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न पूर्व में 303 गांव निर्मल हो सके और न हीं अब 83 गांव बन पाए स्वच्छ
ब्यूरो/अमर उजाला, कुरूक्षेत्र
Updated Wed, 31 Aug 2016 11:41 PM IST
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पहले राष्ट्रीय ग्रामीण स्वच्छता मिशन के तहत जिला के 303 गांवों को निर्मल बनाए जाने और अब स्वच्छता अभियान के तहत 83 गांवों को स्वच्छ बना दिए जाने वाले अधिकारियों के दावे धरातल पर धराशायी हो रहे है। भले ही अधिकारियों द्वारा इन गांवों की सूची को लेकर डिडौरा भी पीटा गया, लेकिन अब तक के ये दोनों ही अभियान कागजों तक सिमटे दिखाई पड़ रहे है। जिन पर खुद जिला उपायुक्त ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि इसके पीछे लोगों की मानसिकता में बदलाव न आने को बड़ी वजह ठहराई जा रही है लेकिन डीसी के मुताबिक अब नए सिरे से इन गांवों को भी निर्मल ही नहीं बल्कि स्वच्छ भी बनाए जाने के लिए जद्दोजहद शुरू की जाएगी। पूर्व की सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वच्छता मिशन के तहत निर्मल भारत अभियान चलाया था, जिसके लिए भारी भरकम बजट भी खर्च किया गया।
इस मिशन केे तहत जिला प्रशासन की ओर से भी उस समय बड़े-बड़े दावे किए गए तो अधिकारियों ने ऐसे 303 गांवों की सूची भी तैयार की गई, जहां यह अभियान सफल बताते हुए उन्हें निर्मल होने का भी खिताब दे दिया गया। ठीक इसी तर्ज पर ही पिछले लगभग छह माह से अधिक समय से स्वच्छता अभियान चलाया हुआ है और अधिकारियों की मानें तो ऐसे 83 गांवों की सूची भी तैयार की गई है, जहां यह अभियान पूरी तरह से सफल करार दिया गया। लेकिन इन गांवों की हकीकत व अधिकारियों के दावों की पोल अपने पहले ही दौरे में खुद जिला उपायुक्त ने खोल दी हैं।
इन गांवों के हालात देख वह न केवल हैरान रह गई हैं बल्कि उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार भी किया है कि न तो सही रुप से ये गांव निर्मल हो पाए है और न ही स्वच्छता अभियान उक्त गांवों में सफलता तक पहुंच पाया है। इन गांवों के हालात इस कदर बने हुए है कि यहां पर भी अन्य गांवों की तर्ज पर ही नये सिरे से स्वच्छ बनाए जाने की कवायद शुरू करनी होगी। अधिकारियों द्वारा तैयार की गई सूची को उन्होंने दरकिनार कर दिया है, जिसके साथ ही उस दौरान किए गए कार्यों पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
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सूची में शामिल किए सभी गांवों में कार्य करने की जरूरत : डीसी
डीसी सुमेधा कटारिया ने अपनी पहली मीट टू प्रैस में भी खुले रुप से स्वीकार किया कि इन गांवों में चलाए गए अभियान कहीं सफल हुए नहीं दिख रहे है। यहां पर भी सूची से बाहर रहे गांवों की तरह ही कार्य करने की जरूरत है और इसके लिए अधिकारियों को निर्देश भी जारी कर दिए गए है। अब खुले में शौचमुक्त बनाए जाने के अभियान के तहत 201 अधिकारियों को एक-एक गांव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस बार लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की जाएगी। उनके अनुसार 2 अप्रैल 2008 में कुरुक्षेत्र के गांवों को निर्मल बनाने का अभियान शुरु किया था, इस अभियान के तहत 303 गांवों को निर्मल गांव बनाया गया था। जबकि 89 गांव ही अब खुले से शौचमुक्त बताए जा रहे हैं। लेकिन हकीकत इससे भी परे हैं।
पूर्व एडीसी भी खोल चुके है पोल
जिला के पूर्व एडीसी एवं लगभग एक माह पहले तक स्वच्छता अभियान के नोडल अधिकारी रहे राजेश जोगपाल भी स्वच्छता अभियान व अधिकारियों की कार्यशैली की पोल खोल चुके है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अधिकारियों की लापरवाही के चलते ही अभियान सफल सफल होना तो दूर आगे भी नहीं बढ़ पा रहा है। उन्होंने अधिकारियों को इसी के चलते ही लताड़ भी लगाई थी। जिसके बाद इस अभियान में कुछ गंभीरता की उम्मीद जगी थी, लेकिन अब डीसी व एडीसी बदले जाने के बाद यह अभियान फिर से नये सिरे से शुरू किया जा रहा है।
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इस मिशन केे तहत जिला प्रशासन की ओर से भी उस समय बड़े-बड़े दावे किए गए तो अधिकारियों ने ऐसे 303 गांवों की सूची भी तैयार की गई, जहां यह अभियान सफल बताते हुए उन्हें निर्मल होने का भी खिताब दे दिया गया। ठीक इसी तर्ज पर ही पिछले लगभग छह माह से अधिक समय से स्वच्छता अभियान चलाया हुआ है और अधिकारियों की मानें तो ऐसे 83 गांवों की सूची भी तैयार की गई है, जहां यह अभियान पूरी तरह से सफल करार दिया गया। लेकिन इन गांवों की हकीकत व अधिकारियों के दावों की पोल अपने पहले ही दौरे में खुद जिला उपायुक्त ने खोल दी हैं।
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इन गांवों के हालात देख वह न केवल हैरान रह गई हैं बल्कि उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार भी किया है कि न तो सही रुप से ये गांव निर्मल हो पाए है और न ही स्वच्छता अभियान उक्त गांवों में सफलता तक पहुंच पाया है। इन गांवों के हालात इस कदर बने हुए है कि यहां पर भी अन्य गांवों की तर्ज पर ही नये सिरे से स्वच्छ बनाए जाने की कवायद शुरू करनी होगी। अधिकारियों द्वारा तैयार की गई सूची को उन्होंने दरकिनार कर दिया है, जिसके साथ ही उस दौरान किए गए कार्यों पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
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सूची में शामिल किए सभी गांवों में कार्य करने की जरूरत : डीसी
डीसी सुमेधा कटारिया ने अपनी पहली मीट टू प्रैस में भी खुले रुप से स्वीकार किया कि इन गांवों में चलाए गए अभियान कहीं सफल हुए नहीं दिख रहे है। यहां पर भी सूची से बाहर रहे गांवों की तरह ही कार्य करने की जरूरत है और इसके लिए अधिकारियों को निर्देश भी जारी कर दिए गए है। अब खुले में शौचमुक्त बनाए जाने के अभियान के तहत 201 अधिकारियों को एक-एक गांव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस बार लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की जाएगी। उनके अनुसार 2 अप्रैल 2008 में कुरुक्षेत्र के गांवों को निर्मल बनाने का अभियान शुरु किया था, इस अभियान के तहत 303 गांवों को निर्मल गांव बनाया गया था। जबकि 89 गांव ही अब खुले से शौचमुक्त बताए जा रहे हैं। लेकिन हकीकत इससे भी परे हैं।
पूर्व एडीसी भी खोल चुके है पोल
जिला के पूर्व एडीसी एवं लगभग एक माह पहले तक स्वच्छता अभियान के नोडल अधिकारी रहे राजेश जोगपाल भी स्वच्छता अभियान व अधिकारियों की कार्यशैली की पोल खोल चुके है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अधिकारियों की लापरवाही के चलते ही अभियान सफल सफल होना तो दूर आगे भी नहीं बढ़ पा रहा है। उन्होंने अधिकारियों को इसी के चलते ही लताड़ भी लगाई थी। जिसके बाद इस अभियान में कुछ गंभीरता की उम्मीद जगी थी, लेकिन अब डीसी व एडीसी बदले जाने के बाद यह अभियान फिर से नये सिरे से शुरू किया जा रहा है।