआई के उपयोग, ध्यान, संतुलित आहार-विहार, पितृ-मातृ सम्मान और सतत विकास जैसे विषयों पर गीता के संदर्भ में अपने विचार रखे। जेएनयू के प्रो. राव ने निष्काम कर्म सिद्धांत को जलवायु दायित्व से जोड़ा। पोलैंड की अन्ना रूचिंस्का ने हानिकारक रसायनों में कमी की जरूरत बताई। इथियोपिया के डेनियल ह्यूम ने अध्यात्म और सतत विकास को एक-दूसरे का पूरक बताया।
स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि गीता का संदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं था बल्कि मानवता के लिए था। दुनिया जिन मानसिक, पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रही है, उनका समाधान गीता में निहित है। गीता हमें लेने की नहीं, देने की प्रवृत्ति विकसित करना सिखाती है। जब विचार केवल स्वयं तक सीमित होते हैं तो प्रदूषण जन्म लेता है। यदि डिजिटल तकनीक का सही उपयोग हो तो एआई भी एक्चुअल इंटेलिजेंस बन सकती है। गीता हर प्रश्न और चुनौती का समाधान देती है। सम्मेलन का वास्तविक सार तो अंतरराष्ट्रीय संवाद से निकलने वाले विचारों में निहित है।
विज्ञापन
कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि गीता आज भी नैतिक शासन, सतत विकास और वैश्विक शांति की प्रेरणा देती है। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि गीता के संदेशों को व्यक्तिगत, शैक्षणिक और व्यावसायिक जीवन में अपनाएं। विदेश मंत्रालय सचिव डॉ. नीना मल्होत्रा ने कहा कि मंत्रालय लगातार गीता महोत्सव का सहयोगी रहा है। इस बार कुरुक्षेत्र में होने वाले उत्सव में 40 देशों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास है, सम्मेलन में 25 देशों के स्कॉलर भाग ले रहे हैं। दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र की निदेशक प्रो. मंजुला चौधरी ने विश्वभर से आए विद्वानों और शोधार्थियों के प्रश्न-उत्तर सत्र का संचालन किया और सभी की जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत किया। इस मौके पर सम्मेलन निदेशक प्रो. तेजेंद्र शर्मा भी मौजूद रहे।
वैदिक संस्कृति ही समस्याओं का समाधान : पंकज मौर्य
बहरीन से आए विद्वान पंकज दास मौर्य ने कहा कि वैदिक संस्कृति के अनुसार चलने से सभी समस्याओं का समाधान सहज रूप से संभव है। शास्त्रों में मनुष्य को धरती का पुत्र बताया गया है और पांच यज्ञ-मनुष्य यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ, देव यज्ञ और ऋषि यज्ञ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रकृति, नदियों, पर्वतों और सभी जीवों के प्रति सम्मान की भावना ही संतुलन का मूल है। जब हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, तब वही शक्ति हमें सम्मान और संरक्षण देगी।
प्रकृति के प्रति विनम्रता और संतुलन
पोलैंड के विद्वान स्करबिंग ने कहा कि पृथ्वी को माता का दर्जा देकर उसके संसाधनों का विनम्रता से उपयोग करना चाहिए। रूस के डॉ. मार्सिस गजुन्स ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर अत्यधिक निर्भरता सीमित करने और मानवीय निर्णय क्षमता को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई। फिजी के स्वामी संयुक्तानंद ने पितरों और पूर्वजों के सम्मान पर बल दिया। हंगरी के जोल्टन होस्जू ने ध्यान को अंतरशांति व वैश्विक सद्भाव का माध्यम बताया और ऑस्ट्रेलिया के मार्क एलन ने आमने-सामने शिक्षण को समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।
विज्ञापन
सम्मेलन में विद्वानों ने मानव मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण, जिम्मेदार एआई के उपयोग, ध्यान, संतुलित आहार-विहार, पितृ-मातृ सम्मान और सतत विकास जैसे विषयों पर गीता के संदर्भ में अपने विचार रखे। जेएनयू के प्रो. राव ने निष्काम कर्म सिद्धांत को जलवायु दायित्व से जोड़ा। पोलैंड की अन्ना रूचिंस्का ने हानिकारक रसायनों में कमी की जरूरत बताई। इथियोपिया के डेनियल ह्यूम ने अध्यात्म और सतत विकास को एक-दूसरे का पूरक बताया।
विज्ञापन
स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि गीता का संदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं था बल्कि मानवता के लिए था। दुनिया जिन मानसिक, पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रही है, उनका समाधान गीता में निहित है। गीता हमें लेने की नहीं, देने की प्रवृत्ति विकसित करना सिखाती है। जब विचार केवल स्वयं तक सीमित होते हैं तो प्रदूषण जन्म लेता है। यदि डिजिटल तकनीक का सही उपयोग हो तो एआई भी एक्चुअल इंटेलिजेंस बन सकती है। गीता हर प्रश्न और चुनौती का समाधान देती है। सम्मेलन का वास्तविक सार तो अंतरराष्ट्रीय संवाद से निकलने वाले विचारों में निहित है।
विज्ञापन
कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि गीता आज भी नैतिक शासन, सतत विकास और वैश्विक शांति की प्रेरणा देती है। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि गीता के संदेशों को व्यक्तिगत, शैक्षणिक और व्यावसायिक जीवन में अपनाएं। विदेश मंत्रालय सचिव डॉ. नीना मल्होत्रा ने कहा कि मंत्रालय लगातार गीता महोत्सव का सहयोगी रहा है। इस बार कुरुक्षेत्र में होने वाले उत्सव में 40 देशों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास है, सम्मेलन में 25 देशों के स्कॉलर भाग ले रहे हैं। दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र की निदेशक प्रो. मंजुला चौधरी ने विश्वभर से आए विद्वानों और शोधार्थियों के प्रश्न-उत्तर सत्र का संचालन किया और सभी की जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत किया। इस मौके पर सम्मेलन निदेशक प्रो. तेजेंद्र शर्मा भी मौजूद रहे।
वैदिक संस्कृति ही समस्याओं का समाधान : पंकज मौर्य
बहरीन से आए विद्वान पंकज दास मौर्य ने कहा कि वैदिक संस्कृति के अनुसार चलने से सभी समस्याओं का समाधान सहज रूप से संभव है। शास्त्रों में मनुष्य को धरती का पुत्र बताया गया है और पांच यज्ञ-मनुष्य यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ, देव यज्ञ और ऋषि यज्ञ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रकृति, नदियों, पर्वतों और सभी जीवों के प्रति सम्मान की भावना ही संतुलन का मूल है। जब हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, तब वही शक्ति हमें सम्मान और संरक्षण देगी।
प्रकृति के प्रति विनम्रता और संतुलन
पोलैंड के विद्वान स्करबिंग ने कहा कि पृथ्वी को माता का दर्जा देकर उसके संसाधनों का विनम्रता से उपयोग करना चाहिए। रूस के डॉ. मार्सिस गजुन्स ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर अत्यधिक निर्भरता सीमित करने और मानवीय निर्णय क्षमता को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई। फिजी के स्वामी संयुक्तानंद ने पितरों और पूर्वजों के सम्मान पर बल दिया। हंगरी के जोल्टन होस्जू ने ध्यान को अंतरशांति व वैश्विक सद्भाव का माध्यम बताया और ऑस्ट्रेलिया के मार्क एलन ने आमने-सामने शिक्षण को समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।