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दो कमरे, तीन सौ बच्चे, मिड-डे मील भी यहीं पकता है

Fri, 22 Nov 2013 11:55 PM IST
कैथल
कैथल Updated Fri, 22 Nov 2013 11:55 PM IST
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three hundreds child sits in two room school
चंदाना गेट के अंदर स्थित प्राथमिक स्कूल-5 और स्कूल-3 पिछले करीब 56 वर्षों से किराये के 100 गज के भवन में चल रहे हैं।
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बच्चों की विडंबना यह है कि स्कूल भवन के लिए ग्रांट विभाग द्वारा मंजूर करने के बाद लैप्स हो गई। स्कूल में पढ़ने वाले तीन सौ बच्चों के लिए दो कमरों में ही पढ़ाई होती है।

एक कमरे में ही मिड-डे मील, पानी की टंकी, अध्यापकों के लिए स्टाफ रूम और बच्चों को पढ़ाया जाता है। वहीं कमरों की दीवारों में दरारें आने के कारण यह भवन कभी भी बच्चों की मौत का सबब बन सकता है। गौरतलब है कि यहां पहले भी गैस सिलेंडर में आग लगने का हादसा हो चुका है।
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शिक्षा विभाग बेपहवार, ग्रांट भी हो गई लैप्स

 स्कूल-5 और स्कूल-3 पिछले करीब 56 वर्षों से किराए के भवन में चल रहे हैं। स्कूल के लिए भवन बनाने के लिए आई ग्रांट भी लैप्स हो गई है। दरअसल, चंदाना गेट पर ओमप्रभा जैन मार्केट के पीछे स्कूल के लिए जगह है। जहां भवन बनाने के लिए ग्रांट आई थी, लेकिन विभागीय अधिकारियों ने भवन बनाने के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया और यह ग्रांट लैप्स हो गई। स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या करीब 300 है, लेकिन बैठने के लिए 100 बच्चों को ही जगह उपलब्ध है। जिस कारण विद्यार्थियों को कमरों में एक दूसरे से सटकर बैठना पड़ता है। विद्यार्थियों के लिए प्रार्थना सभा और खेलने के लिए कोई मैदान नहीं है।
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अनसेफ भवन में बैठने को मजबूर
इन दो कमरों की दीवारों में दरारें आ चुकी हैं और भवन अनसेफ हो चुका है। वहीं, पिछले वर्ष स्कूल में सिलेंडर में आग लगने का हादसा हो चुका है।

आग पर हालांकि अध्यापकों ने समय रहते काबू पा लिया था। स्कूल के अंदर ही कक्षाओं में ही विद्यार्थियों के लिए मिड-डे मील पकाया जाता है। इसके अलावा कक्षाओं में ही पानी की टंकी और स्टाफ रूम है। विद्यार्थी, मोनू, सतीश, राकेश, सुनील, रमेश और मनीषा ने बताया कि बारिश आने पर स्कूल में छुट्टी कर दी जाती है।


स्कूल में बैठने के लिए जगह नहीं है। उन्होंने बताया कि उनके पास कोई खेलने के लिए मैदान नहीं है। वहीं, स्कूलों की स्थिति में सुधार के लिए अध्यापक संघ ने भी अभियान चलाया है। जिसके तहत पार्षदों को ज्ञापन दिए जा रहे हैं। संघ के सचिव सतबीर गोयत ने कहा कि बच्चों की जान की विभाग को कोई परवाह नहीं है।
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