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माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान विद्यार्थी का नैतिक कर्त्तव्य : आचार्य देवव्रत
Tue, 25 Feb 2025 02:13 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Tue, 25 Feb 2025 02:13 AM IST
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कुरुक्षेत्र। गुरुकुल कुरुक्षेत्र में सोेमवार को कार्यक्रम का आयोजन किया गया । इस अवसर पर गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने विद्यार्थियों को जीवन में सफलता के लिए कड़ा परिश्रम करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करना विद्यार्थी का नैतिक कर्त्तव्य है। इस दौरान 12वीं कक्षा के छात्रों ने आचार्य को स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
आचार्य ने कहा कि अभिभावकों को बच्चों से ये अपेक्षा होती है कि वे बुढ़ापे में उनकी सेवा करे, समाज में उनका मान सम्मान बढ़ाए। इसी आशा के साथ अभिभावक अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजते हैं, जहां बच्चों को संस्कारवान बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 9वीं से 12वीं कक्षा के दौरान छात्रों में शारीरिक बदलाव आते हैं, इस दौर में बच्चे दिमाग से कम और दिल से ज्यादा निर्णय लेते है जो कई बार उनके भविष्य के लिए सही साबित नहीं होते। विद्यार्थियों को हमेशा विनम्र होना चाहिए क्योंकि विन्रमता से ही विद्या आती है। उन्होंने कहा कि कुछ बच्चे दुनिया की चकाचौंध से भ्रमित होकर अपने जीवन के लक्ष्य से भटक जाते है, गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति इसी भटकाव से उन्हें रोकती है, गुरुकुल के संस्कार ब्रह्मचारी को गलत आदतें, गलत संगत से बचाकर एक सभ्य नागरिक बनने के लिए प्रेरित करते हैं।
उन्होंने कहा कि आज दुनिया श्रीकृष्ण और श्रीराम को श्रद्धा से स्मरण करती है जबकि रावण, कंस, दुर्योधन आदि का नाम भी कोई सम्मान से नहीं लेता। इसलिए जीवन में उन्नति के लिए हमेशा बड़ो का सम्मान करो, पुस्तकों से प्रेम करो और समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में करो। मंच संचालन मुख्य संरक्षक संजीव आर्य ने किया। इस मौके पर गुरुकुल के निदेशक ब्रिगेडियर डॉ. प्रवीण कुमार, प्राचार्य सूबे प्रताप सहित सभी अध्यापक एवं संरक्षक मौजूद रहे।
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आचार्य ने कहा कि अभिभावकों को बच्चों से ये अपेक्षा होती है कि वे बुढ़ापे में उनकी सेवा करे, समाज में उनका मान सम्मान बढ़ाए। इसी आशा के साथ अभिभावक अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजते हैं, जहां बच्चों को संस्कारवान बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 9वीं से 12वीं कक्षा के दौरान छात्रों में शारीरिक बदलाव आते हैं, इस दौर में बच्चे दिमाग से कम और दिल से ज्यादा निर्णय लेते है जो कई बार उनके भविष्य के लिए सही साबित नहीं होते। विद्यार्थियों को हमेशा विनम्र होना चाहिए क्योंकि विन्रमता से ही विद्या आती है। उन्होंने कहा कि कुछ बच्चे दुनिया की चकाचौंध से भ्रमित होकर अपने जीवन के लक्ष्य से भटक जाते है, गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति इसी भटकाव से उन्हें रोकती है, गुरुकुल के संस्कार ब्रह्मचारी को गलत आदतें, गलत संगत से बचाकर एक सभ्य नागरिक बनने के लिए प्रेरित करते हैं।
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उन्होंने कहा कि आज दुनिया श्रीकृष्ण और श्रीराम को श्रद्धा से स्मरण करती है जबकि रावण, कंस, दुर्योधन आदि का नाम भी कोई सम्मान से नहीं लेता। इसलिए जीवन में उन्नति के लिए हमेशा बड़ो का सम्मान करो, पुस्तकों से प्रेम करो और समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में करो। मंच संचालन मुख्य संरक्षक संजीव आर्य ने किया। इस मौके पर गुरुकुल के निदेशक ब्रिगेडियर डॉ. प्रवीण कुमार, प्राचार्य सूबे प्रताप सहित सभी अध्यापक एवं संरक्षक मौजूद रहे।
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