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फाइटर हूं, आखिरी सांस तक लड़ता रहूंगा : मनोज कुमार

Thu, 05 May 2016 12:15 AM IST
अमर उजाला/ब्यूरो/कुरुक्षेत्र
अमर उजाला/ब्यूरो/कुरुक्षेत्र Updated Thu, 05 May 2016 12:15 AM IST
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i am fighter, will fight till last movement : manoj kumar
मनोज कुमार - फोटो : amar ujala
जिस देश में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कद्र नहीं होती, वहां या तो खिलाड़ी खेल छोड़ देता है या फिर उस देश के लिए खेलना छोड़ देता है। ताजा उदाहरण विजेंद्र सिंह के रूप में सभी के सामने है। वे अब देश के लिए नहीं खेलते, बल्कि प्रोफेशनल बॉक्सिंग में उतर गए हैं। ये बातें ओलंपियन, अर्जुन अवार्डी एवं कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट इंटरनेशनल बॉक्सर मनोज कुमार ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में कही। वे अजरबैजान देश के बाकू शहर में अगले माह 14 जून से रियो ऑलंपिक की अंतिम क्वालिफायर तैयारियों के लिए  आयरलैंड के डबलिन में जाने से पहले कुरुक्षेत्र के सेक्टर-7 स्थित अपने आवास पर बातचीत कर रहे थे। 
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अर्जुन अवार्डी मनोज कुमार ने कहा कि देश प्रदेश में खेलों को लेकर सिस्टम ठीक नहीं है, जिसका असर सीधे तौर पर खिलाड़ियों पर पड़ रहा है। भारत में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कमी नहीं है। कमी है तो केवल  देश-प्रदेश के खेल सिस्टम में। खिलाड़ियों को उचित मान-सम्मान न मिलने और सिस्टम में कमी के चलते प्रतिभाएं अकसर दम तोड़ देती हैं। ऐसा इसीलिए कहा जा रहा है क्योंकि वे खुद भी इस सिस्टम का शिकार हैं। मनोज ने  कहा कि उनके साथ ऐसा इसीलिए हो रहा है क्योंकि उनका कोई राजनैतिक संरक्षक नहीं है। लेकिन, वे फाईटर हैं और आखिरी सांस तक लड़ते रहेंगे। देश के लिए भी और देश के सिस्टम से भी। मनोज ने कहा कि रियो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतना ही उनका एकमात्र लक्ष्य है। 
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जानकारी होने पर चुटकियों में होते हैं पद 
इसे देश और खेल और खिलाड़ी का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यहां सिस्टम में लिंक होने पर उच्च पद चुटकियों में मिल जाते हैं और यदि सिस्टम में कोई जानकारी नहीं है तो फिर कितनी भी मेहनत की जाए, उसे तवज्जो नहीं दी जाती। मनोज ने कहा कि अपने पिता पूर्व सैनिक शेर सिंह, माता कमला देवी और भाई राजेश, जोकि कोच भी हैं, इनके मार्गदर्शन और मेहनत के दम पर वे इस मुकाम तक पहुंचे हैं कि आज उनका और देश का नाम रोशन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्होंने प्रदेश सरकार से प्रार्थना करते हुए कहा कि उनके साथ भेदभाव न किया जाए और उपलब्धियों को देखते हुए पूर्ण न्याय हो। 
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41 मेडल जीतने पर भी नहीं बनाया डीएसपी  
बड़े अफसोस की बात है कि राज्य स्तरीय, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अब तक 41 मेडल जीतने के बाद भी उन्हें हरियाणा सरकार ने डीएसपी का पद नहीं दिया। जबकि कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जोकि कम  प्रतिभाशाली होने के बावजूद भी डीएसपी (बी कैटेगरी) पद पर हैं और उन्हें  रेलवे में चीफ टिकेट इंस्पेक्टर (सीटीआई-सी कैटेगरी) पद दिया गया है। उन्होंने कहा कि सिस्टम ठीक नहीं है। इसका उदाहरण पहले भी उनके सामने आ चुका है, जब कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान बॉक्सिंग में गोल्ड मेडल जीतने पर 32 अंक आने के  बावजूद 20 अंक वाले को अर्जुन अवार्ड देेने की घोषणा कर दी गई। इसके बाद उन्होंने सिलेक्शन कमेटी के सामने अपना पक्ष रखा, पर सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद कोर्ट के माध्यम से उन्हें अर्जुन अवार्ड लेना पड़ा। हालांकि इसके बाद  सिलेक्शन कमेटी में अपनी गलती मान ली थी। 

अकेडमी के लिए सरकार ने नहीं दी जगह 
मनोज कुमार ने बताया कि उनसे वादा किया गया था कि सरकार उन्हें अकेडमी के लिए जगह देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मनोज ने कहा कि वे चाहते हैं कि युवा प्रतिभाओं को अपना हुनर दिखाने का मौका मिले। इसीलिए सरकार द्वारा जगह मुहैया न होता देख उन्होंने अपनी जिंदगीभर की मेहनत से कुरुक्षेत्र में मकान खरीदा और  2013 में यहीं अकेडमी की शुरुआत की। आज इस अकेडमी में 20 युवा खिलाड़ी बॉक्सिंग की ट्रेनिंग ले रहे हैं। इनमें से पांच उन्हीं के पास रहते हैं। इनपर प्रतिमाह लगभग 20 हजार रुपये खर्च आता है, जोकि वे खुद कर रहे हैं। सरकार से किसी प्रकार की मदद नहीं मिलती। 

मूल गांव राजौंद में नहीं एक भी स्टेडियम 
अचंभे की बात है कि अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर अर्जुन अवार्डी मनोज कुमार के जिला कैथल के मूल गांव राजौंद में अभी तक एक भी खेल स्टेडियम नहीं है। यहां ये बात भी मायने रखती है कि गांव में खेल सुविधाएं न होने पर मनोज ने खुद को  पीछे हटने नहीं दिया और मेहनत जारी रखी।


अच्छे काम के लिए नकल ठीक है....
मनोज कुमार ने बताया कि वे अपने भाई राजेश को बॉक्सिंग करते देखते तो वैसी ही नकल करने का प्रयास करते थे। भाई ने देखा तो उन्होंने उसे भी बॉक्सिंग में उतार दिया। कक्षा 7वीं में उसने पहली फाइट जीती। इसके बाद कारवां चलता गया और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मनोज ने चुटीले अंदाज में युवाओं से कहा कि अच्छे काम के लिए नकल करना ठीक है। युवा हिम्मत करें, आगे बढ़ें, कामयाबी जरूर मिलेगी।
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