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पंजाब का विभाजन आधुनिक मानव इतिहास की बड़ी त्रासदी: प्रो. अमरजीत
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कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमरजीत सिंह ने कहाकि ब्रिटिश साम्राज्यवादी एवं कैंब्रिज इतिहासकारों ने अपनी लेखनी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा तत्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया और अपनी लेखनी में ब्रिटिश शासन को पंजाब के विभाजन की जिम्मेवारी से मुक्त किया। वर्ष 1937 के प्रांतीय विधान सभा के चुनावों के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के बीच सरकारों के गठन को लेकर हुए विवाद को पंजाब में मुस्लिम सांप्रदायिक राजनैतिक का विस्तार होने एवं पंजाब के विभाजन का प्रथम कारण बताया हैं।
पटियाला स्थित पंजाबी यूनिवर्सिटी में पंजाब हिस्ट्री कान्फ्रेंस के 51वें सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने ये विचार व्यक्त किए। प्रो. सिंह ने मुस्लिम सांप्रदायिक राजनीति एवं पंजाब का विभाजन तथा कैंब्रिज इतिहास लेखन विषय पर विचार रखे। उन्होंने बताया कि अगस्त 1947 का भारत का विभाजन प्रमुख रूप से पंजाब का विभाजन था। पंजाब विभाजन की महत्वपूर्ण घटना ने आधुनिक इतिहास एवं तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को संपूर्ण दक्षिण एशिया में प्रभावित किया है। इस घटना ने आरंभ से ही इतिहासकारों एवं विद्वानों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया तथा पिछले 70 वर्षों में विभिन्न विचारधाराओं के इतिहासकारों एवं विद्वानों ने इस विषय पर विस्तार से शोध किया। प्रो. सिंह ने बताया कि पंजाब के विभाजन पर सबसे पहले ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने लिखना आरंभ किया तथा बाद में यह ब्रिटिश साम्राज्यवादी विचारक इतिहास लेखन की दृष्टि से कैंब्रिज इतिहासकारों के नाम से जाने गए।
ब्रिटिश राज के द्वारा किये गए संवैधानिक सुधारों का लाभ उठाते हुए पंजाब के मुस्लिम वर्ग ने अपनी राजनैतिक स्थिति को धीरे-धीरे मजबूत करते हुऐ बाद में प्रथम मुस्लिम राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर दिया। इन इतिहासकारों के अनुसार पंजाब के उच्च स्तरीय जमींदार वर्ग एवं उच्च धार्मिक वर्गों ने अपने स्वार्थ की राजनीति के लिए साधारण मुस्लिम वर्ग को धर्म के नाम पर गुमराह किया और उन्हे अलग मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना के लिए उकसाया जोकि बाद में पंजाब के विभाजन का प्रमुख कारण बना। पंजाब का मुस्लिम, राजनैतिक वर्ग और यहां तक कि इनके प्रमुख नेता मोहम्मद अली जिन्ना केवल मुस्लिम हितों की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन बाद में परिस्थितियां इनके नियंत्रण से बाहर हो गई और न चाहते हुए इन्हें पंजाब का विभाजन स्वीकार करना पड़ा। इन ब्रिटिश इतिहासकारों के अनुसार अपने दूरगामी राजनैतिक एवं आर्थिक हितों के कारण से पंजाब के ब्रिटिश शासन ने मुस्लिम लीग का समर्थन किया तथा मुस्लिम लीग ने समर्थन के आधार पर पाकिस्तान की स्थापना करने में सफलता प्राप्त की।
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पटियाला स्थित पंजाबी यूनिवर्सिटी में पंजाब हिस्ट्री कान्फ्रेंस के 51वें सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने ये विचार व्यक्त किए। प्रो. सिंह ने मुस्लिम सांप्रदायिक राजनीति एवं पंजाब का विभाजन तथा कैंब्रिज इतिहास लेखन विषय पर विचार रखे। उन्होंने बताया कि अगस्त 1947 का भारत का विभाजन प्रमुख रूप से पंजाब का विभाजन था। पंजाब विभाजन की महत्वपूर्ण घटना ने आधुनिक इतिहास एवं तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को संपूर्ण दक्षिण एशिया में प्रभावित किया है। इस घटना ने आरंभ से ही इतिहासकारों एवं विद्वानों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया तथा पिछले 70 वर्षों में विभिन्न विचारधाराओं के इतिहासकारों एवं विद्वानों ने इस विषय पर विस्तार से शोध किया। प्रो. सिंह ने बताया कि पंजाब के विभाजन पर सबसे पहले ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने लिखना आरंभ किया तथा बाद में यह ब्रिटिश साम्राज्यवादी विचारक इतिहास लेखन की दृष्टि से कैंब्रिज इतिहासकारों के नाम से जाने गए।
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ब्रिटिश राज के द्वारा किये गए संवैधानिक सुधारों का लाभ उठाते हुए पंजाब के मुस्लिम वर्ग ने अपनी राजनैतिक स्थिति को धीरे-धीरे मजबूत करते हुऐ बाद में प्रथम मुस्लिम राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर दिया। इन इतिहासकारों के अनुसार पंजाब के उच्च स्तरीय जमींदार वर्ग एवं उच्च धार्मिक वर्गों ने अपने स्वार्थ की राजनीति के लिए साधारण मुस्लिम वर्ग को धर्म के नाम पर गुमराह किया और उन्हे अलग मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना के लिए उकसाया जोकि बाद में पंजाब के विभाजन का प्रमुख कारण बना। पंजाब का मुस्लिम, राजनैतिक वर्ग और यहां तक कि इनके प्रमुख नेता मोहम्मद अली जिन्ना केवल मुस्लिम हितों की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन बाद में परिस्थितियां इनके नियंत्रण से बाहर हो गई और न चाहते हुए इन्हें पंजाब का विभाजन स्वीकार करना पड़ा। इन ब्रिटिश इतिहासकारों के अनुसार अपने दूरगामी राजनैतिक एवं आर्थिक हितों के कारण से पंजाब के ब्रिटिश शासन ने मुस्लिम लीग का समर्थन किया तथा मुस्लिम लीग ने समर्थन के आधार पर पाकिस्तान की स्थापना करने में सफलता प्राप्त की।
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