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Kurukshetra News: सरस्वती तीर्थ बना हिंदू-सिख समुदाय की एकता का केंद्र
Fri, 20 Mar 2026 03:05 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Fri, 20 Mar 2026 03:05 AM IST
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पिहोवा। चैत्र चौदस मेले के अंतिम दिन स्नान के बाद पिंडदान करवाते श्रद्वालु। आयोजक
पिहोवा। चार दिवसीय चैत्र चौदस मेला वीरवार को संपन्न हो गया, जिसके अंतिम दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्वालु पहुंचे और स्नान के साथ अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए पिंडदान भी किया। चार दिन तक मेले के चलते पवित्र सरस्वती तीर्थ हिंदू-सिख एकता व समरसता का केंद्र बना रहा।
सरस्वती तीर्थ पर चैत्र चौदस मेले के यादगार लम्हों ने हिंदू ओर सिख समुदाय के लाखों लोगों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया है। दोनों समुदाय के लोग इस तीर्थ के पवित्र जल में एक साथ डुबकी लगाकर अपने पितरों की शांति के लिए कामना करते दिखाई दिए।
मेले के आखिरी दिन हिंदू सिख एकता का दृश्य हजारों साल पुरानी परंपरा को बयां कर गया। राजस्थान-हिमाचल ओर पंजाब से आने वाले कुछ परिवार एक साल इस मेले के आने का इंतजार करते हैं। इस मेले के जरिए ही इन परिवारों में दोस्ताना संबंध स्थापित हुए। कई परिवारों ने तो भाई चारा तक कायम कर लिया है। श्रद्धालुओं का कहना है कि वे इस चैत्र चौदस मेले में पितरों की आत्मिक शांति के लिए आते हैं। उपमंडल अधिकारी नागरिक अनिल कुमार दून ने कहा कि विश्व प्रसिद्घ चैत्र चौदस मेले में विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु सरस्वती तीर्थ पर पहुंचे, इन श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा पुख्ता इंतजाम किए गए थे। इस मेले में किसी भी श्रद्धालुओं को सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से परेशानी नहीं आने दी गई। इन श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन की तरफ से करीब अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त किया गया था।
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मेले में कई जगहों पर नाकाबंदी की गई थी और सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे। सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी, छठी पातशाही गुरु हरगोबिंद, नौवीं पातशाही गुरू तेग बहादुर व 10वीं पातशाही गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस पवित्र शहर में आए। इस प्रकार भगवान शिव शंकर, भगवान श्री कृष्ण सहित अनेक देवी देवताओं ने इस धर्म नगरी में आए थे। इसलिए चैत्र चौदस मेले पर दोनों समुदाय के लोग श्रद्धा भाव से आते हैं। विभिन्न संस्थाओं ने शहर की हर गली ओर मोहल्ले में श्रद्धालुओं के लिए विशेष तौर पर लंगर लगाए गए थे।
श्रद्धालुओं को वितरित किए जा रहे अटूट लंगर को देखकर ऐसा लग रहा था मानो शहर का हर नागरिक श्रद्धालुओं की सेवा में लगा हुआ है। इससे श्रद्धालुओं को यह संदेश भी मिल रहा है कि इस शहर में जाति धर्म ओर भेदभाव का नाम ओर निशान नहीं है। सभी लोग एक छत के नीचे रहकर सेवा करने में जुटे हुए हैं। संवाद
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सरस्वती तीर्थ पर चैत्र चौदस मेले के यादगार लम्हों ने हिंदू ओर सिख समुदाय के लाखों लोगों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया है। दोनों समुदाय के लोग इस तीर्थ के पवित्र जल में एक साथ डुबकी लगाकर अपने पितरों की शांति के लिए कामना करते दिखाई दिए।
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मेले के आखिरी दिन हिंदू सिख एकता का दृश्य हजारों साल पुरानी परंपरा को बयां कर गया। राजस्थान-हिमाचल ओर पंजाब से आने वाले कुछ परिवार एक साल इस मेले के आने का इंतजार करते हैं। इस मेले के जरिए ही इन परिवारों में दोस्ताना संबंध स्थापित हुए। कई परिवारों ने तो भाई चारा तक कायम कर लिया है। श्रद्धालुओं का कहना है कि वे इस चैत्र चौदस मेले में पितरों की आत्मिक शांति के लिए आते हैं। उपमंडल अधिकारी नागरिक अनिल कुमार दून ने कहा कि विश्व प्रसिद्घ चैत्र चौदस मेले में विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु सरस्वती तीर्थ पर पहुंचे, इन श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा पुख्ता इंतजाम किए गए थे। इस मेले में किसी भी श्रद्धालुओं को सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से परेशानी नहीं आने दी गई। इन श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन की तरफ से करीब अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त किया गया था।
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मेले में कई जगहों पर नाकाबंदी की गई थी और सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे। सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी, छठी पातशाही गुरु हरगोबिंद, नौवीं पातशाही गुरू तेग बहादुर व 10वीं पातशाही गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस पवित्र शहर में आए। इस प्रकार भगवान शिव शंकर, भगवान श्री कृष्ण सहित अनेक देवी देवताओं ने इस धर्म नगरी में आए थे। इसलिए चैत्र चौदस मेले पर दोनों समुदाय के लोग श्रद्धा भाव से आते हैं। विभिन्न संस्थाओं ने शहर की हर गली ओर मोहल्ले में श्रद्धालुओं के लिए विशेष तौर पर लंगर लगाए गए थे।
श्रद्धालुओं को वितरित किए जा रहे अटूट लंगर को देखकर ऐसा लग रहा था मानो शहर का हर नागरिक श्रद्धालुओं की सेवा में लगा हुआ है। इससे श्रद्धालुओं को यह संदेश भी मिल रहा है कि इस शहर में जाति धर्म ओर भेदभाव का नाम ओर निशान नहीं है। सभी लोग एक छत के नीचे रहकर सेवा करने में जुटे हुए हैं। संवाद

पिहोवा। चैत्र चौदस मेले के अंतिम दिन स्नान के बाद पिंडदान करवाते श्रद्वालु। आयोजक