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विद्यार्थी को सफलता के शिखर पर पहुंचाती है कठिन साधना
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समारोह के मुख्यातिथि गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत का स्वागत करते विद्यार्थी। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। विद्यार्थी को आलस्य, प्रमोद त्याग कर एक तपस्यापूर्ण जीवन जीना चाहिए, क्योंकि विद्या काल में की गई कठिन साधना और तपस्या ही छात्रों को सफलता के शिखर पर पहुंचाती है। यह सीख सोमवार को गुरुकुल कुरुक्षेत्र में 12वीं के छात्रों के दीक्षा व्रत समारोह को संबोधित करते हुए गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने दी।
उन्होंने कहा कि 12वीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को अधिक परिश्रम करने की जरूरत होती है। स्वच्छ वातावरण और सही मार्गदर्शन के अभाव में कई प्रतिभाशाली छात्र अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। गुरुकुल में मिले संस्कार, यहां की दिनचर्या ऐसे ही भटकाव से छात्रों को बचाकर उन्हें कामयाब बनाते हैं।
आचार्य देवव्रत ने कहा कि कठोपनिषद में मनुष्य के जीवन के दो मार्ग बताए गए हैं। एक है प्रेय मार्ग और दूसरा है श्रेय मार्ग। प्रेय मार्ग वह है जो दूसरों द्वारा बनाया गया है, जो आसान है और जिस पर आप आसानी से जा तो सकते हैं, मगर अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। दूसरा है श्रेय मार्ग, श्रेय मार्ग वह है जो कठिन तो है मगर आप थोड़ा परिश्रम, थोड़े पुरुषार्थ के साथ इस मार्ग पर चलते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि भीड़ के साथ चलने वालों की कोई पहचान नहीं होती, बल्कि भीड़ से अलग अपना रास्ता बनाने वाले और दूसरों को भी उस रास्ते पर चलाने वाले लोग ही दुनिया में महान कहे जाते हैं।
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उन्होंने कहा उम्र के जिस पड़ाव से आप गुजर रहे हों, उस वक्त आपके शरीर में तेजी से हार्मोन्स चेंज होते हैं। इस उम्र में जो बच्चे दिल से सोचते हैं वो अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं, इसके विपरीत जो बच्चे दिमाग से सोचते है और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करते हैं वे निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करते हैं।
उन्होंने कहा कि गुरुकुल में छात्रों को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं, संस्कारों की अमूल्य निधि भी प्रदान की जाती है जो दूसरे शिक्षण संस्थानों में देखने को भी नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि गुरुकुल में मिले संस्कारों को, यहां की दिनचर्या को और गुरुजनों द्वारा दिए गए ज्ञान रूपी प्रकाश को अपने जीवन का अंग बनाएं, निश्चित ही आप सफलता को प्राप्त करेंगे।
दीक्षांत का अर्थ शिक्षा का अंत नहीं है बल्कि और अधिक उत्साह के साथ उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा है। इस अवसर पर गुरुकुल के निदेशक व प्राचार्य कर्नल अरुण दत्ता ने कहा कि आचार्य देवव्रत की 35 सालों की कठिन तपस्या और त्याग से आज गुरुकुल कुरुक्षेत्र हरियाणा का नंबर वन आवासीय विद्यालय हैं। इस अवसर पर गुरुकुल के प्रधान कुलवंत सिंह सैनी, सह प्राचार्य शमशेर सिंह, मुख्य संरक्षक संजीव आर्य व दिनेश राणा सहित अन्य उपस्थित रहे।
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कुरुक्षेत्र। विद्यार्थी को आलस्य, प्रमोद त्याग कर एक तपस्यापूर्ण जीवन जीना चाहिए, क्योंकि विद्या काल में की गई कठिन साधना और तपस्या ही छात्रों को सफलता के शिखर पर पहुंचाती है। यह सीख सोमवार को गुरुकुल कुरुक्षेत्र में 12वीं के छात्रों के दीक्षा व्रत समारोह को संबोधित करते हुए गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने दी।
उन्होंने कहा कि 12वीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को अधिक परिश्रम करने की जरूरत होती है। स्वच्छ वातावरण और सही मार्गदर्शन के अभाव में कई प्रतिभाशाली छात्र अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। गुरुकुल में मिले संस्कार, यहां की दिनचर्या ऐसे ही भटकाव से छात्रों को बचाकर उन्हें कामयाब बनाते हैं।
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आचार्य देवव्रत ने कहा कि कठोपनिषद में मनुष्य के जीवन के दो मार्ग बताए गए हैं। एक है प्रेय मार्ग और दूसरा है श्रेय मार्ग। प्रेय मार्ग वह है जो दूसरों द्वारा बनाया गया है, जो आसान है और जिस पर आप आसानी से जा तो सकते हैं, मगर अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। दूसरा है श्रेय मार्ग, श्रेय मार्ग वह है जो कठिन तो है मगर आप थोड़ा परिश्रम, थोड़े पुरुषार्थ के साथ इस मार्ग पर चलते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि भीड़ के साथ चलने वालों की कोई पहचान नहीं होती, बल्कि भीड़ से अलग अपना रास्ता बनाने वाले और दूसरों को भी उस रास्ते पर चलाने वाले लोग ही दुनिया में महान कहे जाते हैं।
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उन्होंने कहा उम्र के जिस पड़ाव से आप गुजर रहे हों, उस वक्त आपके शरीर में तेजी से हार्मोन्स चेंज होते हैं। इस उम्र में जो बच्चे दिल से सोचते हैं वो अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं, इसके विपरीत जो बच्चे दिमाग से सोचते है और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करते हैं वे निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करते हैं।
उन्होंने कहा कि गुरुकुल में छात्रों को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं, संस्कारों की अमूल्य निधि भी प्रदान की जाती है जो दूसरे शिक्षण संस्थानों में देखने को भी नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि गुरुकुल में मिले संस्कारों को, यहां की दिनचर्या को और गुरुजनों द्वारा दिए गए ज्ञान रूपी प्रकाश को अपने जीवन का अंग बनाएं, निश्चित ही आप सफलता को प्राप्त करेंगे।
दीक्षांत का अर्थ शिक्षा का अंत नहीं है बल्कि और अधिक उत्साह के साथ उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा है। इस अवसर पर गुरुकुल के निदेशक व प्राचार्य कर्नल अरुण दत्ता ने कहा कि आचार्य देवव्रत की 35 सालों की कठिन तपस्या और त्याग से आज गुरुकुल कुरुक्षेत्र हरियाणा का नंबर वन आवासीय विद्यालय हैं। इस अवसर पर गुरुकुल के प्रधान कुलवंत सिंह सैनी, सह प्राचार्य शमशेर सिंह, मुख्य संरक्षक संजीव आर्य व दिनेश राणा सहित अन्य उपस्थित रहे।