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दो बेटों के शव देखकर पत्थरां गई मॉं की आंखें

Thu, 20 Jul 2017 12:11 AM IST
Updated Thu, 20 Jul 2017 12:11 AM IST
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दो बेटों के शव देखकर पत्थरां गई मॉं की आंखें
अमर उजाला ब्यूरो
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शाहाबाद।
अनहोनी का शिकार हुए पंकज और शंकर के परिवार को काल ने ऐसा जख्म दिया है कि जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। ढांढस बंधाने वाले कुछ समय बाद अपने घर लौट जाएंगे लेकिन उस मां को अपने बच्चे कभी वापस नहीं मिलेंगे जिसने एक साथ दो बेटों को खो दिया हो। घर के बरामदे में दो बेटों के शव पहुंचे तो रो-रो कर उनकी माता सरिता की आंखें पथरा गईं थीं और वह बार-बार मूर्छित हो रही थी। उसे नहीं मालूम था कि उसके चार बच्चों में से पलक झपकते ही काल का ग्रास बन जाएंगे। सरिता बार-बार अपने बेटों के शवों से लिपटकर उन्हें दुलार रही थी और उनके नाम पुकार कर उन्हें उठाने का प्रयास कर रही थी। सरिता कह रही थी कि इससे पहले उनके बच्चे कभी भी इस तरह से नदी की ओर नहीं गए अगर उसे पता होता कि उसके बच्चे नदी पर जाएंगे तो वह दिहाड़ी पर न जाती। इसी तरह बच्चों की छोटी बहन प्रियंका, बड़े भाई संतोष व पिता रामसेवक का भी रो-रो कर बुरा हाल था। बेशक बहन छोटी थी लेकिन फिर भी अपनी मां का ढांढस बंधा रही थी। पिता को कुछ नहीं समझ आ रहा था कि वह क्या करे और बार-बार अपने मृतक बेटों के हाथ व पांव रगड़ता कि शायद उनमें जान आ जाए। लेकिन होनी के आगे सभी मजबूर थे।

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तीनों बहन भाइयों के लिए लाया था नये जूते
मृतक शंकर व पंकज के बड़े भाई संतोष ने कहा कि दो दिन पहले शंकर व पंकज जिद कर रहे थे कि उनके जूते टूट गए हैं और अगर उन्हें नये जूते न दिलाए गए तो वह स्कूल नहीं जाएंगे। संतोष ने कहा कि इस पर वह कल ही तीनों बहन-भाइयों के लिए जूते खरीद कर लाया था। लेकिन उसे क्या पता था कि इन जूतों को डालने वाले उसके भाई उसे इस तरह से अचानक छोड़ कर चले जाएंगे। संतोष बार-बार उन जूतों को गले से लगाकर रो रहा था और बार-बार कह रहा था कि पंकज व शंकर एक बार उठकर इन जूतों को पहन लो। घटना के बाद कालोनी में मातम छाया रहा। बड़ी संख्या में लोग इनके घर पर शोक व्यक्त करने के लिए पहुंचने लगे। यहां तक की किसी के घर ने भी चूल्हे में आग नहीं जलाई।
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