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हमारे ग्रंथों ने पृथ्वी को दिया है मां का दर्जा
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दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आयोजित सत्संग में प्रवचन देते स्वामी गुरुज्ञानानंद। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
बाबैन। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से आध्यात्मिक प्रवचन एवं भजन संकीर्तन का आयोजन किया गया। इसमें संस्थान के संस्थापक गुरु आशुतोष के शिष्य स्वामी गुरु ज्ञानानंद ने पर्यावरण के प्रति जागरूक करते हुए बताया कि एक समय ऐसा था जब धरती स्वर्ग सी खुशहाल थी। चारों तरफ हरियाली थी और शांति के गीत गुंजायमान थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा।
उन्होंने कहा कि विश्व भर के पर्यावरण के विभागों के आंकड़े बता रहे हैं कि प्रकृति विध्वंस की रक्तमय कहानी रचने लगी है। भूकंप, चक्रवात, समुद्री तूफान, अकाल, बाढ़, महामारी, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग में से एक न एक खबर आज चर्चा में रहती है। इसका जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि इंसान है। प्रकृति हमारी मां है, जिसने हमें बहुत कुछ दिया है। हमारे ग्रंथों ने पृथ्वी को मां का दर्जा दिया है। हम पृथ्वी मां का सम्मान करना भूल गए हैं।
उन्होंने कहा कि समाज में सुधार तभी संभव हो सकता है जब इंसान की सोच को ब्रह्मज्ञान की शक्ति से बदल दिया जाए। ब्रह्मज्ञान या आत्म जाग्रति ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो इंसान को विवेक और उसके जीवन को सही दिशा प्रदान कर सकता है ताकि वह धरती और प्राकृतिक संपदाओं का विवेकपूर्वक उपयोग व आदर करें।
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बाबैन। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से आध्यात्मिक प्रवचन एवं भजन संकीर्तन का आयोजन किया गया। इसमें संस्थान के संस्थापक गुरु आशुतोष के शिष्य स्वामी गुरु ज्ञानानंद ने पर्यावरण के प्रति जागरूक करते हुए बताया कि एक समय ऐसा था जब धरती स्वर्ग सी खुशहाल थी। चारों तरफ हरियाली थी और शांति के गीत गुंजायमान थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा।
उन्होंने कहा कि विश्व भर के पर्यावरण के विभागों के आंकड़े बता रहे हैं कि प्रकृति विध्वंस की रक्तमय कहानी रचने लगी है। भूकंप, चक्रवात, समुद्री तूफान, अकाल, बाढ़, महामारी, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग में से एक न एक खबर आज चर्चा में रहती है। इसका जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि इंसान है। प्रकृति हमारी मां है, जिसने हमें बहुत कुछ दिया है। हमारे ग्रंथों ने पृथ्वी को मां का दर्जा दिया है। हम पृथ्वी मां का सम्मान करना भूल गए हैं।
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उन्होंने कहा कि समाज में सुधार तभी संभव हो सकता है जब इंसान की सोच को ब्रह्मज्ञान की शक्ति से बदल दिया जाए। ब्रह्मज्ञान या आत्म जाग्रति ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो इंसान को विवेक और उसके जीवन को सही दिशा प्रदान कर सकता है ताकि वह धरती और प्राकृतिक संपदाओं का विवेकपूर्वक उपयोग व आदर करें।
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