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भारतीय इतिहास व संस्कृति के संरक्षण में पुरातत्व की अहम भूमिका : प्रो. वीरेंद्र पाल
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कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व (एआईएच) विभाग की ओर से पत्थर के औजार, मिट्टी के बर्तन और पुरावशेष विषय पर छह दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। उद्घाटन अवसर पर विवि के कुलसचिव डॉ. वीरेंद्र पाल ने मुख्यातिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के संरक्षण में पुरातत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि पुरातत्व केवल अतीत के भौतिक साक्ष्यों की खोज तक सीमित नहीं है बल्कि उनके संरक्षण और वैज्ञानिक व्याख्या के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का कार्य भी करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास और संस्कृति से जुड़ी प्रचलित ऐतिहासिक गलतफहमियों को पुरातत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर दूर करने की आवश्यकता है।
सत्र की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष व कार्यशाला संयोजक डॉ. भगत सिंह ने की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए व्यावहारिक ज्ञान और अकादमिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। सह-संयोजक डॉ. राजपाल ने ऐसी शैक्षणिक और प्रयोगात्मक कार्यशालाओं को नियमित रूप से आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
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कार्यशाला के पहले शैक्षणिक व्याख्यान में डॉ. बनानी भट्टाचार्य, पूर्व उप निदेशक, पुरातत्व व संग्रहालय विभाग, हरियाणा ने पुरातत्व के विकास और उसकी प्रमुख शाखाओं पर विस्तृत चर्चा की। इसके साथ ही राहुल की ओर से मिट्टी के बर्तन निर्माण पर एक व्यावहारिक सत्र भी आयोजित किया गया। इसमें प्रतिभागियों को सिरेमिक तकनीक का प्रत्यक्ष अनुभव कराया गया।
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उन्होंने कहा कि पुरातत्व केवल अतीत के भौतिक साक्ष्यों की खोज तक सीमित नहीं है बल्कि उनके संरक्षण और वैज्ञानिक व्याख्या के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का कार्य भी करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास और संस्कृति से जुड़ी प्रचलित ऐतिहासिक गलतफहमियों को पुरातत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर दूर करने की आवश्यकता है।
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सत्र की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष व कार्यशाला संयोजक डॉ. भगत सिंह ने की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए व्यावहारिक ज्ञान और अकादमिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। सह-संयोजक डॉ. राजपाल ने ऐसी शैक्षणिक और प्रयोगात्मक कार्यशालाओं को नियमित रूप से आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
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कार्यशाला के पहले शैक्षणिक व्याख्यान में डॉ. बनानी भट्टाचार्य, पूर्व उप निदेशक, पुरातत्व व संग्रहालय विभाग, हरियाणा ने पुरातत्व के विकास और उसकी प्रमुख शाखाओं पर विस्तृत चर्चा की। इसके साथ ही राहुल की ओर से मिट्टी के बर्तन निर्माण पर एक व्यावहारिक सत्र भी आयोजित किया गया। इसमें प्रतिभागियों को सिरेमिक तकनीक का प्रत्यक्ष अनुभव कराया गया।