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चाइनीज मोमबत्तियों की चमक के आगे फीकी पड़ गई दीये की लो...
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फैंसी और चाइनीज मोमबत्तियों की चमक के आगे दीये की लो फीकी पड़ गई है। इसका मुख्य कारण बढ़ते सरसों के तेल का भाव भी हैं। भले ही मार्केट में 10 रुपये के 12 दीये मिल रहे हैं, लेकिन ग्राहक फैंसी और चाइनीज मोमबत्तियों, दीये और लड़ियों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन फिर भी बाजार में जगह-जगह जमीन पर मिट्टी के बर्तनों की स्टाल लगाए बैठे छोटे-छोटे दुकानदारों को ग्राहकों का इंतजार है। अपनी कला का प्रदर्शन करने में इन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। शहर के सीकरी चौक, न्यू बाजार, मोहन नगर और रेलवे रोड सहित कई जगह मिट्टी के बर्तनों के स्टॉल लगी हुई है। इनमें रंग-बिरंगे व फैंसी दीये, कुजिया, मसले, श्रामी, हांडी, डूणा, जकरा-जकरी, कलश व चाटी आदि मिट्टी के बर्तन सजे हैं, लेकिन लोग मिट्टी के बर्तनों को कम तवज्जो दे रहे हैं। यही कारण है कि हर साल मंदी की मार झेल रहे कुम्हार अब शहर में सिर्फ 8-10 ही मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। इन स्टॉल पर सजे कई तरह के रंग-बिरंगे दीये के दाम भी अलग-अलग हैं। सामान्य दीये 10 रुपये के 12 बेचे जा रहे हैं, जबकि रंग बिरंगे व फैंसी दीये का मूल्य 30 से 50 रुपये तक बेचा जा रहा है।
मिट्टी के दीये बनाना अब पहले से काफी महंगा व जटिल हो गया है। शहर में कुम्हारों के लिए कोई जगह नहीं बची, जहां वे बैठकर मिट्टी के बर्तन बना सकें। दीये बनाने योग्य एक मिट्टी की ट्राली करीब पांच हजार रुपये की मिल रही है। यह मिट्टी दीये बनाने वाले लोग देवीगढ़ (पंजाब) से मंगवाते हैं। सहारनपुर व दिल्ली जैसे क्षेत्रों से दीये मंगाने में जहां लोडिंग का खर्चा ज्यादा पड़ता है तो वहीं उनमें टूट-फूट हो जाने पर काफी नुकसान भी झेलना पड़ता है।
शुरुआत से ही अहोई अष्टमी की पूजा में मिट्टी की बनी अहोई का प्रयोग किया जाता रहा है, लेकिन अब इसका जगह बाजारों में आई स्टील की अहोई ने ले ली है।
करीब दस साल से अपनी दुकान के बाहर मिट्टी के दीये बेच रहे प्रमोद का कहना है हर दीवार पर उनके करीब 50 हजार दीये बिकते हैं। इस दिवाली उन्होंने 30 हजार रुपये का माल तैयार किया है। इस बार सामान्य दिवाली से करीब 20 प्रतिशत ग्राहक ही कम रहने की उम्मीद है।
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कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड कार्यालय में 2013 से रिटायर्ड असिस्टेंट 67 वर्षीय श्याम लाल का कहना है कि वह पिछले 60 साल से दिवाली के सीजन में मिट्टी के दीये बेच रहे हैं। सात साल की उम्र से ही वे शहर में दीये बेच रहे हैं। वाल्मीकि जयंती के दिन से शुरू होकर दिवाली तक वे दीयों सहित सभी मिट्टी के बर्तन बेचते हैं। बताया कि आज कल डाई से बने दीयों का चलन है, लेकिन वे हाथ से ही दीये बनाते हैं।
रामचंद्र कॉलोनी निवासी श्रीचंद ने बताया कि वह पिछले 35 साल से न्यू बाजार में मिट्टी के बर्तन बेचते हैं। केवल दिवाली के सीजन पर ही नहीं, बल्कि वह पूरे साल यहां दीयों का स्टॉल लगाते हैं। पहले वह खुद ही दीये बनाता था, लेकिन सड़क दुर्घटना में एक बाजू टूटने के कारण अब हाथ से दीये नहीं बनाए जा सकते। अब वह दिल्ली व सहारनपुर से मिट्टी के बर्तन मंगवा कर बेचता हैं।
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मिट्टी के दीये बनाना अब पहले से काफी महंगा व जटिल हो गया है। शहर में कुम्हारों के लिए कोई जगह नहीं बची, जहां वे बैठकर मिट्टी के बर्तन बना सकें। दीये बनाने योग्य एक मिट्टी की ट्राली करीब पांच हजार रुपये की मिल रही है। यह मिट्टी दीये बनाने वाले लोग देवीगढ़ (पंजाब) से मंगवाते हैं। सहारनपुर व दिल्ली जैसे क्षेत्रों से दीये मंगाने में जहां लोडिंग का खर्चा ज्यादा पड़ता है तो वहीं उनमें टूट-फूट हो जाने पर काफी नुकसान भी झेलना पड़ता है।
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शुरुआत से ही अहोई अष्टमी की पूजा में मिट्टी की बनी अहोई का प्रयोग किया जाता रहा है, लेकिन अब इसका जगह बाजारों में आई स्टील की अहोई ने ले ली है।
करीब दस साल से अपनी दुकान के बाहर मिट्टी के दीये बेच रहे प्रमोद का कहना है हर दीवार पर उनके करीब 50 हजार दीये बिकते हैं। इस दिवाली उन्होंने 30 हजार रुपये का माल तैयार किया है। इस बार सामान्य दिवाली से करीब 20 प्रतिशत ग्राहक ही कम रहने की उम्मीद है।
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कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड कार्यालय में 2013 से रिटायर्ड असिस्टेंट 67 वर्षीय श्याम लाल का कहना है कि वह पिछले 60 साल से दिवाली के सीजन में मिट्टी के दीये बेच रहे हैं। सात साल की उम्र से ही वे शहर में दीये बेच रहे हैं। वाल्मीकि जयंती के दिन से शुरू होकर दिवाली तक वे दीयों सहित सभी मिट्टी के बर्तन बेचते हैं। बताया कि आज कल डाई से बने दीयों का चलन है, लेकिन वे हाथ से ही दीये बनाते हैं।
रामचंद्र कॉलोनी निवासी श्रीचंद ने बताया कि वह पिछले 35 साल से न्यू बाजार में मिट्टी के बर्तन बेचते हैं। केवल दिवाली के सीजन पर ही नहीं, बल्कि वह पूरे साल यहां दीयों का स्टॉल लगाते हैं। पहले वह खुद ही दीये बनाता था, लेकिन सड़क दुर्घटना में एक बाजू टूटने के कारण अब हाथ से दीये नहीं बनाए जा सकते। अब वह दिल्ली व सहारनपुर से मिट्टी के बर्तन मंगवा कर बेचता हैं।