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Kurukshetra News: रिश्वत लेकर युवक को छोड़ने वाले हवलदार को तीन साल की सजा
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कुरुक्षेत्र। वर्दी की शक्ति को निजी लाभ के लिए डराने-धमकाने के साधन में नहीं बदला जा सकता। यह टिप्पणी अनिल कुमार की जिला अतिरिक्त सत्र अदालत ने भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में आरोपी हवलदार सुरेंद्र कुमार को दोषी करार देते हुए की।
अदालत में थर्ड गेट पुलिस चौकी में युवक को छोड़ने की एवज में छह हजार रुपये रिश्वत लेने के दोषी हवलदार सुरेंद्र कुमार के मुकदमें की सुनवाई चल रही थी। इस दौरान यह टिप्पणी करते हुए अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत तीन साल की सजा के साथ 25 हजार रुपये जुर्माना लगाया है। जुर्माना अदा न करने पर तीन माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना करना होगा।
अदालत ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(2) के तहत भी सुरेंद्र कुमार को दो साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना नहीं भरने पर एक माह का अतिरिक्त साधारण कारावास होगा। वहीं धारा 126(2) के तहत एक माह के साधारण कारावास और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई है।
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तीनों मामलों में मूल कारावास की सजाएं एक साथ चलेंगी। अदालत के फैसले के अनुसार सुरेंद्र कुमार थर्ड गेट पुलिस चौकी में हवलदार के पद पर तैनात था। अभियोजन ने साबित किया कि उसने आर्यन को छोड़ने के लिए उसके भाई मलकीत सिंह से 15 हजार रुपये की मांग की और अंत में छह हजार रुपये स्वीकार किए। अदालत ने मलकीत सिंह की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए कहा कि मांग और रकम स्वीकार किए जाने की बात आर्यन की हिरासत, आरोपी की मौजूदगी, तत्काल शिकायत और बाद में आर्यन की रिहाई जैसी परिस्थितियों से भी पुष्ट होती है।
अदालत ने यह भी माना कि सुरेंद्र कुमार ने पुलिस पद की शक्ति का दुरुपयोग करते हुए आर्यन को बिना वैध आधार हिरासत में रखा और परिवार को आपराधिक मामले में फंसाने तथा मारपीट की धमकी देकर रकम देने के लिए मजबूर किया। सजा सुनाते समय अदालत ने आरोपी की पारिवारिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा लेकिन पुलिस पद के दुरुपयोग और रिश्वत लेने के तरीके को गंभीर माना। अदालत ने कहा कि इस मामले में भ्रष्ट लेन-देन छह हजार रुपये तक साबित हुआ है, फिर भी पुलिस अधिकार के जानबूझकर दुरुपयोग और दबाव बनाकर रकम लेने के कारण प्रभावी दंड आवश्यक है।
वहीं दोषी ठहराए गए हवलदार पर मामले की जांच के दौरान कुल 26 हजार रुपये बरामद किए गए थे लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन केवल छह हजार रुपये के लेन-देन को ही संदेह से परे साबित कर सका। रोबिन को छोड़ने के लिए कथित तौर पर धर्मबीर से लिए गए 20 हजार रुपये का भुगतान अदालत में साबित नहीं हो सका। अदालत ने यह भी माना कि 26 हजार रुपये ऐसे खुले और आम पहुंच वाले स्थान से बरामद हुए थे, इसलिए पूरी राशि को रिश्वत की साबित रकम नहीं माना जा सकता।
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अदालत में थर्ड गेट पुलिस चौकी में युवक को छोड़ने की एवज में छह हजार रुपये रिश्वत लेने के दोषी हवलदार सुरेंद्र कुमार के मुकदमें की सुनवाई चल रही थी। इस दौरान यह टिप्पणी करते हुए अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत तीन साल की सजा के साथ 25 हजार रुपये जुर्माना लगाया है। जुर्माना अदा न करने पर तीन माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना करना होगा।
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अदालत ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(2) के तहत भी सुरेंद्र कुमार को दो साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना नहीं भरने पर एक माह का अतिरिक्त साधारण कारावास होगा। वहीं धारा 126(2) के तहत एक माह के साधारण कारावास और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई है।
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तीनों मामलों में मूल कारावास की सजाएं एक साथ चलेंगी। अदालत के फैसले के अनुसार सुरेंद्र कुमार थर्ड गेट पुलिस चौकी में हवलदार के पद पर तैनात था। अभियोजन ने साबित किया कि उसने आर्यन को छोड़ने के लिए उसके भाई मलकीत सिंह से 15 हजार रुपये की मांग की और अंत में छह हजार रुपये स्वीकार किए। अदालत ने मलकीत सिंह की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए कहा कि मांग और रकम स्वीकार किए जाने की बात आर्यन की हिरासत, आरोपी की मौजूदगी, तत्काल शिकायत और बाद में आर्यन की रिहाई जैसी परिस्थितियों से भी पुष्ट होती है।
अदालत ने यह भी माना कि सुरेंद्र कुमार ने पुलिस पद की शक्ति का दुरुपयोग करते हुए आर्यन को बिना वैध आधार हिरासत में रखा और परिवार को आपराधिक मामले में फंसाने तथा मारपीट की धमकी देकर रकम देने के लिए मजबूर किया। सजा सुनाते समय अदालत ने आरोपी की पारिवारिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा लेकिन पुलिस पद के दुरुपयोग और रिश्वत लेने के तरीके को गंभीर माना। अदालत ने कहा कि इस मामले में भ्रष्ट लेन-देन छह हजार रुपये तक साबित हुआ है, फिर भी पुलिस अधिकार के जानबूझकर दुरुपयोग और दबाव बनाकर रकम लेने के कारण प्रभावी दंड आवश्यक है।
वहीं दोषी ठहराए गए हवलदार पर मामले की जांच के दौरान कुल 26 हजार रुपये बरामद किए गए थे लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन केवल छह हजार रुपये के लेन-देन को ही संदेह से परे साबित कर सका। रोबिन को छोड़ने के लिए कथित तौर पर धर्मबीर से लिए गए 20 हजार रुपये का भुगतान अदालत में साबित नहीं हो सका। अदालत ने यह भी माना कि 26 हजार रुपये ऐसे खुले और आम पहुंच वाले स्थान से बरामद हुए थे, इसलिए पूरी राशि को रिश्वत की साबित रकम नहीं माना जा सकता।