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प्राकृतिक खेती से बंजर भूमि भी बनी उपजाऊ: आचार्य देवव्रत
Updated Sun, 17 Dec 2017 12:18 AM IST
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प्राकृतिक खेती से बंजर भूमि भी बनी उपजाऊ: आचार्य देवव्रत
कुरुक्षेत्र।
प्राकृतिक खेती से गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फार्म की 50 एकड़ बंजर भूमि भी उपजाऊ बन गई है और वर्तमान में इस भूमि पर फसल लहलहा रही है। यह करिश्मा ‘जीरो बजट प्राकृतिक कृषि’ मॉडल से हुआ है। उक्त विचार गुरुकुल के ऑडिटोरियम में महर्षि दयानंद कृषि विश्वविद्यालय रोहतक से पहुंचे कृषि विशेषज्ञों एवं छात्रों को संबोधित करते हुए हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि रासायनिक खाद, कीटनाशक और पेस्टीसाइड के प्रयोग से आज किसान खेतों में जहर की खेती कर रहे हैं। अनाज व सब्जियों के माध्यम से यही जहर हमारे शरीर में जाता है, जिससे आज कैंसर, हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियां लगातार फैल रही है। यदि हमें अपने परिवार व समाज को स्वस्थ रखना है तो हमें प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा। आचार्य ने जैविक कृषि और प्राकृतिक कृषि के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि प्राकृतिक कृषि, जैविक कृषि से बिल्कुल अलग है। जैविक कृषि तो विदेशी कंपनियों का एक बड़ा षड़यंत्र है, जिसमें किसानों को खेती संबंधी सभी चीजें और दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती है जबकि ‘जीरो बजट प्राकृतिक कृषि’ में किसान को बाजार से कुछ भी खरीदना नहीं पड़ता। केवल एक देशी गाय से 30 एकड़ भूमि पर उत्तम और जहर युक्त खेती की जा सकती है।
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कुरुक्षेत्र।
प्राकृतिक खेती से गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फार्म की 50 एकड़ बंजर भूमि भी उपजाऊ बन गई है और वर्तमान में इस भूमि पर फसल लहलहा रही है। यह करिश्मा ‘जीरो बजट प्राकृतिक कृषि’ मॉडल से हुआ है। उक्त विचार गुरुकुल के ऑडिटोरियम में महर्षि दयानंद कृषि विश्वविद्यालय रोहतक से पहुंचे कृषि विशेषज्ञों एवं छात्रों को संबोधित करते हुए हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि रासायनिक खाद, कीटनाशक और पेस्टीसाइड के प्रयोग से आज किसान खेतों में जहर की खेती कर रहे हैं। अनाज व सब्जियों के माध्यम से यही जहर हमारे शरीर में जाता है, जिससे आज कैंसर, हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियां लगातार फैल रही है। यदि हमें अपने परिवार व समाज को स्वस्थ रखना है तो हमें प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा। आचार्य ने जैविक कृषि और प्राकृतिक कृषि के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि प्राकृतिक कृषि, जैविक कृषि से बिल्कुल अलग है। जैविक कृषि तो विदेशी कंपनियों का एक बड़ा षड़यंत्र है, जिसमें किसानों को खेती संबंधी सभी चीजें और दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती है जबकि ‘जीरो बजट प्राकृतिक कृषि’ में किसान को बाजार से कुछ भी खरीदना नहीं पड़ता। केवल एक देशी गाय से 30 एकड़ भूमि पर उत्तम और जहर युक्त खेती की जा सकती है।