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टाइम वेस्ट करना है कर लो कागजी कार्रवाई इतनी है कि सरकार से मिलेगा कुछ नहीं..
Updated Wed, 27 Jun 2018 11:41 PM IST
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कुरुक्षेत्र। ‘टाइम वेस्ट करना है कर लो, कागजी कार्रवाई इतनी है कि फंड नहीं मिल सकता ...’ भारत सरकार के एक उच्च अधिकारी का यह टका सा जवाब नेत्रहीनों द्वारा स्थापित देश के पहले नेत्रहीन ऑनलाइन रेडियो स्टेशन उड़ान के टीम मेंबर को मिल चुका है। जाहिर है नियमानुसार सरकारी धन कहां खर्च होगा और कहां नहीं ? यह सिस्टम ही तय करता है, लेकिन सुपर-30 दृष्टिहीनों की टीम को सहयोग और उनके हौसले को कद्र देने की बजाय, मदद का हाथ खींच हुआ है। देश के विभिन्न प्रदेशों से एकजुट होकर पंजाब के पठानकोट में पहला नेत्रहीन ऑनलाइन रेडियो स्टेशन उड़ान की स्थापना बुलंद हौसले वाले 30 दृष्टिहीनों ने 2 फरवरी 2014 को की थी। पिछले करीब साढ़े चार वर्षों में इस नेत्रहीन ऑनलाइन रेडियो स्टेशन को सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। भारत में यह रेडियो स्टेशन चलाने वाली टीम के सदस्यों की मानें तो अमेरिका और यूरोप सहित जिन देशों में नेत्रहीन ऑन लाइन रेडियो स्टेशन है, वहां की सरकारें उन्हें आर्थिक मदद प्रदान कर रही हैं। इस टीम का कहना है कि वह और भी बेहतर कर सकते हैं, अगर उन्हें स्पांसर और सरकारी आर्थिक मदद मिलती रहे। टीम के सदस्यों के मुताबिक पिछले दिनों भारत सरकार के अभियान के लिए लोगों को जागरूक करना था। उनका रेडियो स्टेशन भी इस अभियान के प्रचार प्रसार में सशक्त भूमिका निभा सकता था। इसके लिये उन्हें सरकार 10 लाख रुपये तक की मदद दे सकती थी, लेकिन भारत सरकार के एक उच्च अधिकारी ने जो उपरोक्त जवाब दिया, उससे उन्हें सिस्टम के बारे में समझ आ गई कि पीछे दौड़ने से कुछ नहीं होगा, सब कुछ खुद ही करना है।
2013 में आया आइडिया और देशभर से जुड़े 30 नेत्रहीन
यह टीम कुरुक्षेत्र एनआईटी में दिव्यांग युवक युवतियों के लिए आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय आईटी चैलेंज प्रतियोगिता में शामिल होने पहुंची थी। यहां टीम से अमर उजाला से बातचीत में पठानकोट वासी नेत्रहीन दानिश महाजन ने बताया कि वर्ष 2013 के नवंबर-दिसंबर माह में नेत्रहीनता को अपनी कमजोरी के रूप में स्वीकार करने की बजाए दुनिया में एक सफल इंसान बनने की सोच पैदा हुई थी और फिर तकनीक को ही अपनी सफलता का माध्यम बनाने के साथ उन्हें ऑनलाइन रेडियो स्टेशन स्थापित करने का आइडिया आया। इसके बाद उन्होंने वर्तमान में प्रोग्राम मैनेजर ज्योति मलिक, इवेंट मैनेजर राजेंद्र जोनी और प्रवक्ता पुनीत सोनी से संपर्क किया तो एकाएक दिल्ली, मुंबई, अजमेर, करनाल सहित देश के विभिन्न राज्यों से 30 नेत्रहीन लोग टीम से जुड़ गए।
भारत और देश के बाहर पसंद किए जा रहे हैं प्रोग्राम
इस रेडियो स्टेशन आज जहां नेत्रहीन लोगों के लिए छह शो विशेष तौर पर प्रसारित कर रहा है तो वहीं सामान्य रेडियो स्टेशन के अन्य सभी कार्यक्रमों को भी यहां से प्रसारित किया जाता है। इनमें बदलता दौर, टेक सिटी, कम्युनिटी कलर, शाम ए गजल, बुक वर्ल्ड जैसे प्रोग्राम को लोग पसंद कर रहे हैं। स्टेशन पर रेडियो जॉकी की ट्रेनिंग देकर युवक-युवतियों को रोजगार के काबिल भी बना रहे है। श्रोताओं से उन्हें फीडबैक भी मिल रहा है, जो उनकी सफलता के सफर को आगे बढ़ा रहा है।
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अपनी जेब से चला रहे रेडियो स्टेशन, केंद्र सरकार ने फेरा मुंह
रेडियो स्टेशन चला रहे सभी 30 लोग किसी न किसी रोजगार में है, लेकिन वे हर माह अपने वेतन से 10 फीसदी रेडियो स्टेशन चलाने पर सामूहिक रूप से खर्च करते हैं। स्टेशन का संचालन ओर भी बेहतर हो सके, इसके लिए न पंजाब सरकार आज तक आगे आई है और न ही केंद्र सरकार ने ही कोई पहल की है।
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2013 में आया आइडिया और देशभर से जुड़े 30 नेत्रहीन
यह टीम कुरुक्षेत्र एनआईटी में दिव्यांग युवक युवतियों के लिए आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय आईटी चैलेंज प्रतियोगिता में शामिल होने पहुंची थी। यहां टीम से अमर उजाला से बातचीत में पठानकोट वासी नेत्रहीन दानिश महाजन ने बताया कि वर्ष 2013 के नवंबर-दिसंबर माह में नेत्रहीनता को अपनी कमजोरी के रूप में स्वीकार करने की बजाए दुनिया में एक सफल इंसान बनने की सोच पैदा हुई थी और फिर तकनीक को ही अपनी सफलता का माध्यम बनाने के साथ उन्हें ऑनलाइन रेडियो स्टेशन स्थापित करने का आइडिया आया। इसके बाद उन्होंने वर्तमान में प्रोग्राम मैनेजर ज्योति मलिक, इवेंट मैनेजर राजेंद्र जोनी और प्रवक्ता पुनीत सोनी से संपर्क किया तो एकाएक दिल्ली, मुंबई, अजमेर, करनाल सहित देश के विभिन्न राज्यों से 30 नेत्रहीन लोग टीम से जुड़ गए।
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भारत और देश के बाहर पसंद किए जा रहे हैं प्रोग्राम
इस रेडियो स्टेशन आज जहां नेत्रहीन लोगों के लिए छह शो विशेष तौर पर प्रसारित कर रहा है तो वहीं सामान्य रेडियो स्टेशन के अन्य सभी कार्यक्रमों को भी यहां से प्रसारित किया जाता है। इनमें बदलता दौर, टेक सिटी, कम्युनिटी कलर, शाम ए गजल, बुक वर्ल्ड जैसे प्रोग्राम को लोग पसंद कर रहे हैं। स्टेशन पर रेडियो जॉकी की ट्रेनिंग देकर युवक-युवतियों को रोजगार के काबिल भी बना रहे है। श्रोताओं से उन्हें फीडबैक भी मिल रहा है, जो उनकी सफलता के सफर को आगे बढ़ा रहा है।
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रेडियो स्टेशन चला रहे सभी 30 लोग किसी न किसी रोजगार में है, लेकिन वे हर माह अपने वेतन से 10 फीसदी रेडियो स्टेशन चलाने पर सामूहिक रूप से खर्च करते हैं। स्टेशन का संचालन ओर भी बेहतर हो सके, इसके लिए न पंजाब सरकार आज तक आगे आई है और न ही केंद्र सरकार ने ही कोई पहल की है।