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Kurukshetra News: स्वामी श्रद्धानंद के जीवन, आदर्शों व समाज सुधार कार्यों पर हुई सार्थक चर्चा
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कुरुक्षेत्र। स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान दिवस पर आयोजित विचार गोष्ठी में चर्चा करते शिक्षक
कुरुक्षेत्र। दयानंद महिला महाविद्यालय कुरुक्षेत्र में आर्य युवती परिषद की ओर से अमर हुतात्मा महात्मा स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान दिवस के अवसर पर हवन-यज्ञ व चर्चा-परिचर्चा का आयोजन किया गया। हवन के बाद आयोजित चर्चा-परिचर्चा में कार्यवाहक प्राचार्या डॉ. उर्मिला पंघाल ने स्वामी श्रद्धानंद जी के जीवन की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि लाला मुंशी राम के नाम से प्रसिद्ध युवक के जीवन में महर्षि दयानंद सरस्वती के उपदेशों से क्रांतिकारी परिवर्तन आया जिसके बाद वे स्वामी श्रद्धानंद के रूप में समाज सुधारक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने शुद्धि आंदोलन के माध्यम से समाज को जागरूक किया, शिक्षा केंद्रों की स्थापना की और आर्य समाज के सिद्धांतों और उद्देश्यों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया। स्वामी श्रद्धानंद ने भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण, स्त्री-शिक्षा के उत्थान और जाति-पांति भेदभाव के विरोध में निडर होकर कार्य किया। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को समर्पित कर दी। वे सत्य, साहस और निस्वार्थ सेवा की सजीव प्रतिमूर्ति थे।
आर्य युवती परिषद की संयोजिका डॉ. सुमन राजन ने स्वामी श्रद्धानंद जी के सुपुत्र इंद्र विद्या वाचस्पति की ओर से लिखित पुस्तक मेरे पिता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक एक पुत्र की ओर से अपने पिता को दी गई सच्ची और भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। स्वामी जी का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि समाज सुधार और अच्छे कार्यों की शुरुआत के लिए न कोई आयु सीमा होती है और न ही समय की बाधा।
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उन्होंने बताया कि लाला मुंशी राम के नाम से प्रसिद्ध युवक के जीवन में महर्षि दयानंद सरस्वती के उपदेशों से क्रांतिकारी परिवर्तन आया जिसके बाद वे स्वामी श्रद्धानंद के रूप में समाज सुधारक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने शुद्धि आंदोलन के माध्यम से समाज को जागरूक किया, शिक्षा केंद्रों की स्थापना की और आर्य समाज के सिद्धांतों और उद्देश्यों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया। स्वामी श्रद्धानंद ने भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण, स्त्री-शिक्षा के उत्थान और जाति-पांति भेदभाव के विरोध में निडर होकर कार्य किया। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को समर्पित कर दी। वे सत्य, साहस और निस्वार्थ सेवा की सजीव प्रतिमूर्ति थे।
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आर्य युवती परिषद की संयोजिका डॉ. सुमन राजन ने स्वामी श्रद्धानंद जी के सुपुत्र इंद्र विद्या वाचस्पति की ओर से लिखित पुस्तक मेरे पिता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक एक पुत्र की ओर से अपने पिता को दी गई सच्ची और भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। स्वामी जी का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि समाज सुधार और अच्छे कार्यों की शुरुआत के लिए न कोई आयु सीमा होती है और न ही समय की बाधा।
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