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भारत की प्राचीनतम पवित्र सरस्वती नदी के इतिहास को पाठ्यक्रम किया जाएगा शामिल

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 26 Aug 2021 01:35 AM IST
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History of Saraswati river will be included in the course
भारत की प्राचीनतम पवित्र सरस्वती नदी के इतिहास को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। यह पाठ्यक्रम छठी कक्षा से बारहवीं कक्षा तक तैयार किया जाएगा। इस पाठ्यक्रम को तैयार करने के लिए सरस्वती सिलेबस कमेटी का भी गठन किया गया है। इस सिलेबस कमेटी के अध्यक्ष कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से डॉ. प्रीतम सिंह को बनाया गया है। इस कमेटी में कुल 11 सदस्यों को शामिल किया गया है। अहम पहलू यह है कि इस कमेटी को 15 सितंबर 2021 तक अपनी रिपोर्ट सौंपने की जिम्मेदारी भी दी गई है। इस बारे हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमच ने बताया कि बोर्ड के चेयरमैन एवं मुख्यमंत्री मनोहर लाल तथा और हरियाणा के शिक्षा मंत्री कंवरपाल के आदेशानुसार ही हरियाणा की धरा से बहने वाली 5 हजार वर्ष से भी ज्यादा पुरानी पवित्र सरस्वती नदी के बारे में युवा पीढ़ी को बताने तथा ज्ञान और संस्कार देने के उद्देश्य से सरस्वती नदी के इतिहास को पाठ्यक्रम में शामिल करने की योजना तैयार की है। यह पाठ्यक्रम छठी से बारहवीं कक्षा तक पढ़ाया जाने का प्रपोजल है। उन्होंने कहा कि इस कमेटी में जिओलॉजी विभाग की रिसर्च ऑफिसर डॉ. दीपा मेहता को सदस्य सचिव नियुक्त किया गया है। इसके साथ-साथ इस कमेटी में विद्या भारती शिक्षण संस्थान के निदेशक डॉ. रामेंद्र सिंह, सीईआरएसआर कुरुक्षेत्र के निदेशक प्रोफेसर डॉ. एआर चौधरी, पंजाब विश्वविद्यालय से इतिहास विभाग के प्रो. प्रियातोष, जिओग्राफी विभाग कुरुक्षेत्र के प्रो. केतकी राणा, पंजाब विश्वविद्यालय के प्रो. आशीष तिवान, एससीईआरटी गुरुग्राम के रिप्रिजेंटिव, स्कूल लैक्चरर डॉ. रेविका हुड्डा, जीएमएसएसएसएस इस्माईलाबाद के प्रोफेसर डॉ. दिनेश यादव, जीएचएस जलबेहड़ा की जिओग्राफी पीजीटी प्रतिका, एचएसएचडीबी के जिओलॉजी की रिसर्च अधिकारी डॉ. दीपा को शामिल किया गया है। उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमच ने कहा कि भारत की सबसे प्राचीनतम नदी सरस्वती का एक अलग ही ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है। इस नदी के तटों के किनारे ही भारतीय संस्कृति पली, बढ़ी और विकसित हुई है। इस नदी के किनारे अनेकों ऋषि मुनियों ने तप किया। देश को ज्ञान का प्रकाश देने वाली इस नदी को अब पाठ्यक्रम में शामिल करके भारत की इस प्राचीन संस्कृति को फिर से जीवित किया जाएगा। जब देश के बच्चे अपनी विरासत और धरोहर के बारे में जानेंगे तो निश्चित ही आने वाली पीढ़ी को शिक्षित और संस्कारवान बनाया जा सकेगा।
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