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कोरोना संक्रमित शवों से जब अपने भी बना लेते थे दूरी, तब नप कर्मी करते थे अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी
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कोरोना काल ने जनजीवन पूरी तरह प्रभावित करके रख दिया है। इस दौरान संक्रमण से मरने वालों को अपनों के हाथों से मुखाग्नि भी नसीब नहीं हुई। ऐसे में नगर परिषद के कर्मचारियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना पीपीटी किट पहनकर ऐसे मृतकों के शवों को अंतिम संस्कार कराने के साथ-साथ अन्य रस्मों को भी निभाया।
पिपली शिव धाम, रतगल शिव धाम व गोविंदगढ़ शिव धाम सहित अन्य शिव धामों में नोडल अधिकारी संजय कुमार के नेतृत्व में कोरोना संक्रमित शवों का संस्कार करने वाले कर्मचारी दरोगा विकास, कुलदीप, सलिंद्र, ईशम सिंह व कमलेश को विधायक सुभाष सुधा व नप की निवर्तमान अध्यक्षा उमा सुधा ने शनिवार को 2-2 लाख रुपये की राशि के चेक देकर सम्मानित किया। विधायक ने कहा कि इन सभी कर्मचारियों ने सही मायने में समाज की सबसे बड़ी सेवा की है। वहीं उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले शहर में एक मकान की छत गिरने पर करीब 2 लाख और बारना गांव में गायों की मृत्यु होने पर 2 लाख रुपये की राशि अनुदान के रूप में दी है।
नगर परिषद कर्मी कुलदीप ने बताया कि वायरस से संक्रमित शव से कई बार अपने भी दूरी बना लेते थे। ऐसे में उन शवों की अंतिम क्रिया व मुखाग्नि वह दे देते थे, और तो और कई शवों की अस्थियां भी परिजनों को एकत्रित कर दी। कुलदीप ने बताया कि उसके घर में बूढ़ी मां, उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं। वह जब शाम को कोरोना संक्रमित शवों का संस्कार घर जाता था तो अपने परिवार से भी अच्छे से नहीं मिल पाता था।
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कमलेश कुमार ने बताया कि अभी एक शव की चिता जल ही रही होती थी कि एंबुलेंस का सायरन कान में सुनाई पड़ जाता था, तभी दूसरी चिता तैयार करने में जुट जाते थे। उसके 71 वर्षीय पिता और 65 वर्षी माता को हमेशा मेरी चिंता लगी रहती थी कि उनका बेटा रोजाना संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार कराता है, कहीं वह खुद इसके संपर्क में न आ जाए, लेकिन मुझे मेरे माता-पिता के लिए भय बना रहता है कि कहीं मेरे साथ वायरस घर न आ जाए।
सलिंद्र कुमार ने बताया कि कई बार लगातार एक के बाद के एंबुलेंस शवों को लेकर आती रहती थी। ऐसे में उनकी चिता तैयार करने और अंतिम संस्कार में लगे रहते और खाना खाने का भी समय नहीं मिल पाता था। पत्नी बड़े प्यार से लंच बॉक्स तैयार करके देती थी, लेकिन कई बार वह शाम को खाने समेत वापिस घर ले जाना पड़ता था।
ईशम सिंह ने कहा कि शिव धाम से जब भी जब भी घर जाता था तो दो साल का पोता वाशु भाग कर गले लगने आता था, लेकिन वह चाहकर भी उसे गले नहीं लगा पाते थे। अपनी ड्यूटी निभाने के साथ-साथ अपने परिवार को भी सुरक्षित रखना था।
दरोगा विकास ने बताया कि वह श्मशान में आए शवों की रजिस्टर में एंट्री करते थे। शव को लेकर आए परिजन उन्हें दस्तावेज देते थे तो डर रहता है कि कहीं किसी प्रकार से वायरस उस तक न पहुंच जाए। हालांकि वह थोड़े-थोड़े समय बाद ही हाथों को अच्छे से सेनेटाइज करते रहते थे। अपनों को खोने का दर्द नहीं देखा जाता था।
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पिपली शिव धाम, रतगल शिव धाम व गोविंदगढ़ शिव धाम सहित अन्य शिव धामों में नोडल अधिकारी संजय कुमार के नेतृत्व में कोरोना संक्रमित शवों का संस्कार करने वाले कर्मचारी दरोगा विकास, कुलदीप, सलिंद्र, ईशम सिंह व कमलेश को विधायक सुभाष सुधा व नप की निवर्तमान अध्यक्षा उमा सुधा ने शनिवार को 2-2 लाख रुपये की राशि के चेक देकर सम्मानित किया। विधायक ने कहा कि इन सभी कर्मचारियों ने सही मायने में समाज की सबसे बड़ी सेवा की है। वहीं उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले शहर में एक मकान की छत गिरने पर करीब 2 लाख और बारना गांव में गायों की मृत्यु होने पर 2 लाख रुपये की राशि अनुदान के रूप में दी है।
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नगर परिषद कर्मी कुलदीप ने बताया कि वायरस से संक्रमित शव से कई बार अपने भी दूरी बना लेते थे। ऐसे में उन शवों की अंतिम क्रिया व मुखाग्नि वह दे देते थे, और तो और कई शवों की अस्थियां भी परिजनों को एकत्रित कर दी। कुलदीप ने बताया कि उसके घर में बूढ़ी मां, उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं। वह जब शाम को कोरोना संक्रमित शवों का संस्कार घर जाता था तो अपने परिवार से भी अच्छे से नहीं मिल पाता था।
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कमलेश कुमार ने बताया कि अभी एक शव की चिता जल ही रही होती थी कि एंबुलेंस का सायरन कान में सुनाई पड़ जाता था, तभी दूसरी चिता तैयार करने में जुट जाते थे। उसके 71 वर्षीय पिता और 65 वर्षी माता को हमेशा मेरी चिंता लगी रहती थी कि उनका बेटा रोजाना संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार कराता है, कहीं वह खुद इसके संपर्क में न आ जाए, लेकिन मुझे मेरे माता-पिता के लिए भय बना रहता है कि कहीं मेरे साथ वायरस घर न आ जाए।
सलिंद्र कुमार ने बताया कि कई बार लगातार एक के बाद के एंबुलेंस शवों को लेकर आती रहती थी। ऐसे में उनकी चिता तैयार करने और अंतिम संस्कार में लगे रहते और खाना खाने का भी समय नहीं मिल पाता था। पत्नी बड़े प्यार से लंच बॉक्स तैयार करके देती थी, लेकिन कई बार वह शाम को खाने समेत वापिस घर ले जाना पड़ता था।
ईशम सिंह ने कहा कि शिव धाम से जब भी जब भी घर जाता था तो दो साल का पोता वाशु भाग कर गले लगने आता था, लेकिन वह चाहकर भी उसे गले नहीं लगा पाते थे। अपनी ड्यूटी निभाने के साथ-साथ अपने परिवार को भी सुरक्षित रखना था।
दरोगा विकास ने बताया कि वह श्मशान में आए शवों की रजिस्टर में एंट्री करते थे। शव को लेकर आए परिजन उन्हें दस्तावेज देते थे तो डर रहता है कि कहीं किसी प्रकार से वायरस उस तक न पहुंच जाए। हालांकि वह थोड़े-थोड़े समय बाद ही हाथों को अच्छे से सेनेटाइज करते रहते थे। अपनों को खोने का दर्द नहीं देखा जाता था।