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मैं नहीं कहीं भी सुरक्षित, न घर में, न बाहर
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काव्य गोष्ठी में हिस्सा लेने वाले कवियों के साथ मौजूद आयोजक। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। कैलाश नगर स्थित डॉ. ओम प्रकाश ग्रेवाल संस्थानने रविवार को काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। कवियों ने अपनी रचनाओं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और जमकर वाहवाही लूटी।
अंबाला से पधारी अंजली ने औरतों की स्थिति पर कई सशक्त शेर पढ़े। कवयित्री हेमलता पवार ने महिलाओं का दर्द बया किया। शेर पढ़ते हुए कहा कि मैं नहीं कहीं भी सुरक्षित, न घर में, न बाहर, न भीड़ में,न एकांत में, मैं नहीं कहीं भी सुरक्षित। डॉ. पुरुषोत्तम ने आदर्शवादी आशा के स्वर में कहा रोज मैं शमा जलाता जा रहा हूं खून से, एक दिन उनके दरीचे तक उजाला जाएगा। जनवादी चेतना के शायर मनजीत भोला ने कई गजलें सुनाई। चीका से पधारे कर्म चंद केसर ने हरियाणवी रंग जमाया। उन्होंने पढ़ादीवा मनैं चसा राख्या सै, बाल तै कती बचा राख्या सै, केसर हमनैं अपणे दिल पै, तेरा नाम लिख्या राख्या सै। खान मनजीत भावड़िया (सोनीपत) ने मजदूर की मजबूरी को हरियाणवी में बयान किया याणी उमर मै सीरी लाग्ये, जबर भरोटा ठाया, दिया दस का नोट हाथ म्ह,सौ पै गुंठा लाया।
कैथल से पधारे ओजस्वी कवि राजेश भारती का मजदूर होते किसान की व्यथा के बारे में कथन था धीरे -धीरे, हालत हो गई है बंधुआ मजदूरों जैसी, धीरे-धीरे चांद-सी दूर लगने लगी है रोटी। ईश्वर पांचाल ने दर्द में कहा कि जब से शहर में आया हूं, गांव तलाशता हूं, मकान तो बहुत मिलते हैं शहर में, मैं एक घर तलाशता हूं। विनोद कुमार ने व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए कहा किया अदालत की खिड़कियों से झांकता कानून, करता है पुकार लगाता है आवाज, सलाखों को तोड़ कर निकालो मुझे बाहर। हरियाणा के लोकप्रिय शायर आबिद आलमी की गजलें सुनाकर उनके पुत्र अशोक चसवाल ने उनकी स्मृतियों को ताजा कर दिया। इस मौके पर देवेंद्र बीबीपुरिया, हरपाल, कपिल भारद्वाज, डॉ. प्रदीप, गौरव, अंबर, रफीक, मनजीत भोला व हरपाल भी उपस्थित रहे।
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कुरुक्षेत्र। कैलाश नगर स्थित डॉ. ओम प्रकाश ग्रेवाल संस्थानने रविवार को काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। कवियों ने अपनी रचनाओं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और जमकर वाहवाही लूटी।
अंबाला से पधारी अंजली ने औरतों की स्थिति पर कई सशक्त शेर पढ़े। कवयित्री हेमलता पवार ने महिलाओं का दर्द बया किया। शेर पढ़ते हुए कहा कि मैं नहीं कहीं भी सुरक्षित, न घर में, न बाहर, न भीड़ में,न एकांत में, मैं नहीं कहीं भी सुरक्षित। डॉ. पुरुषोत्तम ने आदर्शवादी आशा के स्वर में कहा रोज मैं शमा जलाता जा रहा हूं खून से, एक दिन उनके दरीचे तक उजाला जाएगा। जनवादी चेतना के शायर मनजीत भोला ने कई गजलें सुनाई। चीका से पधारे कर्म चंद केसर ने हरियाणवी रंग जमाया। उन्होंने पढ़ादीवा मनैं चसा राख्या सै, बाल तै कती बचा राख्या सै, केसर हमनैं अपणे दिल पै, तेरा नाम लिख्या राख्या सै। खान मनजीत भावड़िया (सोनीपत) ने मजदूर की मजबूरी को हरियाणवी में बयान किया याणी उमर मै सीरी लाग्ये, जबर भरोटा ठाया, दिया दस का नोट हाथ म्ह,सौ पै गुंठा लाया।
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कैथल से पधारे ओजस्वी कवि राजेश भारती का मजदूर होते किसान की व्यथा के बारे में कथन था धीरे -धीरे, हालत हो गई है बंधुआ मजदूरों जैसी, धीरे-धीरे चांद-सी दूर लगने लगी है रोटी। ईश्वर पांचाल ने दर्द में कहा कि जब से शहर में आया हूं, गांव तलाशता हूं, मकान तो बहुत मिलते हैं शहर में, मैं एक घर तलाशता हूं। विनोद कुमार ने व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए कहा किया अदालत की खिड़कियों से झांकता कानून, करता है पुकार लगाता है आवाज, सलाखों को तोड़ कर निकालो मुझे बाहर। हरियाणा के लोकप्रिय शायर आबिद आलमी की गजलें सुनाकर उनके पुत्र अशोक चसवाल ने उनकी स्मृतियों को ताजा कर दिया। इस मौके पर देवेंद्र बीबीपुरिया, हरपाल, कपिल भारद्वाज, डॉ. प्रदीप, गौरव, अंबर, रफीक, मनजीत भोला व हरपाल भी उपस्थित रहे।
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