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मोबाइल और एकल परिवार से हो रहे डिप्रेशन के शिकार

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 10 Sep 2022 02:36 AM IST
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Victims of depression due to mobile and nuclear family
अनुज शर्मा
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करनाल। मोबाइल और एकल परिवार के बढ़ते चलन से लोग डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। इस कारण कई बार वे आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। खास बात यह है कि किशोर और युवाओं में डिप्रेशन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। कम से कम मनोचिकित्सकों की ओपीडी में आ रहे आंकड़े यही बता रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार थोड़ी सी सावधानी बरतकर हम डिप्रेशन के मामलों पर काफी हद तक अंकुश लगा सकते हैं। उन्होंने कहा कि रोजाना अगर आप अपने घर के सदस्यों के साथ बैठकर अपनी बातें शेयर करते हैं और उनकी बातें सुनते हैं तो शायद ही आपके मन में आत्महत्या का विचार आए।
जिला नागरिक अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता ने बताया कि 14 वर्ष के बाद लगभग 50 प्रतिशत बच्चे और 21 वर्ष के बाद 70 प्रतिशत बच्चे डिप्रेशन का शिकार होने लगते हैं। डिप्रेशन के ज्यादातर मामले 15 से 30 वर्ष के लोगों में सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि ओपीडी में रोजाना 80 से 100 मरीज आ रहे हैं। इसमें इजाफा करने का काम कोविड महामारी ने किया है, चूंकि कोविड में बच्चों में अकेलापन बढ़ा है। मोबाइल बच्चों की मजबूरी बन गई। आनलाइन पढ़ाई के कारण वो मोबाइल के इर्द गिर्द सिमटते जा रहे हैं। अभिभावक भी बिजी शेड्यूल के चलते अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। इससे बच्चे अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं और उनके मन के अंदर हेल्पलेस और होपलेस जैसे विकार पैदा रहे हैं, जिससे डिप्रेशन में आकर बच्चे भी आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। उन्होंने बताया कि लोगों की जिंदगी को अपनी तुलना करना भी जानलेवा साबित हो रहा है। इसका बड़ा कारण एकल परिवार और उनमें भी एक-दूसरे से सही तरीके से बातचीत न होना भी आत्महत्या का कारण बनता जा रहा है।
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लोगों को किया जाएगा जागरूक
आज 10 सितंबर है और इस दिन प्रतिवर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। इस बार भी नई थीम लोगों में अपने काम के जरिए उम्मीद पैदा करने के साथ जिला नागरिक अस्पताल के परिसर में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाएगा और लोगों को दिमागी रूप से सशक्त करने के लिए जागरूक किया जाएगा।
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घर के सदस्यों के साथ बैठ बातें शेयर करने की डालें आदत
-मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता बताते हैं कि पहले संयुक्त परिवार होते थे। तब सभी लोग एकसाथ बैठा करते थे और सारे दिन की बातें एक-दूसरे को बताते थे, लेकिन अब एकल परिवार और सोशल मीडिया के कारण यह खत्म हो गया है। इससे अकेलापन बढ़ने से मन में गलत विचार आते हैं, जो कई बार आत्मघाती साबित होते हैं। उन्होंने कहा कि रोजाना अगर आप अपने घर के सदस्यों के साथ बैठकर अपनी बातें शेयर करते हैं और उनकी बातें सुनते हैं तो आत्महत्या जैसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगा सकते हैं।
हर दिन एक युवा जिंदगी हार रही मौत से जंग
करनाल। कारण चाहे जो भी हों लेकिन अधिकतर नहरें सुसाइड स्पॉट बनती जा रही हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो औसतन एक व्यक्ति 24 घंटे में अपनी जिंदगी से हार रहा है। कोई नहर में कूद कर तो कोई फंदे पर लटक कर अपनी जिंदगी को खत्म कर रहा है।

नहरों पर लगातार बढ़ रही डूबने की घटनाओं को देखते हुए जिला प्रशासन को नहरों पर निषेधाज्ञा लागू करनी पड़ी है। सितंबर माह के पिछले नौ दिनों पर नजर डालें तो 12 लोग नहरों में डूबकर जान गंवा चुके हैं, जबकि पांच लोगों को बचाया गया है।
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