{"_id":"62f812fe81d82c3ca23c7fae","slug":"largest-refugee-camp-was-set-up-in-dharmanagari-kurukshetra-kurukshetra-news-knl117834864","type":"story","status":"publish","title_hn":"धर्मनगरी में लगा था सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
धर्मनगरी में लगा था सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर
विज्ञापन
शरणार्थी कैंप में बीमारियों से पीड़ित लोग।
- फोटो : Kurukshetra
अजय जौली
कुरुक्षेत्र। भारत की आजादी के साथ विभाजन का दर्द आज भी देश के सीने में चुभता है। उस समय हरियाणा में 50 शरणार्थी शिविर लगे थे, जिसमें से सबसे बड़ा शिविर कुरुक्षेत्र में लगा था। यह शिविर शेरशाह सुरी मार्ग ( वर्तमान नाम एनएच-44) पर होने के चलते इसमें तीन लाख से ज्यादा लोगों ने शरण ली थी। यहां लगा राष्ट्रीय ध्वज लोगों को दूर से नजर आता था।
इस शिविर में तीन माह में तीन हजार से ज्यादा लोगों की जान गई थी। यहां दवा और स्वास्थ्य कर्मचारियों की काफी कमी हो गई थी। इस समस्या को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय से राजकुमारी अमृत कौर ने दिल्ली में नर्सिंग स्टाफ से अपील भी की थी। उन्होंने कहा था कि उनके पास महिला व पुरुषों चिकित्सकों की संख्या तो पर्याप्त है, लेकिन नर्सिंग स्टाफ की काफी कमी है। शिविर में तरह-तरह की बीमारियां फैलती चली गई।
दो नवंबर 1947 को एक प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार महात्मा गांधी ने भी शाम की सभा में कुरुक्षेत्र शिविर की दर्दनाक दशा पर प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था कि कुरुक्षेत्र शिविर में चिकित्सक, दवाओं, तंबुओं और गर्म कपड़ों की बहुत आवश्यकता है। बहुत प्रयास के बाद भी कैंप में फैली बीमारियों पर काबू नहीं पाया जा सका और मौत का आंकड़ा बढ़ता चला गया।
विज्ञापन
हरियाणा इतिहास और संस्कृति अकादमी से जुटाई जानकारी अनुसार कई बार काफिले एक दूसरे के बहुत पास से निकलते थे । बार-बार संघर्ष, अपहरण और हत्याएं हुई। विभाजन में ज्यादातर लोगों को बुनियादी सामान भी लेने का समय नहीं मिला था। कुछ ही भाग्यशाली थे जो कुछ चीजें अपने साथ ले जा सके थे। कुरुक्षेत्र का एक भाग उस समय परिवहन शिविर के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था, जहां से शरणार्थियों को भारतीय राज्यों और पुनर्वास के लिए प्रांतों में भेजा जाता था। संवाद
कस्बा नंबर चार में लगा था 24 घंटे का कर्फ्यू
आठ मार्च 1948 को कैंप में कुछ शरणार्थियों द्वारा खाद्य सामग्री की दुकानें अनुचित स्थानों पर शुरू कर दी गईं। इन दुकानों को यहां से हटाने से इंकार करने पर वहां तैनात सुपरवाइजर ने उनके सामान पर ठोकर मारी और गाली दी। इस घटना से सुपरवाईजरों और शरणार्थियों के बीच विवाद हो गया और भीड़ इकट्ठा हो गई। शहर से सेना कमांडर ने अशांति को देखते हुए सेना को बुलाया। सेना ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कुछ हवाई फायर किए। घटना से कुछ दूरी पर ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी ने अपनी सुरक्षा में गोली चलाई, जिससे दो आदमी घायल हो गए। यह समस्या अन्य शिविरों में फैलने से रोकने के लिए 24 घंटे का कर्फ्यू शिविर के कस्बा नंबर चार में लगाया गया।
हरियाणा के 40 कैंपों में 438797 लोगों ने ली थी शरण
विभाजन के समय हरियाणा में 40 जगह शरणार्थी कैंप लगाए गए थे, जिनमें सबसे ज्यादा कैंप गुड़गांव (वर्तमान नाम गुरुग्राम) और सबसे बड़ा कैंप कुरुक्षेत्र में लगा था। इन 40 कैंपों में 438797 लोगों ने निवास किया था। ये वो शरणार्थी थे जो कैंपों में पंजीकृत थे। बहुत सारे लोग पंजीकृत ही नहीं थे, जो दिल्ली कैंप में अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। करनाल व कुरुक्षेत्र के चार कैंपों में सबसे ज्यादा 325000 शरणार्थियों ने निवास किया था। नेहरू इस कैंप को विजिट करने भी आए थे।
कुरुक्षेत्र कैंप में 3221 लोगों की गई थी जान
कुरुक्षेत्र में सबसे बड़ा कैंप लगा था तो यहां मृत्यु दर भी सबसे ज्यादा थी। सिविलियन एंड मिलिट्री गजट के अनुसार पांच नवंबर 1947 से 24 जनवरी 1948 तक 3221 लोगों की विभिन्न कारणों से मृत्यु हुई थी। इनमें हैजा से 98, दस्त से 547, चेचक से 288 व दूसरी बीमारियों से 2288 लोगों की मृत्यु हुई थी।
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। भारत की आजादी के साथ विभाजन का दर्द आज भी देश के सीने में चुभता है। उस समय हरियाणा में 50 शरणार्थी शिविर लगे थे, जिसमें से सबसे बड़ा शिविर कुरुक्षेत्र में लगा था। यह शिविर शेरशाह सुरी मार्ग ( वर्तमान नाम एनएच-44) पर होने के चलते इसमें तीन लाख से ज्यादा लोगों ने शरण ली थी। यहां लगा राष्ट्रीय ध्वज लोगों को दूर से नजर आता था।
इस शिविर में तीन माह में तीन हजार से ज्यादा लोगों की जान गई थी। यहां दवा और स्वास्थ्य कर्मचारियों की काफी कमी हो गई थी। इस समस्या को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय से राजकुमारी अमृत कौर ने दिल्ली में नर्सिंग स्टाफ से अपील भी की थी। उन्होंने कहा था कि उनके पास महिला व पुरुषों चिकित्सकों की संख्या तो पर्याप्त है, लेकिन नर्सिंग स्टाफ की काफी कमी है। शिविर में तरह-तरह की बीमारियां फैलती चली गई।
विज्ञापन
दो नवंबर 1947 को एक प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार महात्मा गांधी ने भी शाम की सभा में कुरुक्षेत्र शिविर की दर्दनाक दशा पर प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था कि कुरुक्षेत्र शिविर में चिकित्सक, दवाओं, तंबुओं और गर्म कपड़ों की बहुत आवश्यकता है। बहुत प्रयास के बाद भी कैंप में फैली बीमारियों पर काबू नहीं पाया जा सका और मौत का आंकड़ा बढ़ता चला गया।
विज्ञापन
हरियाणा इतिहास और संस्कृति अकादमी से जुटाई जानकारी अनुसार कई बार काफिले एक दूसरे के बहुत पास से निकलते थे । बार-बार संघर्ष, अपहरण और हत्याएं हुई। विभाजन में ज्यादातर लोगों को बुनियादी सामान भी लेने का समय नहीं मिला था। कुछ ही भाग्यशाली थे जो कुछ चीजें अपने साथ ले जा सके थे। कुरुक्षेत्र का एक भाग उस समय परिवहन शिविर के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था, जहां से शरणार्थियों को भारतीय राज्यों और पुनर्वास के लिए प्रांतों में भेजा जाता था। संवाद
कस्बा नंबर चार में लगा था 24 घंटे का कर्फ्यू
आठ मार्च 1948 को कैंप में कुछ शरणार्थियों द्वारा खाद्य सामग्री की दुकानें अनुचित स्थानों पर शुरू कर दी गईं। इन दुकानों को यहां से हटाने से इंकार करने पर वहां तैनात सुपरवाइजर ने उनके सामान पर ठोकर मारी और गाली दी। इस घटना से सुपरवाईजरों और शरणार्थियों के बीच विवाद हो गया और भीड़ इकट्ठा हो गई। शहर से सेना कमांडर ने अशांति को देखते हुए सेना को बुलाया। सेना ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कुछ हवाई फायर किए। घटना से कुछ दूरी पर ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी ने अपनी सुरक्षा में गोली चलाई, जिससे दो आदमी घायल हो गए। यह समस्या अन्य शिविरों में फैलने से रोकने के लिए 24 घंटे का कर्फ्यू शिविर के कस्बा नंबर चार में लगाया गया।
हरियाणा के 40 कैंपों में 438797 लोगों ने ली थी शरण
विभाजन के समय हरियाणा में 40 जगह शरणार्थी कैंप लगाए गए थे, जिनमें सबसे ज्यादा कैंप गुड़गांव (वर्तमान नाम गुरुग्राम) और सबसे बड़ा कैंप कुरुक्षेत्र में लगा था। इन 40 कैंपों में 438797 लोगों ने निवास किया था। ये वो शरणार्थी थे जो कैंपों में पंजीकृत थे। बहुत सारे लोग पंजीकृत ही नहीं थे, जो दिल्ली कैंप में अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। करनाल व कुरुक्षेत्र के चार कैंपों में सबसे ज्यादा 325000 शरणार्थियों ने निवास किया था। नेहरू इस कैंप को विजिट करने भी आए थे।
कुरुक्षेत्र कैंप में 3221 लोगों की गई थी जान
कुरुक्षेत्र में सबसे बड़ा कैंप लगा था तो यहां मृत्यु दर भी सबसे ज्यादा थी। सिविलियन एंड मिलिट्री गजट के अनुसार पांच नवंबर 1947 से 24 जनवरी 1948 तक 3221 लोगों की विभिन्न कारणों से मृत्यु हुई थी। इनमें हैजा से 98, दस्त से 547, चेचक से 288 व दूसरी बीमारियों से 2288 लोगों की मृत्यु हुई थी।

कुरुक्षेत्र में लगे शरणार्थी कैंप का ध्वज।- फोटो : Kurukshetra

विभाजन के दौरान कुरुक्षेत्र में लगे शरणार्थी कैंप का दृश्य।- फोटो : Kurukshetra