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केयू के दर्शनशास्त्र-विभाग द्वारा ‘गीतोपदेश की समकालीन प्रासंगिकता’ पर व्याख्यान का आयोजन
Updated Thu, 23 Nov 2017 12:03 AM IST
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केयू के दर्शनशास्त्र-विभाग ने आयोजित किया व्याख्यान
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के विभिन्न विभाग गीतोपदेश के महत्व और इसकी समकालीन प्रासंगिकता पर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं । इसी क्रम में दर्शनशास्त्र-विभाग ने एआईएच विभाग के व्याख्यान-कक्ष में ‘गीतोपदेश की समकालीन प्रासंगिकता’ पर एक व्याख्यान आयोजित किया। इसके मुख्य वक्ता गीता मर्मज्ञ आशुतोष भारद्वाज ने अपने व्याख्यान में कहा कि आज का युवा दुविधा, तनाव, हताशा, कुण्ठा एवं स्मृतिहीनता का शिकार है। इन सब नकारात्मक प्रवृतियों से मुक्ति पाने के लिए अपने ‘स्व’ को, अपने ‘केंद्र’ को या अपने ‘ध्रुव’ को पाने की जरूरत है। यदि अपने ‘स्व’ का स्मरण बना रहे तो हमारा हर एक कर्म सार्थक, रचनात्मक एवं विकासपरक ही होगा।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कैलाशचंद्र शर्मा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि हम भारतीयों को अपनी संस्कृति से जुड़े रहना चाहिए। गीता इसमें हमारी मदद कर सकती है। गीता का प्रत्येक श्लोक मार्गदर्शक शिक्षाओं से परिपूर्ण है। विश्वविद्यालय प्रोक्टर एवं दर्शनशास्त्र-विभाग के अध्यक्ष प्रो. आरके देसवाल ने विभिन्न गीताओं की जानकारी दी। दर्शनशास्त्र-विभाग की प्रोफेसर डॉ. अनामिका गिरधर ने मुख्य अतिथियों और श्रोताओं का स्वागत किया। मंच संचालन डॉ. सुरेंद्र कुमार ने किया। इस अवसर पर प्राच्य-विद्या संकाय के अधिष्ठाता प्रो. राजेश्वर मिश्रा, संस्कृत-विभाग के प्रोफेसर सुरेंद्रमोहन मिश्र, चीफ वार्डन प्रो. मंजूषा, डॉ. शीलक राम, डॉ. सुरेंद्र कुमार, डॉ. गुरदीप आदि उपस्थित रहे।
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अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के विभिन्न विभाग गीतोपदेश के महत्व और इसकी समकालीन प्रासंगिकता पर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं । इसी क्रम में दर्शनशास्त्र-विभाग ने एआईएच विभाग के व्याख्यान-कक्ष में ‘गीतोपदेश की समकालीन प्रासंगिकता’ पर एक व्याख्यान आयोजित किया। इसके मुख्य वक्ता गीता मर्मज्ञ आशुतोष भारद्वाज ने अपने व्याख्यान में कहा कि आज का युवा दुविधा, तनाव, हताशा, कुण्ठा एवं स्मृतिहीनता का शिकार है। इन सब नकारात्मक प्रवृतियों से मुक्ति पाने के लिए अपने ‘स्व’ को, अपने ‘केंद्र’ को या अपने ‘ध्रुव’ को पाने की जरूरत है। यदि अपने ‘स्व’ का स्मरण बना रहे तो हमारा हर एक कर्म सार्थक, रचनात्मक एवं विकासपरक ही होगा।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कैलाशचंद्र शर्मा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि हम भारतीयों को अपनी संस्कृति से जुड़े रहना चाहिए। गीता इसमें हमारी मदद कर सकती है। गीता का प्रत्येक श्लोक मार्गदर्शक शिक्षाओं से परिपूर्ण है। विश्वविद्यालय प्रोक्टर एवं दर्शनशास्त्र-विभाग के अध्यक्ष प्रो. आरके देसवाल ने विभिन्न गीताओं की जानकारी दी। दर्शनशास्त्र-विभाग की प्रोफेसर डॉ. अनामिका गिरधर ने मुख्य अतिथियों और श्रोताओं का स्वागत किया। मंच संचालन डॉ. सुरेंद्र कुमार ने किया। इस अवसर पर प्राच्य-विद्या संकाय के अधिष्ठाता प्रो. राजेश्वर मिश्रा, संस्कृत-विभाग के प्रोफेसर सुरेंद्रमोहन मिश्र, चीफ वार्डन प्रो. मंजूषा, डॉ. शीलक राम, डॉ. सुरेंद्र कुमार, डॉ. गुरदीप आदि उपस्थित रहे।
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