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एक साल से सफेद हाथी बनी है ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन

Fri, 08 Jun 2018 12:49 AM IST
Updated Fri, 08 Jun 2018 12:49 AM IST
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एक साल से सफेद हाथी बनी है ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन
10 माह पहले पहले आई बीसीएस मशीन, न लाइसेंस बना न लगाने की जगह तय हुई
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अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र। ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर (बीसीएस) मशीन का अब तक न लाइसेंस लिया गया है और न अभी तक पूरा उपकरण जिला अस्पताल पहुंच पाया है।डें गू, एड्स और थैलेसीमिया जैसे अन्य कई श्रेणी के मरीजों के लिए बेहद उपयोगी यह मशीन डिब्बा बंद हालत में है। पिछले 10 माह से सफेद हाथी बनी ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन की सुविधा जिला अस्पताल में शुरू हो, इसका इंतजार लंबे समय से पीड़ितों को है। क्योंकि जब तक कुरुक्षेत्र जिला में यह सुविधा बहाल नहीं होगी, तब तक उन्हें पीजीआई चंडीगढ़, रोहतक और दूसरे जिलों में जाने के लिए विवश होना पड़ेगा।
बता दें कि जिला अस्पताल में इस मशीन को इंस्टॉल करने के लिए पूरे सेटअप पर करीब 40 से 50 लाख रुपये खर्च होगा। इसमें से करीब 20 लाख रुपये की मशीन हरियाणा स्वास्थ्य विभाग सितंबर 2017 में जिला अस्पताल को उपलब्ध करा चुका है, लेकिन आगे की कार्रवाई ठंडे बस्ते में है। बहरहाल आगे दौड़, पीछे छोड़ की यह नीति अन्य योजनाओं के साथ हरियाणा स्वास्थ्य सेवाओं पर भी भारी पड़ रही है। हालांकि राज्य सरकार का दावा बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने का है। जानकारी के लिए इस मशीन की सेवाओं में आने के बाद जिला में रक्त की खपत में चार गुना तक कमी आने की उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन के प्रयोग में आने के बाद प्रतिदिन खपत होने वाली 30 से 40 ब्लड यूनिट की खपत, महज 10 यूनिट तक रह जाएगी।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इस मशीन के बिना जो एक यूनिट ब्लड एक व्यक्ति के काम आता है, वहीं कंपोनेंट सेपरेटर मशीन के बाद यह चार लोगों के लिए उपयोगी होता है। सरकारी अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार जिला अस्पताल में हर साल करीब आठ हजार यूनिट रक्त की खपत है।
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ऐसे काम करती है मशीन
विशेषज्ञों के अनुसार ब्लड सेपरेटर (बीसीएस) मशीन का उपयोग खून में शामिल तत्वों को अलग-अलग करने के लिए होता है।विशेषकर थैलेसीमिया, जले हुए रोगी को प्लाजमा, डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स सहित एफएफपी तथा एड्स पीड़ितों को डब्ल्यूबीसी की आवश्यकता होती है। इस मशीन के जरिए लाल रक्त कणिकाओं (आरबीसी), श्वेत रक्त कणिकाओं (डब्ल्यूबीसी), प्लेटलेट्स, प्लाजमा, फ्रेश फ्रोजन प्लाजमा (एफएफपी) को अलग करती है।
डेंगू से बचने के लिए इंतजाम नहीं
जिला अस्पताल में बीसीएस मशीन होकर भी नहीं है। यही वजह है कि डेंगू के लक्षण पाए जाने पर डॉक्टर मरीज को सीधे यहां से रेफर कर देते हैं। बरसात के सीजन में नमी आने से आसपास के वातावरण में मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है। घरों-दुकानों और दफ्तरों के अलावा अन्य जगहों पर जल भरवा आदि से डेंगू के मच्छर पनपने की ज्यादा संभावना होती है। अमूमन लोगों की ऐसी लापरवाही जहां डेंगू को बढ़ावा देती है, वहीं लचर स्वास्थ्य सेवाएं लोगों के लिए और भी ज्यादा जान का जोखिम पैदा करती हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा बीसीएस का बंदोबस्त न होने के चलते ही, मरीजों को पीजीआई में रेफर करने और दूसरे बड़े अस्पतालों का रुख करने के लिए विवश होना पड़ता है।
पिछले वर्ष डेंगू मरीजों का आंकड़ा था 326 के पार
वर्ष 2017 के सरकारी आंकड़ों पर नजर डाली जाय तो यहां डेंगू मरीजों का आंकड़ा 326 के पार रहा था।
प्लेटलेट्स कम होने से जान को रहता है खतरा : डॉ. सहोता
डिप्टी सीविल सर्जन डॉ. सुदेश सहोता के अनुसार डेंगू के प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि डेंगू एडीज नामक मच्छर के काटने से होता है। इसमें रोगी की प्लेटलेट्स तेजी से घटती है। डॉ. सहाय के अनुसार स्वस्थ मनुष्य के खून में कम से कम डेढ़ लाख प्लेटलेट्स होते हैं। यदि यह प्लेटलेट्स 20 हजार से नीचे पहुंच जाते हैं तो इस स्थिति में शरीर से रक्तस्राव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
लाइसेंस के लिए अभी तक नहीं मिली एफडीए की मंजूरी
बड़ी बात यह है कि अगर मशीन स्थापित भी कर दी गई तो भी उसका लाभ एकदम से मरीजों को मिलना शुरू नहीं हो पाएगा। जिला अस्पताल के अधिकारियों के अनुसार इस मामले में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग (एफडीए) से अनुमति लेनी पड़ती है। एफडीए बाकायदा लाइसेंस जारी करता है। मशीन आने के बाद निरीक्षण भी होता है।

जगह की कमी से नहीं इंस्टॉल हो सकी मशीन : सीएमओ
जिला के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. सुखबीर का कहना है कि उन्होंने हाल ही में कुरुक्षेत्र जिले का जिम्मा संभाला है। उन्होंने बताया कि यह लाइसेंस और मशीन को इंस्टॉल कराने और रोगियों के लिए सेवा में लाने के लिए वह हरसंभव प्रयास करेंगे, ताकि जल्द इस मशीन का लाभ मरीजों को मिल सके। उन्होंने बताया कि अस्पताल में जगह की कमी के चलते मशीन इंस्टॉल नहीं की जा सकी है।
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