{"_id":"62cb334b8970800f2907f490","slug":"sanskrit-is-the-oldest-language-in-the-world-kurukshetra-kurukshetra-news-knl1142379153","type":"story","status":"publish","title_hn":"संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा
विज्ञापन
जयराम विद्यापीठ के संस्कृत संभाषण शिविर में हिस्सा लेते विद्यार्थी। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। श्री जयराम विद्यापीठ में आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में हरियाणा संस्कृत अकादमी की ओर से संस्कृत संभाषण शिविर का आयोजन किया गया है। इसमें प्राचार्य पंडित रणबीर भारद्वाज ने कहा कि संस्कृत मानव सभ्यता के प्राचीन इतिहास से जुड़ी विश्व की प्राचीन भाषा है। यह आधुनिक भाषा के रूप में सर्वथा सार्थक है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार देवता अमर हैं, उसी प्रकार संस्कृत भाषा भी अपने विशाल साहित्य, लोकहित की भावना, विभिन्न प्रयासों और उपसर्गों के माध्यम से नवीन-नवीन शब्दों के निर्माण की क्षमता आदि से अमर है। आधुनिक विद्वानों के अनुसार संस्कृत भाषा का अखंड प्रवाह पांच सहस्र वर्षों से बहता चला आ रहा है। आज भी सभी क्षेत्रों में इस भाषा के द्वारा ग्रंथ निर्माण की क्षीण धारा अविच्छिन्न रूप से बह रही है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा को लोकप्रिय एवं हर व्यक्ति के जीवन की आवश्यकता बनानी चाहिए। तभी लोग संस्कृत के प्रति अपना उत्साह दिखाएंगे। आज के भौतिकवादी युग में संस्कृत भाषा को सबसे विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, मगर हमेशा ही आम लोगों के प्रोत्साहन एवं विश्वास के कारण यह समृद्ध भाषा रही है। इस अवसर पर प्राध्यापक आचार्य पंडित राजेश प्रसाद, संजय कुमार ने भी विचार रखे।
विज्ञापन
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। श्री जयराम विद्यापीठ में आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में हरियाणा संस्कृत अकादमी की ओर से संस्कृत संभाषण शिविर का आयोजन किया गया है। इसमें प्राचार्य पंडित रणबीर भारद्वाज ने कहा कि संस्कृत मानव सभ्यता के प्राचीन इतिहास से जुड़ी विश्व की प्राचीन भाषा है। यह आधुनिक भाषा के रूप में सर्वथा सार्थक है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार देवता अमर हैं, उसी प्रकार संस्कृत भाषा भी अपने विशाल साहित्य, लोकहित की भावना, विभिन्न प्रयासों और उपसर्गों के माध्यम से नवीन-नवीन शब्दों के निर्माण की क्षमता आदि से अमर है। आधुनिक विद्वानों के अनुसार संस्कृत भाषा का अखंड प्रवाह पांच सहस्र वर्षों से बहता चला आ रहा है। आज भी सभी क्षेत्रों में इस भाषा के द्वारा ग्रंथ निर्माण की क्षीण धारा अविच्छिन्न रूप से बह रही है।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा को लोकप्रिय एवं हर व्यक्ति के जीवन की आवश्यकता बनानी चाहिए। तभी लोग संस्कृत के प्रति अपना उत्साह दिखाएंगे। आज के भौतिकवादी युग में संस्कृत भाषा को सबसे विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, मगर हमेशा ही आम लोगों के प्रोत्साहन एवं विश्वास के कारण यह समृद्ध भाषा रही है। इस अवसर पर प्राध्यापक आचार्य पंडित राजेश प्रसाद, संजय कुमार ने भी विचार रखे।
विज्ञापन