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Kurukshetra News: विद्यापीठ में गुरुकुल परंपरा अनुसार 50 विद्यार्थियों का जनेऊ संस्कार एवं उपनयन
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कुरुक्षेत्र। जयराम विद्यापीठ में जनेऊ संस्कार एवं उपनयन संस्कार के दौरान ब्रह्मचारी, विद्यार्थी
कुरुक्षेत्र। ब्रह्मसरोवर के तट पर स्थित श्री जयराम विद्यापीठ में गुरुकुल परंपरा के अनुसार उपनयन संस्कार कार्यक्रम आयोजित हुआ। श्री जयराम शिक्षण संस्थान के चेयरमैन ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी की प्रेरणा से यह संस्कार संपन्न हुआ। विद्यापीठ के संस्कृत महाविद्यालय के ब्रह्मचारियों और विद्यार्थियों का जनेऊ संस्कार मुख्य यज्ञशाला में विधिवत मंत्रोच्चारण के साथ हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में अभिभावक, ट्रस्टी और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी के मार्गदर्शन में श्री जयराम संस्कृत विद्यापीठ लगभग 50 वर्षों से संस्कृत भाषा की सेवा कर रहा है। गुरुवार को नवमी और दशमी तिथि के अंतर्गत सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अभिजित् मुहूर्त में यह संस्कार हुआ। नूतन प्रविष्ट छात्रों का उपनयन संस्कार वैदिक विधिविधान से कराया गया। विद्यापीठ के प्राचार्य रणवीर भारद्वाज के सान्निध्य में वेदपाठी आचार्य अनिल देव वत्स ने यह संस्कार संपन्न कराया।
प्राचार्य रणवीर भारद्वाज ने बताया कि यह दिन संतों, महापुरुषों और ऋषि मुनियों को समर्पित है। उन्होंने वेदों का विस्तार किया और 18 पुराणों की रचना कर समाज का मार्गदर्शन किया। शास्त्रों में यह संस्कार वेदारंभ के लिए आवश्यक माना गया है। इस संस्कार के बाद ब्राह्मण की द्विज संज्ञा हो जाती है और वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त होता है। सावित्री मंत्र के बाद वेदाध्ययन भी आरंभ हो चुका है। इस अवसर पर रोहित कौशिक और सतबीर कौशिक सहित अध्यापक मौजूद रहे।
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ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी के मार्गदर्शन में श्री जयराम संस्कृत विद्यापीठ लगभग 50 वर्षों से संस्कृत भाषा की सेवा कर रहा है। गुरुवार को नवमी और दशमी तिथि के अंतर्गत सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अभिजित् मुहूर्त में यह संस्कार हुआ। नूतन प्रविष्ट छात्रों का उपनयन संस्कार वैदिक विधिविधान से कराया गया। विद्यापीठ के प्राचार्य रणवीर भारद्वाज के सान्निध्य में वेदपाठी आचार्य अनिल देव वत्स ने यह संस्कार संपन्न कराया।
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प्राचार्य रणवीर भारद्वाज ने बताया कि यह दिन संतों, महापुरुषों और ऋषि मुनियों को समर्पित है। उन्होंने वेदों का विस्तार किया और 18 पुराणों की रचना कर समाज का मार्गदर्शन किया। शास्त्रों में यह संस्कार वेदारंभ के लिए आवश्यक माना गया है। इस संस्कार के बाद ब्राह्मण की द्विज संज्ञा हो जाती है और वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त होता है। सावित्री मंत्र के बाद वेदाध्ययन भी आरंभ हो चुका है। इस अवसर पर रोहित कौशिक और सतबीर कौशिक सहित अध्यापक मौजूद रहे।
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